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देहात
Updated Tue, 29 Aug 2017 08:07 PM IST
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तिलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाएं किसान
कृषि विज्ञान केंद्र में एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन
हस्तिनापुर।
कृषि विज्ञान केंद्र में सस्य विज्ञान विभाग द्वारा तिलहनी फसल उत्पादन तकनीकी विषय पर मंगलवार को प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रशिक्षण प्रभारी डॉ. संदीप चौधरी ने बताया कि भारत में प्रयुक्त खाद्य तेलों में जैसे पामोलिन, सोयाबीन, मूंगफली आदि के साथ सरसों के साथ प्रमुख स्थान है। खाद्य तेल के अतिरिक्त इसका उपयोग वनस्पिति घी बनाने, बालों में लगाने, औषधि निर्माण, साबुन निर्माण, ग्रीस निर्माण, प्लास्टिक उद्योग, चमड़ा उद्योग आदि में किया जाता है। किसान इसकी फसल कर लाभ कमा सकते हैं।
उन्होने बताया कि सरसों की बुवाई का उपयुक्त समय 10 सितम्बर से लेकर अक्टूबर माह तक है। एक एकड़ में 1.5 किग्रा. बीज की बुवाई 45 सेमी. लाइन से लाइन व 15 सेमी. पौधे से पौधे की दूरी पर करनी चाहिए। सरसों की फसल में 100 किलो सिंगल सुपर फास्फेट तथा 25 किग्रा. यूरिया प्रति एकड़ की दर से बुवाई के समय देना चाहिए। बुवाई के 20 से 25 दिन बाद सिंचाई से पूर्व पौधों की छंटाई कर 0.1 प्रतिशत की दर से थायो यूरिया का छिड़काव करने पर सरसों की फसल का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
केन्द्र के मृदा वैज्ञानिक डा. राकेश तिवारी ने बताया कि रसायनों की इस्तेमाल से भूमि की गुणवत्ता में लगातार कमी आ रही है। पिछले पांच दशकों में भूमि के कार्बनिक तत्व में 50 प्रतिशत से भी अधिक कमी आई है। इसके फलस्वरूप तिलपनी फसलों में सल्फर सूक्ष्म तत्व की उपलब्धता में भी गिरावट आयी है। केंद्र के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डा. नवीन चन्द्र ने बताया कि सफेद रोली रोग के नियंत्रण के लिये एप्रोन 35 एमडी 6 ग्राम अथवा कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से बीप उपचार करना चाहिए। खड़ी फसल में माहू या चेपा कीट के नियंत्रण के लिए डाइमेथोऐट 30 ईसी एक एमएल/लीटर पानी अथवा इमिडाक्लोप्रिड एक एमएल दवा प्रति दो लीटर पानी की दर से छिड़काव करें । कार्यक्रम में कृषक ओमपाल सिंह, रामपाल सिंह, विजयपाल सिंह, कन्हैया, जोगिन्दर कुमार आदि शामिल रहे।
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कृषि विज्ञान केंद्र में एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन
हस्तिनापुर।
कृषि विज्ञान केंद्र में सस्य विज्ञान विभाग द्वारा तिलहनी फसल उत्पादन तकनीकी विषय पर मंगलवार को प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रशिक्षण प्रभारी डॉ. संदीप चौधरी ने बताया कि भारत में प्रयुक्त खाद्य तेलों में जैसे पामोलिन, सोयाबीन, मूंगफली आदि के साथ सरसों के साथ प्रमुख स्थान है। खाद्य तेल के अतिरिक्त इसका उपयोग वनस्पिति घी बनाने, बालों में लगाने, औषधि निर्माण, साबुन निर्माण, ग्रीस निर्माण, प्लास्टिक उद्योग, चमड़ा उद्योग आदि में किया जाता है। किसान इसकी फसल कर लाभ कमा सकते हैं।
उन्होने बताया कि सरसों की बुवाई का उपयुक्त समय 10 सितम्बर से लेकर अक्टूबर माह तक है। एक एकड़ में 1.5 किग्रा. बीज की बुवाई 45 सेमी. लाइन से लाइन व 15 सेमी. पौधे से पौधे की दूरी पर करनी चाहिए। सरसों की फसल में 100 किलो सिंगल सुपर फास्फेट तथा 25 किग्रा. यूरिया प्रति एकड़ की दर से बुवाई के समय देना चाहिए। बुवाई के 20 से 25 दिन बाद सिंचाई से पूर्व पौधों की छंटाई कर 0.1 प्रतिशत की दर से थायो यूरिया का छिड़काव करने पर सरसों की फसल का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
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केन्द्र के मृदा वैज्ञानिक डा. राकेश तिवारी ने बताया कि रसायनों की इस्तेमाल से भूमि की गुणवत्ता में लगातार कमी आ रही है। पिछले पांच दशकों में भूमि के कार्बनिक तत्व में 50 प्रतिशत से भी अधिक कमी आई है। इसके फलस्वरूप तिलपनी फसलों में सल्फर सूक्ष्म तत्व की उपलब्धता में भी गिरावट आयी है। केंद्र के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डा. नवीन चन्द्र ने बताया कि सफेद रोली रोग के नियंत्रण के लिये एप्रोन 35 एमडी 6 ग्राम अथवा कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से बीप उपचार करना चाहिए। खड़ी फसल में माहू या चेपा कीट के नियंत्रण के लिए डाइमेथोऐट 30 ईसी एक एमएल/लीटर पानी अथवा इमिडाक्लोप्रिड एक एमएल दवा प्रति दो लीटर पानी की दर से छिड़काव करें । कार्यक्रम में कृषक ओमपाल सिंह, रामपाल सिंह, विजयपाल सिंह, कन्हैया, जोगिन्दर कुमार आदि शामिल रहे।
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