{"_id":"62146","slug":"Mau-62146-61","type":"story","status":"publish","title_hn":"छुट्टी में आत्मनिर्भर बनने के सीख रहीं गुर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
छुट्टी में आत्मनिर्भर बनने के सीख रहीं गुर
Mau
Updated Wed, 09 May 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन
मऊ। अब वह दिन गए जब महिलाएं और लड़कियां सिर्फ घर का चूल्हा चौका बरतन ही करके संतुष्ट हो जाया करती थी। ज्यादा से ज्यादा बालिकाएं पढ़ लिखकर नौकरी के लिए घर बैठे ही प्रयास करती थी। लेकिन अब बालिकाओं और महिलाओं में आत्मनिर्भर बनने का जज्बा ज्यादा दिख रहा है। समर कैंपों में उमड़ रही भीड़ ही इस बात की गवाही दे रही है। प्रशिक्षण ले रही बालिकाओं का कहना है कि वह पढ़ाई के साथ ही स्वयं में आत्म निर्भर बनने के लिए यह कार्य सीख रही हैं।
दीपाली गुप्ता और सफदनाद स्कैचिंग का गुर सीख रही हैं। उनका कहना है कि वह पढ़ लिखकर नौकरी का प्रयास तो करेंगी। नौकरी ना मिलने पर वह स्वयं इस कला के माध्यम से धनोपार्जन कर अपने पैरों पर खड़ा होगीं। शीबा परवीन कढ़ाई का कार्य सीख रही हैं जबकि गोल्डी वर्मा मेंहदी सीख रही हैं।
उनका भी कहना है कि वह यह कार्य सीखने के बाद उनके पास एक काम हो जाएगा। घर बैठना पड़ा तो भी वह कुछ ना कुछ इस कला के माध्यम से कमा सकती हैं। आफिका खातून सिलाई करना सीख रही हैं जबकि रीतू पेंटिंग का कार्य सीख रही हैं। उनका कहना है इस कार्य की समाज के हर तबके के लोगों में पहचान है और लोगों की जरुरत है। पढ़ाई के बाद वह इस कार्य को हमेशा के लिए अपनाएंगी। नौकरी मिली तो इस कला का अपने परिवार और पास पड़ोस के लोगों को लाभ पहुंचाएंगी नहीं मिली तो वह इसे अपना बिजनेस बनाएंगी। समर कैंप में प्रशिक्षण ले रही अधिकांश बालिकाओं और महिलाओं का कुछ इसी तरह का सपना है। वह अब अपने पैरों पर तो खड़ा होना ही चाहती हैं। बड़ी होकर अपने परिवार या मां बाप पर बोझ भी नहीं बनना चाहती हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
दीपाली गुप्ता और सफदनाद स्कैचिंग का गुर सीख रही हैं। उनका कहना है कि वह पढ़ लिखकर नौकरी का प्रयास तो करेंगी। नौकरी ना मिलने पर वह स्वयं इस कला के माध्यम से धनोपार्जन कर अपने पैरों पर खड़ा होगीं। शीबा परवीन कढ़ाई का कार्य सीख रही हैं जबकि गोल्डी वर्मा मेंहदी सीख रही हैं।
विज्ञापन
उनका भी कहना है कि वह यह कार्य सीखने के बाद उनके पास एक काम हो जाएगा। घर बैठना पड़ा तो भी वह कुछ ना कुछ इस कला के माध्यम से कमा सकती हैं। आफिका खातून सिलाई करना सीख रही हैं जबकि रीतू पेंटिंग का कार्य सीख रही हैं। उनका कहना है इस कार्य की समाज के हर तबके के लोगों में पहचान है और लोगों की जरुरत है। पढ़ाई के बाद वह इस कार्य को हमेशा के लिए अपनाएंगी। नौकरी मिली तो इस कला का अपने परिवार और पास पड़ोस के लोगों को लाभ पहुंचाएंगी नहीं मिली तो वह इसे अपना बिजनेस बनाएंगी। समर कैंप में प्रशिक्षण ले रही अधिकांश बालिकाओं और महिलाओं का कुछ इसी तरह का सपना है। वह अब अपने पैरों पर तो खड़ा होना ही चाहती हैं। बड़ी होकर अपने परिवार या मां बाप पर बोझ भी नहीं बनना चाहती हैं।
विज्ञापन