छह वर्ष बाद भी मुजफ्फरनगर दंगे को याद कर लोग सिहर उठते हैं। दंगे की आग में लांक, लिसाढ़ और बहावड़ी गांव के लोग भी बहुतायत में प्रभावित हुए थे। उनके खंडहर बने मकान आज भी उस खौफनाक मंजर की गवाही दे रहे हैं। मगर समय के साथ साथ माहौल बदला है।
मुजफ्फरनगर दंगा 2013: वो बुरा वक्त था जो गुजर गया, कभी नहीं भूलेंगे वह काली रात
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दंगा पीड़ितों ने अपने मकान तो बेच दिए, लेकिन दिल आज भी यहीं से जुडे़ हैं। कई लोगों का मानना है कि सालों पुराना रिश्ता यूं ही नहीं टूटता। वो बुरा वक्त था जो गुजर गया।
न्याय की जगी उम्मीद
गठवाला खाप चौधरी बाबा हरिकिशन मलिक कहते हैं कि पता नहीं वो क्या हवा चली थी। उनका गांव भी दंगों की चपेट में आ गया। बेकसूरों पर मुकदमे हुए जिनकी लड़ाई अब तक झेल रहे हैं। कुछ को न्याय मिला भी है।
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17 राहत कैंपों में रहे 23 हजार लोग
हिंसा के बाद गांवों से पलायन करने वालों के लिए प्रशासन ने जिले में कांधला, कैराना आदि क्षेत्रों में 23 राहत शिविर लगाए थे। इनमें करीब 23 हजार लोग रहे। हालांकि इनमें शामली के अलावा मुजफ्फरनगर और बागपत जिलों के लोग भी आकर रहने लगे थे। इन शिविरों पर करीब डेढ़ अरब खर्च हुआ था।
नहीं भूलेंगे वो काली रात
लांक के सूरज कहते हैं कि उनके गांव में 50 से ज्यादा मुस्लिम परिवार थे, जो दंगे के बाद गांव से चले गए। बहुत के मकान बिक गए। सात सितंबर की वो रात उन्हें अब भी याद है। जब गांव में दंगे की आंधी ने सालों पुराना सामाजिक ताना बाना बिखेर दिया था।
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