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Mathura News: उपेक्षा का शिकार सौंख का ऐतिहासिक गढ़वाल टीला
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मथुरा। सौंख का उपेक्षित गढ़वाल टीला
- फोटो : mathura
सौंख (मथुरा)। गोवर्धन रोड के किनारे स्थित कस्बा का ऐतिहासिक गढ़वाल टीला पुरातत्व अन्वेषकोें के शोधक्रम में काफी महत्वपूर्ण हो सकता है। रखरखाव और संरक्षण के अभाव में शेष रहे अवशेष भी मिट्टी में मिले जा रहे हैं। अपने गर्भ में पुरा सभ्यता के कई रहस्यों को छुपाए यह टीला अब इतिहास से कहानी बन जाने की ओर है। टीले के चारों ओर निरंतर अतिक्रमण जारी है और विभाग की उपेक्षा ने अतिक्रमणकारियों के हौंसले बुलंद कर रखे हैं। टीले के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि टीले से प्राप्त कलाकृतियों से भारत ही नहीं जर्मनी के संग्रहालय भी सजे पड़े हैं।
एक ओर कस्बा के लोग भले ही टीले को सामान्य टीला समझते हो लेकिन अभिलेखों में करीब 7 हजार वर्ग मीटर में फैला यह टीला पुरातत्ववेताओं और जिज्ञासुओं के लिए जिज्ञासा और आकर्षण का केंद्र माना जाता रहा है। यही कारण है कि इस टीले को लेकर विभाग भी काफी योजना बनाता रहा है पर कोई भी योजना इसके काम नहीं आ सकीं। इस टीले से 1400वीं सदी से 1600वीं सदी तक कुषाण कालीन मौर्यकाल, शुंग काल, व जाट बिरादरी से जुड़ी रही इतिहास की कई जानकारियां पुरातत्ववेताओं ने जुटाई हैं।
टीले की सर्वप्रथम राज्य सरकार का ध्यान 1966 में गया और तब राज्य पुरातत्व विभाग की निगरानी में उत्खनन भारतीय कला संग्रहालय लखनऊ के तत्कालीन जर्मनी निवासी निदेशक हरवर्ट हर्टल के निर्देशन में इस टीले का खुदाई का कार्य शुरू हुआ जो करीब 8 वर्ष तक 1974 तक चला। लेकिन किसी कारणवश बीच में ही खुदाई का कार्य रोकना पडा। आज भी कई वर्ग किमी क्षेत्रफल का इलाका खुदाई के इंतजार में है। इस दौरान टीले से कई सभ्यताओं से संबंधित मूर्तियां और बर्तन प्राप्त हुए। कई सौ वर्ष पुरानी राजसी सभ्यता की झलक भी यहां दिखायी पड़ती है।
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अलग से बनानी पड़ी वीथिका
कस्बा के गढ़वाल टीले से खुदाई के दौरान इतने अवशेष और मूर्तियां मिली कि राजकीय संग्रहालय मथुरा में ही नही देश के कई राज्यों के संग्रहालय में सौंख के लिए अलग से वीथिका बनानी पडी। आज भी संग्रहालय में कस्बा के टीले का प्रतिरूप मौजूद है। कस्बा से निकली मूर्तियां भी राजकीय संग्रहालय मथुरा के साथ-साथ देश के कई बडे़ संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही है।
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पूर्व प्रधानमंत्री की पुत्री भी कर चुकी हैं इस टीले का अवलोकन
इस टीले के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की पुत्री उपेन्द्र सिंह भी इस टीले का दो बार अवलोकन करने आ चुकी हैं। अक्सर दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र इस टीले का अवलोकन करने आते रहते हैं। इसी क्रम में आज से करीब ग्यारह वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री पुत्री उपेन्द्र सिंह कुछ शोध छात्राओं के साथ यहां आ चुकी हैं पर उनका अधिकारिक कार्यक्रम 21 दिसम्बर 2008 को था जब वह यहां पुनः इसका अवलोकन करने आयी। उन्होंने इस टीले की दुर्दशा पर गहरा दुःख व्यक्त किया था।
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आज भी होती है नाग मंदिर की पूजा
