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Mathura News: साइबर ठगी वाले गांव में नहीं देंगे बेटी, हेयद्रष्टि से देखता है समाज

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 13 Dec 2025 12:20 AM IST
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They won't give up their daughters in villages where cyber fraud is rampant; society looks down on them
गोवर्धन। पंद्रह वर्ष पहले टटलू काटने का छोटा सा धंधा जिस दिन गांव की चौखट पर आया था, उसी दिन पहचान की नींव में दरार पड़ गई थी। समय बीतता गया और यही दरार साइबर अपराध की चौड़ी खाई बनकर गांव की साख को निगलने लगी। बुजुर्गों के चेहरे पर बेबसी, महिलाओं की थमी चाल और युवाओं की बुझती उम्मीदें बता रही हैं कि अपराधियों ने सिर्फ पैसा ही नहीं कमाया, गांव की आत्मा को भी जख्मी किया है। वहीं प्रशासन की सुस्ती इस दर्द को और गहरा करती चली गई। आज लोग कहते हैं कि लोग कहते हैं कि वह साइबर ठगी वाला गांव है, वहां बेटी नहीं देंगे।
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देवसेरस की गली से उठी ठगी की चिंगारी मुड़सेरस की राह से आगे बढ़ी। अकातिया और दौलतपुर तक पहुंचते पहुंचते यह आग पूरे इलाके की पहचान जलाने लगी। चारों गांव भले ही एक-दो किलोमीटर की दूरी पर हों, पर बदनामी का बोझ अब पूरे क्षेत्र में समान रूप से महसूस होता है। बुजुर्ग कहते हैं कि पहले घर आंगन रिश्तों से रोशन रहते थे। लोग मान सम्मान लेकर आते थे। आज गांव का नाम सुनते ही चेहरे उतर जाते हैं और कदम पीछे हो जाते हैं। सोने की ईंट का लालच देकर लोगों को फंसाने वाले जब मुड़सेरस और अकातिया में बढ़े तो ठगी की राह और खुल गई। दौलतपुर तक पहुंचते पहुंचते यह गिरोह साइबर ठगी के नए रूप में सामने आया।
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ओएलएक्स पर फर्जी सौदे, बैंक ओटीपी उड़ाना, लिंक भेजकर खातों को खाली करना, इस सबने धीरे धीरे गांव की पहचान अपराधियों के नाम पर चढ़ा दी। पुलिस पूछताछ करती रही, पर पकड़ मजबूत नहीं कर सकी। अपराधियों की चाल हर बार पुलिस से आगे निकल गई।गांव के बुजुर्ग निरोती (70) ने आंखें पोंछते हुए कहा कि गांव नहीं बदला, दुनिया की नजर बदल गई है। अब कोई रिश्ते की बात तक नहीं करता। मुरलीधर (85) बोले कि हमने पूरी जिंदगी मान कमाया और अपराधियों ने एक रात में उसे धूल कर दिया।
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हरिप्रसाद (55) ने कहा कि अब लड़के-लड़कियों के रिश्ते भी अटक गए हैं। लोग कहते हैं कि वह साइबर ठगी वाला गांव है, वहां बेटी नहीं देंगे। जहां चौपालों में हंसी थी, वहां आज गांव अपनी पहचान ढूंढ रहा है। गांव पूछ रहा है कि पुलिस कब जागेगी। अपराधियों की ताकत कब टूटेगी और गांव का नाम कब फिर मान से लिया जाएगा, लेकिन जवाब कहीं दिखाई नहीं देता। न सड़क पर न दफ्तर में। जवाब सिर्फ ग्रामीणों की आंखों के दर्द में उतरता दिख रहा है। गांव अपनी साख की लड़ाई आज भी अकेला लड़ रहा है।
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