{"_id":"5a1348ee4f1c1b156b8b7335","slug":"151511213294-meerut-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"मतदान प्रतिशत पर प्रत्याशियों की नजर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मतदान प्रतिशत पर प्रत्याशियों की नजर
Updated Tue, 21 Nov 2017 02:58 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मेरठ। नगर निगम चुनाव का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। बुधवार 22 नवंबर को मतदान होना है। इससे पहले सभी प्रत्याशियों की नजरें मतदान प्रतिशत पर टिक गयी हैं। क्योंकि इस बार कम मतदान भाजपा को जहां भारी पड़ सकता है, वहीं बसपा और सपा के लिए भी खतरा बन सकता है। पिछले निगम चुनाव में मतदाताओं ने जिस नीरसता का परिचय दिया था, उसे लेकर इस बार प्रत्याशी और राजनैतिक दलों के नेता पहले से योजनाबद्ध तरीके से मतदान बढ़ाने के लिए जुट चुके हैं।
पिछला नगर निगम चुनाव 2012 में हुआ था। उस चुनाव में मतदान प्रतिशत कुल मतदाताओं का 45.44 प्रतिशत के करीब बैठता है। जबकि 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में यही मतदान प्रतिशत 65 से ऊपर रहा है। हालांकि पिछले नगर निगम चुनाव में कम मतदान के बावजूद भाजपा प्रत्याशी को 70 हजार के करीब वोटों से जीत हासिल हुई थी। लेकिन जिस तरह के समीकरण पिछली बार चुनाव में बने थे, उससे देखते हुए जीत का यह अंतर काफी कम था।
भाजपा नेताओं की मानें तो उनके खुद के गढ़ में पिछले चुनाव में औसतन 25 से 40 प्रतिशत तक मतदान हुआ था। जबकि मुस्लिम और दलित बहुल क्षेत्रों में इसी मतदान का प्रतिशत 45 से 70 प्रतिशत तक गया था। पिछले चुनाव में बसपा की तरफ से कोई प्रत्याशी नहीं था, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिला था और शहर का दलित वोटर उसकी तरफ आ गया था। इसी दलित वोटर ने मतदान में उत्साह से भाग लेते हुए भाजपा के जीत को अंतर को बढ़ाया था।
विज्ञापन
लेकिन इस बार परिस्थिति पूरी तरह उलट हैं। ऐसे में कम मतदान भाजपा को भारी पड़ सकता है। भाजपा अपने गढ़ में मतदान बढ़ाने को लेकर बूथ मैनेजमेंट के जरिये जुट गयी है। हालांकि पिछले नगर निगम चुनाव के बाद भाजपा ने लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में अमित शाह के नेतृत्व में लड़ा था और उन्होंने ही उस समय बूथ मैनेजमेंट का जो गुर भाजपाइयों को दिया, उसका लाभ उसे लोकसभा के साथ विधानसभा में भी मिला। अब नगर निगम में भी भाजपा उसी को आगे बढ़ाकर चल रही है।
वहीं, दूसरी तरफ भाजपा की चाल को काटने के लिए बसपा और सपा भी अपने गढ़ में मतदान को अधिक से अधिक कराने के लिए टीम तैयार कर चुकी है। ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार नगर निगम चुनाव में मतदान 65 प्रतिशत के ऊपर जा सकता है।
खास बात
- कम मतदान भाजपा के लिए पड़ सकता है भारी, सपा-बसपा के लिए खतरा
- मुस्लिम और दलित क्षेत्रों में मतदान हमेशा होता आया है ज्यादा
- पिछले निकाय चुनाव में भी विधानसभा की तुलना में कम रहा था मतदान
विज्ञापन
पिछला नगर निगम चुनाव 2012 में हुआ था। उस चुनाव में मतदान प्रतिशत कुल मतदाताओं का 45.44 प्रतिशत के करीब बैठता है। जबकि 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में यही मतदान प्रतिशत 65 से ऊपर रहा है। हालांकि पिछले नगर निगम चुनाव में कम मतदान के बावजूद भाजपा प्रत्याशी को 70 हजार के करीब वोटों से जीत हासिल हुई थी। लेकिन जिस तरह के समीकरण पिछली बार चुनाव में बने थे, उससे देखते हुए जीत का यह अंतर काफी कम था।
विज्ञापन
भाजपा नेताओं की मानें तो उनके खुद के गढ़ में पिछले चुनाव में औसतन 25 से 40 प्रतिशत तक मतदान हुआ था। जबकि मुस्लिम और दलित बहुल क्षेत्रों में इसी मतदान का प्रतिशत 45 से 70 प्रतिशत तक गया था। पिछले चुनाव में बसपा की तरफ से कोई प्रत्याशी नहीं था, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिला था और शहर का दलित वोटर उसकी तरफ आ गया था। इसी दलित वोटर ने मतदान में उत्साह से भाग लेते हुए भाजपा के जीत को अंतर को बढ़ाया था।
विज्ञापन
लेकिन इस बार परिस्थिति पूरी तरह उलट हैं। ऐसे में कम मतदान भाजपा को भारी पड़ सकता है। भाजपा अपने गढ़ में मतदान बढ़ाने को लेकर बूथ मैनेजमेंट के जरिये जुट गयी है। हालांकि पिछले नगर निगम चुनाव के बाद भाजपा ने लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में अमित शाह के नेतृत्व में लड़ा था और उन्होंने ही उस समय बूथ मैनेजमेंट का जो गुर भाजपाइयों को दिया, उसका लाभ उसे लोकसभा के साथ विधानसभा में भी मिला। अब नगर निगम में भी भाजपा उसी को आगे बढ़ाकर चल रही है।
वहीं, दूसरी तरफ भाजपा की चाल को काटने के लिए बसपा और सपा भी अपने गढ़ में मतदान को अधिक से अधिक कराने के लिए टीम तैयार कर चुकी है। ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार नगर निगम चुनाव में मतदान 65 प्रतिशत के ऊपर जा सकता है।
खास बात
- कम मतदान भाजपा के लिए पड़ सकता है भारी, सपा-बसपा के लिए खतरा
- मुस्लिम और दलित क्षेत्रों में मतदान हमेशा होता आया है ज्यादा
- पिछले निकाय चुनाव में भी विधानसभा की तुलना में कम रहा था मतदान