फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Meerut News ›   clean water my demand

साफ पानी मेरा हक   

Tue, 05 Dec 2017 01:24 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Tue, 05 Dec 2017 01:24 AM IST
विज्ञापन
clean water my demand
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
सरकारी खजाने से 350 करोड़ खर्च होने के बाद भी महानगर की जनता स्वच्छपानी के लिए तरस गई है। जल निगम अधिकारियों की उदासीनता का खामियाजा शहर की जनता को भुगतना पड़ रहा है। करीब ढाई माह पहले बंद हुए गंगाजल ट्रीटमेंट प्लांट में सिल्ट जमा होने के कारण जंग लगना शुरू हो गया है। एक तरफ गंगाजल नहीं मिल रहा है तो दूसरी तरफ महानगर में हैंडपंप, सबमर्सिबल, ट्यूबवेलों के माध्यम से भूगर्भ जल का दोहन हो रहा है। वहीं, करोड़ों खर्च करभूगर्भ जल दोहन को रोकने की योजना भी फेल हो चुकी है। महानगर ही नहीं बल्कि जनपद के अधिकतर ब्लॉक डार्कजोन में शामिल हो गए हैं। भूगर्भ जल 200 फीट नीचे पहुंच गया है। 
विज्ञापन


भूगर्भ से प्रतिदिन एक अरब 22 करोड़ 56 लाख ली. जल दोहन 
महानगर में सरकारी और प्राइवेट संसाधनों से प्रतिदिन एक अरब 22 करोड़ 56 लाख लीटर पानी भूगर्भ से निकाला जा रहा है। लगातार भूगर्भ जल स्तर गिर रहा है। प्रतिवर्ष ट्यूबवेल, सबमर्सिबल, हैंडपंप पानी छोड़ रहे हैं। मरम्मत के नाम पर निगम खजाने से प्रतिवर्ष एक करोड़ से भी अधिक खर्च हो रहा है।
विज्ञापन


छह साल जनता ने झेलीं खुदी सड़कें
जल निगम ने 2010 में गंगाजल परियोजना को धरातल पर उतारा था।  तब से 2016 तक जल निगम ने बड़े स्तर पर सड़कों को खोदकर पाइप लाइन डालने का काम किया। छह साल तक महानगर की जनता जहां गड्ढों में गिरकर घायल होती रही, वहीं धूल के कारण बीमार भी हुए। खोदी गई सड़कों का हाल अभी भी ठीक नहीं हैं। सड़कें उबड़ खाबड़ होने के कारण आए दिन वाहन चालक गिरकर घायल हो रह हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


ये है गंगाजल योजना 
जेएनएनयूआरएम योजन के तहत लगभग 350 करोड़ रुपये से गंगाजल योजना की नींव रखी गई। इसमें भोले की झाल से लेकर शहर के विभिन्न इलाकों में पाइप लाइन डालने का काम किया गया। भोले की झाल पर गंगाजल ट्रीटमेंट प्लांट भी लगाया। इससे शहर की जनता को 43 क्यूसेक  गंगाजल की आपूर्ति की जानी थी। सरकारी खजाना खर्च हो गया, लेकिन जनता को उसका लाभ नहीं मिल पाया है। 

ये है गंगाजल परियोजना का लेखाजोखा 
कुल लागत                : 341.30 करोड़
मुख्य लाइन              :  21.04 किलोमीटर
बिछाई गई लाइन    : 725 किलोमीटर। 

2013 से मिलना था गंगाजल
जेएनएनयूआरएम योजना के अनुबंध के अनुसार शहर की जनता को वर्ष 2013 में  गंगाजल मिलना था। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी और पूर्व महापौर हरिकांत अहलुवालिया ने जल निगम अधिकारियों पर दबाव डालकर 2016 में गंगाजल आपूर्ति शुरू तो करा दी थी, लेकिन शहर की जनता को लगातार गंगाजल नहीं मिल सका। करीब ढाई माह से एक बूंद भी गंगाजल शहर की जनता को नहीं मिल पाया है।  