टीले से करीब दो सौ मीटर दूर इसी टीले की प्राचीन सभ्यता से जुडे वैदिक यज्ञशालाओं और नागमदिंरों के अवशेष देखे जा सकते हैं। राज्य पुरातत्व विभाग के अनुसार यह मंदिर और वैदिक यज्ञशाला 16वीं शताब्दी पुराने हैं। प्राप्त इष्टिका नाग मंदिरों में से एक आज भी कस्बा में मां चामुंडा देवी मंदिर के नाम से विख्यात है और आज भी खुटैल पट्टी के जाटों के आसपास के 364 गांवों की देवी के रूप में मान्य है। प्रत्येक विशेष अवसर पर जाट बिरादरी के लोग यहां जरूर पूजा अर्चना करने आते हैं।
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एक ओर कस्बा के लोग भले ही टीले को सामान्य टीला समझते हो लेकिन अभिलेखों में करीब 7 हजार वर्ग मीटर में फैला यह टीला पुरातत्ववेताओं और जिज्ञासुओं के लिए जिज्ञासा और आकर्षण का केंद्र माना जाता रहा है। यही कारण है कि इस टीले को लेकर विभाग भी काफी योजना बनाता रहा है पर कोई भी योजना इसके काम नहीं आ सकीं। इस टीले से 1400वीं सदी से 1600वीं सदी तक कुषाण कालीन मौर्यकाल, शुंग काल, व जाट बिरादरी से जुड़ी रही इतिहास की कई जानकारियां पुरातत्ववेताओं ने जुटाई हैं।
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टीले की सर्वप्रथम राज्य सरकार का ध्यान 1966 में गया और तब राज्य पुरातत्व विभाग की निगरानी में उत्खनन भारतीय कला संग्रहालय लखनऊ के तत्कालीन जर्मनी निवासी निदेशक हरवर्ट हर्टल के निर्देशन में इस टीले का खुदाई का कार्य शुरू हुआ जो करीब 8 वर्ष तक 1974 तक चला। लेकिन किसी कारणवश बीच में ही खुदाई का कार्य रोकना पडा। आज भी कई वर्ग किमी क्षेत्रफल का इलाका खुदाई के इंतजार में है। इस दौरान टीले से कई सभ्यताओं से संबंधित मूर्तियां और बर्तन प्राप्त हुए। कई सौ वर्ष पुरानी राजसी सभ्यता की झलक भी यहां दिखायी पड़ती है।
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अलग से बनानी पड़ी वीथिका
कस्बा के गढ़वाल टीले से खुदाई के दौरान इतने अवशेष और मूर्तियां मिली कि राजकीय संग्रहालय मथुरा में ही नही देश के कई राज्यों के संग्रहालय में सौंख के लिए अलग से वीथिका बनानी पडी। आज भी संग्रहालय में कस्बा के टीले का प्रतिरूप मौजूद है। कस्बा से निकली मूर्तियां भी राजकीय संग्रहालय मथुरा के साथ-साथ देश के कई बडे़ संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही है।
पूर्व प्रधानमंत्री की पुत्री भी कर चुकी हैं इस टीले का अवलोकन
इस टीले के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की पुत्री उपेन्द्र सिंह भी इस टीले का दो बार अवलोकन करने आ चुकी हैं। अक्सर दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र इस टीले का अवलोकन करने आते रहते हैं। इसी क्रम में आज से करीब ग्यारह वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री पुत्री उपेन्द्र सिंह कुछ शोध छात्राओं के साथ यहां आ चुकी हैं पर उनका अधिकारिक कार्यक्रम 21 दिसम्बर 2008 को था जब वह यहां पुनः इसका अवलोकन करने आयी। उन्होंने इस टीले की दुर्दशा पर गहरा दुःख व्यक्त किया था।
आज भी होती है नाग मंदिर की पूजा
टीले से करीब दो सौ मीटर दूर इसी टीले की प्राचीन सभ्यता से जुडे वैदिक यज्ञशालाओं और नागमदिंरों के अवशेष देखे जा सकते हैं। राज्य पुरातत्व विभाग के अनुसार यह मंदिर और वैदिक यज्ञशाला 16वीं शताब्दी पुराने हैं। प्राप्त इष्टिका नाग मंदिरों में से एक आज भी कस्बा में मां चामुंडा देवी मंदिर के नाम से विख्यात है और आज भी खुटैल पट्टी के जाटों के आसपास के 364 गांवों की देवी के रूप में मान्य है। प्रत्येक विशेष अवसर पर जाट बिरादरी के लोग यहां जरूर पूजा अर्चना करने आते हैं।