श्रीकृष्ण जन्मभूमि-ईदगाह मामला: ढाई रुपये के स्टांप पेपर पर हुए समझौते के क्या हैं मुख्य बिंदु, ये है मामला
मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में हिंदू पक्ष का दावा है कि ढाई रुपये के स्टांप पेपर पर समझौता किया गया था। इसकी नींव मथुरा में 1968 में तैनात रहे डीएम और एसपी ने रखी थी।
विस्तार
श्रीकृष्ण जन्मस्थान की जिस ढाई एकड़ जमीन को ईदगाह कमेटी को ढाई रुपये के स्टांप पर समझौते के आधार पर देने का विरोध हो रहा है, उसकी नींव मथुरा में 1968 में तैनात रहे डीएम और एसपी ने रखी थी। उस वक्त शायद उन्होंने सोचा भी न होगा कि जिस समझौते को वह विवाद का निपटारा मान रहे हैं, वह खुद ही भविष्य में विवाद बन जाएगा।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष एवं अधिवक्ता महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि उन्होंने इस प्रकरण में काफी अध्ययन किया। कई किताबें पढ़ीं, जिनमें सामने आया कि 15 मार्च 1832 को अताउल्ला खातिब ने कलेक्टर कोर्ट में एक मुकदमा दर्ज कराया था। इसमें 1815 में पटनीमल के नाम पर कटरा केशव देव की जमीन की नीलामी की गई थी, उसको रद्द कर मस्जिद की मरम्मत कराए जाने की मांग की गई। यह इस विवाद का पहला मुकदमा था। इसके बाद वर्ष 1897, 1920, 1928, 1946, 1955, 1960, 1961 और वर्ष 1965 में अलग-अलग मुकदमे दर्ज हुए। फिर वर्ष 1968 आया, उस वक्त मथुरा में डीएम के पद पर आरके गोयल और एसपी के पद पर गिरीश बिहारी तैनात थे।
उन्होंने 136 वर्ष पुराने इस प्रकरण को खत्म करने का रास्ता समझौते के तौर पर निकाला। डीएम और एसएसपी की मध्यस्थता पर 10 अगस्त 1968 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी ने ढाई रुपये के स्टांप पेपर पर 10 बिंदुओं का समझौता नामा किया था। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के सह सचिव देवधर शर्मा और उनके सहयोगी फूलचंद गुप्ता ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। वहीं, ईदगाह कमेटी की ओर से शहमर मलीह, डाॅ. शाहबुद्दीन, आबिदुल्ला खां, मो. आकूल ने हस्ताक्षर किए थे। अधिवक्ता रज्जाक हुसैन थे। इस प्रकरण में अब तक चले मुकदमों को एक किताब में संजोया गया है, जिसका नाम न्यायिक स्थिति श्रीकृष्ण जन्मस्थान है। उसी किताब में इस बात का जिक्र है।
विहिप ने किया था पुरजोर विरोध
1968 के समझौते का विरोध विश्व हिंदू परिषद के उस समय के अध्यक्ष रहे डाॅ. रमन दास और मूल प्राचीन पुनरुद्धार समिति के मंत्री चंद्रभानु ने किया था। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ को पत्र लिख कर कहा था कि समझौता गलत है। इस पर विचार किया जाए। जिस धार्मिक स्थल का उत्थान हो रहा है, उसी के एक अंग को मुसलमानों को दे दिया गया है।
वादी पक्षों के यह हैं तर्क
वादी पक्षों का तर्क है कि श्रीकृष्ण जन्मस्थान की 13.37 एकड़ जमीन पर ही शाही मस्जिद ईदगाह स्थित है। ऐसे में समझौते को रद्द कर ईदगाह हटाकर पूरी जमीन श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट को दी जाए। ईदगाह कमेटी ने इस पर एतराज जताया है। कमेटी का कहना है कि पूजा स्थल अधिनियम 1991 से ये वाद बाधित है, इसलिए इस पर सुनवाई ही नहीं हो सकती। वहीं किसी भी समझौते के तीन वर्ष के अंदर ही आपत्ति की जा सकती है, वह भी समझौता करने वालों के द्वारा। इतने वर्षों के बाद आपत्ति का कोई औचित्य नहीं है। फिलहाल इन्हीं तर्कों के बीच न्यायालय में वाद लंबित हैं।
क्या है पूजा स्थल अधिनियम 1991
15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। यदि कोई इस अधिनियम का उल्लंघन करने का प्रयास करता है तो उसे जुर्माना और तीन वर्ष की जेल भी हो सकती है। ये कानून 1991 में तत्कालीन नरसिंहा राव की सरकार लेकर आई थी। हालांकि कानून में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद को अलग रखा गया था।
समझौते के मुख्य बिंदु
1. ईदगाह के जो पनाले श्रीकृष्ण जन्मस्थान की ओर हैं, उसे संघ अपने खर्च से पाइप लगाकर ईदगाह की कच्ची कुर्सी की ओर मोड़ देगा।
2. पश्चिम उत्तरी कोने में जो भूखंड संघ का है, उसमें कमेटी अपनी कच्ची कुर्सी को चौकोर कर लेगा। वह उसी की मिल्कियत मानी जाएगी।
3. ईदगाह के ऊपर के चबूतरे की उत्तर व दक्षिण दीवारों को पूरब की ओर रेलवे लाइन तक बढ़ा लिया जाए। इन दोनों दीवारों का निर्माण मस्जिद कमेटी करेगी।
4. रेलवे लाइन के लिए जो भूमि संघ अधिगृहीत करा रहा है, जो भूमि ईदगाह के सामने दीवारों के भीतर आएगी, उसे कमेटी को दे देगा।
5. दीवारों के बाहर उत्तर व दक्षिण की ओर मस्जिद कमेटी मुस्लिम आबादी से खाली कराएगी और भूमि संघ को देगी।
6. दक्षिण की ओर जीने का मलबा एक अक्टूबर 1968 तक मस्जिद कमेटी उठा लेगी।
7. दोनों पक्षों की ओर से जो मुकदमे चल रहे हैं, उनमें समझौते की सभी शर्तें पूरी हो जाने पर दोनों पक्ष राजीनामा दाखिल कर देंगे।
8. उत्तर दक्षिण दिशा वाली दीवारों के बाहर मुस्लिम आबादी में जिन मकानों का बैनामा कमेटी ने अपने हक में कराया है, उसे संघ को सौंपेगी।