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कुछ तो ऐसा हो कि लोग याद रखें क्रांतिकारियों को
ब्यूरो, अमर उजाला, मऊ
Updated Fri, 26 Aug 2016 11:48 PM IST
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रामनयन
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‘कुछ तो ऐसा हो कि लोग याद रखें आजादी की लड़ाई और हमें’, यह दर्द है स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामनयन मल्ल का। आजादी के 70 सालों में देश ने भले ही विकास किया, लेकिन इस क्रांतिकारी का पांति गांव पूर्ववत है। गांव में जाने के लिए न तो कायदे का रास्ता है, न ही बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था। प्रतिवर्ष स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर सरकारी समारोहों में जनपद के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भले ही याद कर लिया जाता है, लेकिन उनकी मुश्किलों को हल करने के लिए कोई प्रयास नहीं होता। मल्ल का कहना है कि उनके गांवों तक आने के लिए रास्ता तक नहीं। विद्युतीकरण का हाल तो और बुरा है।
मधुबन क्षेत्र के पांति गांव में रामनयन मल्ल का जन्म 1928 में हुआ था। मैट्रिक तक पहुंचते-पहुंचते वे आजादी की लड़ाई में कूद गए। क्षेत्र के वरिष्ठ नेताओं के साथ मल्ल भी रैलियों आदि में भाग लेने लगे। सन् 1942 के आंदोलन में उन्होंने आगे बढ़कर नेतृत्व किया। 15 अगस्त 1942 को थाने पर तिरंगा लहराने के लिये बढ़ते क्रांतिकारियों पर अंग्रेजों ने गोली चलवा दी। 149 राउंड फायरिंग में मल्ल घायल हो गए।
आज मल्ल 94-95 वर्ष के हैं और अपने गांव में ही रहते हैं। बकौल मल्ल, बढ़ती उम्र के साथ रोग भी बढ़ते हैं। गांव में आने-जाने के लिए दरवाजे तक एक रास्ता भी नहीं है। जबकि यह दो-दो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का गांव है। इस गांव से एक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जामवंत ने भी लड़ाई लड़ी थी, जो अब नहीं रहे। बरसात के दिनों में मल्ल के घर जाने के लिए घुटनेभर गंदे पानी में गुजरना पड़ता है।
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चिकित्सा की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि कम से कम सरकार की तरफ से एक डॉक्टर सप्ताह में स्वास्थ्य चेक कर लेता। कई बीमारियों से ग्रस्त रामनयन का कहना है कि इलाज के लिए भी उन्हें किसी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं मिलती। प्रशासनिक उदासीनता का आलम यह है कि उन्हें सरकारी आवासीय योजनाओं में से किसी का भी लाभ नहीं दिया गया है।
एक आवास तक नहीं दिया गया। गांव में सोलर लाइट तक नहीं है। कोई जानता तक नहीं है कि इस गांव में कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी रहता है। कम से कम सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य के साथ उनके कुछ ऐसे शिलालेख लगें, जिससे लोग आजादी के इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जान सकें और इतिहास जिंदा रहे।
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मधुबन क्षेत्र के पांति गांव में रामनयन मल्ल का जन्म 1928 में हुआ था। मैट्रिक तक पहुंचते-पहुंचते वे आजादी की लड़ाई में कूद गए। क्षेत्र के वरिष्ठ नेताओं के साथ मल्ल भी रैलियों आदि में भाग लेने लगे। सन् 1942 के आंदोलन में उन्होंने आगे बढ़कर नेतृत्व किया। 15 अगस्त 1942 को थाने पर तिरंगा लहराने के लिये बढ़ते क्रांतिकारियों पर अंग्रेजों ने गोली चलवा दी। 149 राउंड फायरिंग में मल्ल घायल हो गए।
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आज मल्ल 94-95 वर्ष के हैं और अपने गांव में ही रहते हैं। बकौल मल्ल, बढ़ती उम्र के साथ रोग भी बढ़ते हैं। गांव में आने-जाने के लिए दरवाजे तक एक रास्ता भी नहीं है। जबकि यह दो-दो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का गांव है। इस गांव से एक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जामवंत ने भी लड़ाई लड़ी थी, जो अब नहीं रहे। बरसात के दिनों में मल्ल के घर जाने के लिए घुटनेभर गंदे पानी में गुजरना पड़ता है।
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चिकित्सा की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि कम से कम सरकार की तरफ से एक डॉक्टर सप्ताह में स्वास्थ्य चेक कर लेता। कई बीमारियों से ग्रस्त रामनयन का कहना है कि इलाज के लिए भी उन्हें किसी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं मिलती। प्रशासनिक उदासीनता का आलम यह है कि उन्हें सरकारी आवासीय योजनाओं में से किसी का भी लाभ नहीं दिया गया है।
एक आवास तक नहीं दिया गया। गांव में सोलर लाइट तक नहीं है। कोई जानता तक नहीं है कि इस गांव में कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी रहता है। कम से कम सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य के साथ उनके कुछ ऐसे शिलालेख लगें, जिससे लोग आजादी के इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जान सकें और इतिहास जिंदा रहे।