ट्रीटमेंट प्लांट की नहीं कराई सफाई
गंगनहर की सफाई के दौरान प्लांट में सिल्ट जमा हो  गयी थी। करोड़ों रुपये के गंगाजल ट्रीटमेंट प्लांट पर अब सिल्ट जमा होने से जंग लग गया है। सिल्ट की सफाई न होने के कारण प्लांट बंद पड़ा है। 

पांच करोड़ से अधिक की फुंकती है बिजली 
महानगर में नगर निगम की ट्यूबवेल, सबमर्सिबल पर जहां वर्ष में पांच करोड़ रुपये की बिजली फुंक रही है, वहीं लाखों रुपये रखरखाव पर खर्च हो रहे हैं। यदि गंगाजल परियोजना विधिवत रूप से संचालित हो तो जहां महानगर की जनता को साफ पानी मिलेगा। 

गिरते जल स्तर को रोक सकती है गंगाजल परियोजना 
गंगाजल योजना के तहत महानगर को 43 क्यूसेक पानी मिलना है। यदि परियोजना विधिवत रूप से  चालू रहे तो गिरते भूगर्भ जल स्तर को रोका जा सकता है। ट्यूबवेल और सबमर्सिबल, हैंडपंपों से खींचा जाने वाले जल का दोहन बंद हो जाएगा।

200 फीट नीचे पहुंचा जलस्तर
भूगर्भ जल स्तर 200 फीट नीचे पहुंच गया है। अगर हम दस साल पहले की बात करें तो 50 से 80 फीट पर भूगर्भ में पानी था। जबरदस्त जल दोहन ने जनपद का भूगर्भ जल स्तर इतना नीचे पहुंचा दिया है कि आम लोगों की पहुंच से दूर हो रहा है। मेरठ जनपद के खरखौदा, रोहटा, जानी, मेरठ, माछरा, परीक्षितगढ़ ब्लॉक डार्क जॉन में पहुंच गए हैं। यदि पानी के इस्तेमाल और बचत पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में परिणाम बेहद खराब होंगे। 

नगर निगम के यह हैं संसाधन
संसाधन                      संख्या              एक संसाधन से प्रतिघंटा पानी का दोहन  
ट्यूबवेल                   - 156,                 एक लाख किलो ली. प्रतिघंटा 

10 एचपी सबमर्सिबल - 570 ,                 50 हजार किलो ली. प्रति घंटा  
वन एचपी सबमर्सिबल - 3 हजार,             पांच हजार किलो ली. प्रति घंटा 
 हैंडपंप                - 10 हजार,              200 ली. प्रति घंटा।

शहर में निजी संसाधन 
75 हजार वन एचपी सबमर्सिबल।
दो हजार प्राइवेट हैंडपंप।

संचालन पर खर्च
ट्यूबवेल संचालन पर खर्च - 40 हजार रुपये 
सबमर्सिबल 10 एचपी पर खर्च- 12 से 15 हजार रुपये 
वन एचपी सबमर्सिबल पर खर्च-  4 से 5 हजार रुपये 
हैंडपंप पर खर्च                  - एक से दो हजार रुपये  

जल निगम और नगर निगम में विवाद 
भोले की झाल पर लगे गंगाजल शोधन प्लांट के संचालन को लेकर जल निगम और नगर निगम में रार है। कारण है कि प्लांट संचालन पर प्रतिवर्ष खर्च होने वाले एक करोड़ 80 लाख रुपये कौन खर्च करेगा। न तो शासन धन देने को तैयार है और न ही नगर निगम। इतना ही नहीं नगर निगम प्रशासन ने तो संचालन के लिए टेक्निकल कर्मचारी तक देने से हाथ खड़े कर दिए हैं। उधर जल निगम ने धन का अभाव बताकर परियोजना को लावारिस छोड़ दिया है। 
 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed