कुपोषण के खिलाफ अमर उजाला का अभियान, बागपत में कुपोषण की मार... नन्हीं परियां ज्यादा शिकार
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बेटे और बेटियों की परवरिश में पहले के मुकाबले फर्क तो आया है, मगर यह अभी नाकाफी है। खासकर आर्थिक तौर पर निचले तबके में। शूटर दादियों के इस जिले की जमीनी हकीकत यही है कि अभी तक लोग दिमाग से पूरी तरह बेटी और बेटा के भेद को खत्म नहीं कर पाए हैं। यही कारण है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियां अधिक कुपोषण की शिकार हो रही हैं। इस पर तुर्रा यह कि किसी घर में घी और दूध पाउडर नहीं पहुंच रहा है तो कहीं दाल गायब है।
युक्त जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती डेढ़ साल की वेदांशी रोए जा रही है। तेज आवाज में टीवी चल रहा है, मगर उससे तेज आवाज बच्ची की है। मां रिंकी चुप कराने की कोशिश कर रही है, मगर उसका रोना बंद नहीं हो रहा है। बेहद कमजोर यह बच्ची डोला में ब्याही रिंकी की पहली संतान है। वह कहती है कि शुरू से ही कमजोर है। क्यों कमजोर है, नहीं पता।
स्टाफ नर्स अनुराधा शर्मा उसे चुप कराती हैं, तो उसका रोना बंद होता है। स्टाफ नर्स बताती हैं कि ‘यहां भर्ती होने वालों में लड़कियों की संख्या बहुत ज्यादा है। कोरोना काल में 27 बच्चे भर्ती हुए हैं, जिनमें 18 लड़कियां हैं। इस वक्त छह बच्चे भर्ती हैं जिनमें चार लड़कियां हैं। पिछले छह साल में यहां 696 बच्चे भर्ती हुए हैं इनमें 60 प्रतिशत से ज्यादा लड़कियां हैं। समाज अभी लड़कियों पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहा। यहां सिरसली की अंशिका और देविका, सुरूरपुर की उर्वशी भी भर्ती हैं। वजन कम है। इन्हें कुपोषण के बारे में जानकारी नहीं है।
कम दे पाते हैं ध्यान
सिसाना गांव की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रामवती बताती हैं, मेरे क्षेत्र में तीन कुपोषित बच्चे हैं, तीनों लड़कियां हैं। लड़कियों पर ध्यान न देने से संख्या बढ़ रही है। यहां की रेशमा की दो बेटियां हैं। दोनों कुपोषित थीं, एक अब भी है, दूसरी ठीक हो गई है। साफगोई से कहती हैं, गरीब आदमी हैं, बच्चे तो हो जाते हैं मगर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते। ज्यादा कुछ खिला पिला नहीं पाते हैं।
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सभी लाभार्थियों को नहीं मिला खाद्यान्न
शासन स्तर से लाभार्थियों की अपेक्षा कम खाद्यान्न उपलब्ध हुआ है। जिस क्षेत्र के लिए राशन डीलरों को खाद्यान्न मिला है, उसी के आधार पर लाभार्थियों को आंगनबाड़ी के माध्यम से उपलब्ध कराया गया है। पूरा खाद्यान्न न मिलने के कारण सभी लाभार्थियों को राशन का वितरण नहीं हो पाया। - विपिन मैत्रेय, जिला कार्यक्रम अधिकारी बागपत।
- नहीं मिलता दूध पाउडर व घी
हरियाणा-बागपत बॉर्डर के गांव निवाड़ा में चार बेटियों की मां रेशमा बच्चियों से तो प्यार करती हैं, मगर अभी बेटे की चाह बाकी है। पड़ोस की तसरीबा के भी चार बच्चे हैं, सबसे बड़ा सात साल का है। अब चौथा कुपोषित है। कहती है गेहूं और चावल तो मिल जाता है, मगर दाल, घी और दूध पाउडर अभी नहीं मिला है। नहर पर रहने वाली सोनी का बेटा जुनैद अति कुपोषित है, नौ माह का है, लगता डेढ़ माह जैसा है। लेकिन इसे परिवार एनआरसी में भर्ती करने को राजी नहीं है।
- बाल कल्याण समिति ने रुकवाई 25 नाबालिग लड़कियों की शादी
बाल कल्याण समिति ने पिछले चार साल में 25 नाबालिग लड़कियों की शादियां रुकवाई हैं। कोरोना काल (मार्च से दिसंबर) में ही आठ शादियां रुकवाई हैं। बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष राजीव यादव बताते हैं जिन लड़कियों की शादी रुकवा की गई है, वे महज 16-17 साल उम्र की थी। ये लोहारी गांव, बडल और निरोजपुर गांव आदि की थीं। इनके परिवार वालों की काउंसलिंग भी की गई और कम उम्र में शादियों के नुकसान भी बताए गए। इन लड़कियों की बालिग होने पर शादी होने पर मदद भी की गई है।
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