{"_id":"52-75653","slug":"Meerut-75653-52","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘फिल्मी रानी’ से कम नहीं मेरठ की लेडी सिंघम ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘फिल्मी रानी’ से कम नहीं मेरठ की लेडी सिंघम
Meerut
Updated Sat, 23 Aug 2014 05:30 AM IST
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मेरठ। ‘रानी’ हो या ‘मर्दानी’ मेरठ की महिला लेडी सिंघम किसी से कम नहीं है। रानी मुखर्जी ने भले रील लाइफ में पुलिसवाली बनकर स्टंट और पुलिस-अपराधी का खेल खेला हो, लेकिन शहर की महिला पुलिस अफसर हर रोज रियल लाइफ में इन परिस्थितियों से रूबरू होती हैं। अपराधी कितना भी शातिर और खतरनाक हो महिला पुलिस ने हर मोर्चे पर अपनी काबिलियत को साबित किया है। नौकरी का हर लम्हा उन्हें लेडी सिंघम का अवार्ड देता है।
शोहदे को सरेराह सिखाया सबक
14 साल से पुलिस में बतौर कांस्टेबल नियुक्त नीलम की बहादुरी भी काबिले-तारीफ है। गाजियाबाद की नीलम की पहली पोस्टिंग बिजनौर में और दूसरी मेरठ में हुई। टीवी सीरियल ‘उड़ान’ से प्रेरणा लेकर नीलम ने पुलिस की नौकीर ज्वाइन की। उन्होंने बताया कि एक बार वह सिविलियन ड्रेस में रेलवे स्टेशन से सिटी बस में बेगमपुल आ रही थी। बस कंडक्टर ने मुझे पीछे से पकड़ा और खींचने लगा, मुझे ये बेहद खराब लगा। तभी मैंने उसके बाल पकड़कर उसे बस से नीचे गिराया और खूब पिटाई की। इसी तरह एक बार आरजी कॉलेज पर मेरी ड्यूटी के दौरान छेड़छाड़ करने वाले युवक की भी धुनाई कर जेल पहुंचवाया।
ट्रेन में कर दी मजनू की धुनाई
चार साल पहले पुलिस की नौकरी में बतौर कांस्टेबल भर्ती हुई सहारनपुर की मनीषा ने भी अपनी और सहेलियों की आत्म सुरक्षा के लिए साहस दिखाया। मनीषा बताती हैं एक बार दिल्ली से वह मेरठ सहेलियों के साथ ट्रेन से आ रही थी। काफी देर से एक आदमी हमें घूर रहा था और हूटिंग कर रहा था। किसी भी यात्री ने उसे मना नहीं किया। पहले हमने उसकी हरकतों को अनदेखा किया, लेकिन जब बात हद से गुजरने लगी तो मुझे गुस्सा आ गया। मैंने उस आदमी का गिरेबान पकड़कर सबके सामने उसे पीटा। मेरा हौसला देखकर सहेलियां भी आगे बढ़ी और जमकर धुनाई की। मेरठ स्टेशन पर उसे पुलिस के हवाले कर दिया। इस कारण उसकी ट्रेन भी छूट गई।
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स्कूटर से पकड़ा था लुटेरा
सीओ ट्रैफिक स्वर्णजीत कौर बिजनौर की ग्रामीण पृष्ठभूमि में पली बढ़ी हैं। वे बताती हैं कि 36 साल की नौकरी में कई ऐसे मुकाम आए जिनका सामना एक महिला होने के नाते करना बेहद मुश्किल था। मैंने भी ड्यूटी और ऑफ ड्यूटी दोनों तरह से हर मोर्चे का डटकर सामना किया। 1993 में मैं लालकुर्ती थाने में तैनात थी। तिलकरोड से एक व्यापारी से एक लुटेरे ने 35 हजार रुपये लूट लिए। मैं बिना किसी वाहन के इंतजार किए अपने स्कूटर पर ही घटनास्थल पर जा पहुंची। किसी ने मुझे घटनास्थल पर कुछ नहीं बताया। तब एक घर से किसी महिला ने मुझे भीतर बुलाकर लुटेरे का हुलिया, उसकी गाड़ी का नंबर और रंग बताया। महिला के बताए मुताबिक मैं उस रास्ते पर गई आगे गई और लुटेरा पकड़ लिया।
बुरका पहनकर पकड़े मर्डर के आरोपी
