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त्याग की शिक्षा हमें प्रेरणा से लेनी चाहिए : मुनि श्री
Updated Sat, 22 Sep 2018 01:15 AM IST
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हस्तिनापुर। श्री दिगंबर जैन प्राचीन बड़ा मंदिर हस्तिनापुर में समवशरण महामंडल विधान की विधिवत मांगलिक क्रियाएं नित्य की भांति प्रात: मुख्य वेदी पर भगवान जिनेंद्र के अभिषेक एवं शांतिधारा से प्रारम्भ हुईं। इसके बाद समोषरण जिनालय में मंगलाष्टक के साथ विधानाचार्य पं. आशीष जैन शास्त्री ने विधान की क्रियाएं प्रारम्भ कराईं।
भगवान मल्लिनाथ को वेदिका से सौधर्म इंद्र मुकेश जैन को यज्ञ नायक रमेश चंद ने अन्य इन्द्रों के साथ संगीत की स्वर लहरियों पर जयघोष करते हुए समवशरण जिनालय की तीन प्रदक्षिणा करके पांडुकशिला पर विराजमान किया। यहां सौरभ जैन, संयम जैन, शिल्पी जैन, पिहू जैन, सुनीता जैन, अफजलगढ को शांतिधारा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। शांतिधारा में सहयोग विनोद जैन, शास्त्री नगर, ने किया। मुनिश्री 108 भावभूषण जी महाराज ने पर्यूषण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग पर प्रचवन करते हुए कहा कि त्याग कि शिक्षा हमें प्रकृति से लेनी चाहिए। वृक्ष कार्बन-डाई ऑक्साइड ग्रहण और हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। गाय घास आदि खाकर हमें दूध प्रदान करती है। वृक्ष अपने पत्तों को एक समय स्वयं छोड़ देता है। हम भी आहार करते हैं तो निहार होता है। तभी मनुष्य स्वस्थ रहता है। अगर हम ग्रहण करते रहे और उसको छोड़े नहीं तो अस्वस्थ हो जायेंगे। इसी प्रकार से धन के अर्जन करने में ओर वस्तुओं के संग्रह के मूल में राग है। जबकि त्याग हमें परिग्रह से मुक्ति दिलाता है। जीवन में त्याग की महिमा सृष्टि के आरम्भ से ही रही है। जैन धर्म और जैन समाज दान शीलता का आदर्श उदाहरण है। सच्चा धनपति जोड़ने में नहीं छोड़ने में स्वयं को भाग्यशाली समझता है। धन की सार्थकता छोड़ने में है जोड़ने में नहीं। समुंद्र पानी को एकत्रित करता है इसलिए उसका जल खारा होता है और नदी निरंतर प्रवाहित होती है इसलिए उसका जल मीठा होता है। प्राणी उसका सद्उपयोग करते हैं। संचयवृत्ति, परिग्रह पाप है जोड़कर रख लो चाहे लाख हीरे, मोती मगर याद रखना कफन में जेब नहीं होती है। इसलिए भव्य आत्माओं त्याग की प्रवृत्ति में आगे बढ़ो और अपने धन का धर्म के लिए, राष्ट्र के लिए, समाजहित के लिए उसका सद्उपयोग करो। अन्यथा कहा भी है कि धन की तीन गतियां होती हैं दान, भोग और नाश। उत्तम त्याग समस्त संसार में श्रेष्ठ है ये औषधी दान, शास्त्र दान, अभय दान एवं आहार दान के रूप में व्यवहार में लाया जाता है। दस दिवसीय इस महोत्सव में प्रतिदिन रात्रि में 48 दीपकों से भक्तामर पाठ किया जा रहा है। जिसमें जेके जैन, शीला जैन, निधि जैन, संतोष जैन, तरस कुमार, गौरव, पूजा, विकास, राशि जैन परिवार के द्वारा द्वीप प्रज्ज्वलित किए गए एवं संगीतमय आरती, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। आज भक्ति नृत्य आयोजित किए गये। जिसके पुरस्कार रमेश चंद जैन, अनिल जैन द्वारा प्रदत्त किए गये। कार्यक्रम को सफल बनाने में मुकेश जैन, अशोक जैन, उमेश जैन, अतुल जैन, मणिचन्द आदि का सहयोग रहा।
मुख्य बातें
श्री दिगंबर जैन प्राचीन बड़ा मंदिर हस्तिनापुर में समवशरण महामंडल विधान
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भगवान मल्लिनाथ को वेदिका से सौधर्म इंद्र मुकेश जैन को यज्ञ नायक रमेश चंद ने अन्य इन्द्रों के साथ संगीत की स्वर लहरियों पर जयघोष करते हुए समवशरण जिनालय की तीन प्रदक्षिणा करके पांडुकशिला पर विराजमान किया। यहां सौरभ जैन, संयम जैन, शिल्पी जैन, पिहू जैन, सुनीता जैन, अफजलगढ को शांतिधारा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। शांतिधारा में सहयोग विनोद जैन, शास्त्री नगर, ने किया। मुनिश्री 108 भावभूषण जी महाराज ने पर्यूषण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग पर प्रचवन करते हुए कहा कि त्याग कि शिक्षा हमें प्रकृति से लेनी चाहिए। वृक्ष कार्बन-डाई ऑक्साइड ग्रहण और हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। गाय घास आदि खाकर हमें दूध प्रदान करती है। वृक्ष अपने पत्तों को एक समय स्वयं छोड़ देता है। हम भी आहार करते हैं तो निहार होता है। तभी मनुष्य स्वस्थ रहता है। अगर हम ग्रहण करते रहे और उसको छोड़े नहीं तो अस्वस्थ हो जायेंगे। इसी प्रकार से धन के अर्जन करने में ओर वस्तुओं के संग्रह के मूल में राग है। जबकि त्याग हमें परिग्रह से मुक्ति दिलाता है। जीवन में त्याग की महिमा सृष्टि के आरम्भ से ही रही है। जैन धर्म और जैन समाज दान शीलता का आदर्श उदाहरण है। सच्चा धनपति जोड़ने में नहीं छोड़ने में स्वयं को भाग्यशाली समझता है। धन की सार्थकता छोड़ने में है जोड़ने में नहीं। समुंद्र पानी को एकत्रित करता है इसलिए उसका जल खारा होता है और नदी निरंतर प्रवाहित होती है इसलिए उसका जल मीठा होता है। प्राणी उसका सद्उपयोग करते हैं। संचयवृत्ति, परिग्रह पाप है जोड़कर रख लो चाहे लाख हीरे, मोती मगर याद रखना कफन में जेब नहीं होती है। इसलिए भव्य आत्माओं त्याग की प्रवृत्ति में आगे बढ़ो और अपने धन का धर्म के लिए, राष्ट्र के लिए, समाजहित के लिए उसका सद्उपयोग करो। अन्यथा कहा भी है कि धन की तीन गतियां होती हैं दान, भोग और नाश। उत्तम त्याग समस्त संसार में श्रेष्ठ है ये औषधी दान, शास्त्र दान, अभय दान एवं आहार दान के रूप में व्यवहार में लाया जाता है। दस दिवसीय इस महोत्सव में प्रतिदिन रात्रि में 48 दीपकों से भक्तामर पाठ किया जा रहा है। जिसमें जेके जैन, शीला जैन, निधि जैन, संतोष जैन, तरस कुमार, गौरव, पूजा, विकास, राशि जैन परिवार के द्वारा द्वीप प्रज्ज्वलित किए गए एवं संगीतमय आरती, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। आज भक्ति नृत्य आयोजित किए गये। जिसके पुरस्कार रमेश चंद जैन, अनिल जैन द्वारा प्रदत्त किए गये। कार्यक्रम को सफल बनाने में मुकेश जैन, अशोक जैन, उमेश जैन, अतुल जैन, मणिचन्द आदि का सहयोग रहा।
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मुख्य बातें
श्री दिगंबर जैन प्राचीन बड़ा मंदिर हस्तिनापुर में समवशरण महामंडल विधान