14 साल से पुलिस की नौकरी कर रहीं एसओ महिला थाना अलका सिंह के साहस से एक बॉलीवुड डायरेक्टर को फिल्म की कहानी मिल सकती है। मुरादाबाद, चंदौसी की अलका 2001 में पुलिस में आई, पहली पोस्टिंग मुजफ्फरनगर में मिलीं। पिछले 7-8 सालों से मेरठ में हैं। उन्होंने बताया कि बबीता चौधरी मर्डर केस के समय वह लालकुर्ती थाने पर थी। इस अभियान में मैंने बुरका पहनकर, वेश बदलकर आरोपी को दौराला रेलवे स्टेशन पर पकड़ा था। पहले आरोपी को धोखे से फोन पर बबीता चौधरी बनकर फंसाया, फिर दौराला रेलवे स्टेशन पर मुलाकात की कहानी बनाई और उसे पकड़वाया। ये मेरी अभी तक की नौकरी का सबसे सेंसेटिव केस था, जो मुझे खुद पर प्राउड फील कराता है।
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शोहदे को सरेराह सिखाया सबक
14 साल से पुलिस में बतौर कांस्टेबल नियुक्त नीलम की बहादुरी भी काबिले-तारीफ है। गाजियाबाद की नीलम की पहली पोस्टिंग बिजनौर में और दूसरी मेरठ में हुई। टीवी सीरियल ‘उड़ान’ से प्रेरणा लेकर नीलम ने पुलिस की नौकीर ज्वाइन की। उन्होंने बताया कि एक बार वह सिविलियन ड्रेस में रेलवे स्टेशन से सिटी बस में बेगमपुल आ रही थी। बस कंडक्टर ने मुझे पीछे से पकड़ा और खींचने लगा, मुझे ये बेहद खराब लगा। तभी मैंने उसके बाल पकड़कर उसे बस से नीचे गिराया और खूब पिटाई की। इसी तरह एक बार आरजी कॉलेज पर मेरी ड्यूटी के दौरान छेड़छाड़ करने वाले युवक की भी धुनाई कर जेल पहुंचवाया।
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ट्रेन में कर दी मजनू की धुनाई
चार साल पहले पुलिस की नौकरी में बतौर कांस्टेबल भर्ती हुई सहारनपुर की मनीषा ने भी अपनी और सहेलियों की आत्म सुरक्षा के लिए साहस दिखाया। मनीषा बताती हैं एक बार दिल्ली से वह मेरठ सहेलियों के साथ ट्रेन से आ रही थी। काफी देर से एक आदमी हमें घूर रहा था और हूटिंग कर रहा था। किसी भी यात्री ने उसे मना नहीं किया। पहले हमने उसकी हरकतों को अनदेखा किया, लेकिन जब बात हद से गुजरने लगी तो मुझे गुस्सा आ गया। मैंने उस आदमी का गिरेबान पकड़कर सबके सामने उसे पीटा। मेरा हौसला देखकर सहेलियां भी आगे बढ़ी और जमकर धुनाई की। मेरठ स्टेशन पर उसे पुलिस के हवाले कर दिया। इस कारण उसकी ट्रेन भी छूट गई।
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स्कूटर से पकड़ा था लुटेरा
सीओ ट्रैफिक स्वर्णजीत कौर बिजनौर की ग्रामीण पृष्ठभूमि में पली बढ़ी हैं। वे बताती हैं कि 36 साल की नौकरी में कई ऐसे मुकाम आए जिनका सामना एक महिला होने के नाते करना बेहद मुश्किल था। मैंने भी ड्यूटी और ऑफ ड्यूटी दोनों तरह से हर मोर्चे का डटकर सामना किया। 1993 में मैं लालकुर्ती थाने में तैनात थी। तिलकरोड से एक व्यापारी से एक लुटेरे ने 35 हजार रुपये लूट लिए। मैं बिना किसी वाहन के इंतजार किए अपने स्कूटर पर ही घटनास्थल पर जा पहुंची। किसी ने मुझे घटनास्थल पर कुछ नहीं बताया। तब एक घर से किसी महिला ने मुझे भीतर बुलाकर लुटेरे का हुलिया, उसकी गाड़ी का नंबर और रंग बताया। महिला के बताए मुताबिक मैं उस रास्ते पर गई आगे गई और लुटेरा पकड़ लिया।
बुरका पहनकर पकड़े मर्डर के आरोपी
14 साल से पुलिस की नौकरी कर रहीं एसओ महिला थाना अलका सिंह के साहस से एक बॉलीवुड डायरेक्टर को फिल्म की कहानी मिल सकती है। मुरादाबाद, चंदौसी की अलका 2001 में पुलिस में आई, पहली पोस्टिंग मुजफ्फरनगर में मिलीं। पिछले 7-8 सालों से मेरठ में हैं। उन्होंने बताया कि बबीता चौधरी मर्डर केस के समय वह लालकुर्ती थाने पर थी। इस अभियान में मैंने बुरका पहनकर, वेश बदलकर आरोपी को दौराला रेलवे स्टेशन पर पकड़ा था। पहले आरोपी को धोखे से फोन पर बबीता चौधरी बनकर फंसाया, फिर दौराला रेलवे स्टेशन पर मुलाकात की कहानी बनाई और उसे पकड़वाया। ये मेरी अभी तक की नौकरी का सबसे सेंसेटिव केस था, जो मुझे खुद पर प्राउड फील कराता है।