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गुरु ही शिव है और शिव ही गुरु है: महाब्रह्मऋषि

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 20 Jul 2025 01:43 AM IST
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The Guru is Shiva and Shiva is the Guru: MahabrahmaRishi
मथुरा। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालु। - फोटो : mathura
चौमुहां (मथुरा)। सद्गुरु अपनी करुणा रूपी तलवार के प्रहार से संशय, दया, भय, संकोच, निन्द्रा, प्रतिष्ठा, कुल का अभिमान और संपत्ति आठ प्रकार के इन पाशों को काटकर अपने शिष्य को शीतल आनंद प्रदान करता है। गुरुदेव द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर अपने मन की शुद्धि करनी चाहिए। जो कुछ भी अनित्य वस्तु इंद्रियों के वश में हो जाए उनका निराकरण करना चाहिए। ये बातें महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी ने शनिवार को आयोजित हुए गुरु पूर्णिमा महोत्सव एवं प्रभु कृपा दुख निवारण समागम में प्रथम दिन कहीं। चौमुहां स्थित श्री राधा कृष्ण स्वर्ण मंदिर धाम में चल रहे समागम में जगद्गुरु महाब्रह्मऋषि ने श्रद्धालुओं को गुरु ज्ञान कराया।
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उन्होंने कहा कि जब तक इस शरीर में सांस रहती है तब तक श्रीगुरुदेव का स्मरण करना चाहिए और उनकी शरण नहीं छोड़ना चाहिए। जिस प्रकार भगवान शंकर का निवास स्थान काशी है, उसी प्रकार सद्गुरु का निवास स्थान भी काशी है। सद्गुरु का चरणामृत गंगा के समान है। भगवान विश्वनाथ की तरह ये अपने शिष्य को तारने वाले ब्रह्मा हैं।
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जगद्गुरु महाब्रह्मर्षि जी ने कहा कि हमें करोड़ों वर्षों बाद मनुष्य का जन्म प्राप्त हुआ है। जीवन में कई ऐसे पड़ाव आते हैं जिसमें लगता है कि छोड़ो, पाठ में क्या रखा है। इन पड़ावों से कैसे बाहर आना है, वह आप केवल पाठ के द्वारा जान सकते हैं। मां दुर्गा का पाठ अपने आप में पूर्ण है, बहुत शक्तिशाली है। मां भगवती दुर्गा की कृपा से ही समस्त सृष्टि का सृजन, पालन और संहार कार्य भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव करते हैं। मां भगवती ने ही चंद्रमा, सूर्य, तारे, पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि, ग्रह-नक्षत्रों को बनाया है। मातारानी एक पल में ही लाखों ग्रहों, नक्षत्रों व पिंडों की रचना करती है और खंडन भी कर देती है। माता रानी की इच्छा से ही
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समस्त ब्रह्मांड का संचालन होता है। जगद्गुरु महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी ने कहा कि गुरु गीता में वर्णन है कि गुरु ही शिव है और शिव ही गुरु है। जो गुरु तत्व को जान जाता है वह आत्मज्ञान को प्राप्त हो जाता है। ‘गु’ रूपी अंधकार को खत्म करके ‘रु’ रूपी ज्ञान प्रकाश को प्रदान करने वाले को गुरु कहते हैं। इनके स्मरण मात्रा से ही ज्ञान अपने आप प्रकट होने लगता है अतः गुरुदेव की पूजा करनी चाहिए। यदि कोई मनुष्य गुरु तत्व से मुंह मोड़कर याज्ञिक, तपस्वी बन जाता है तब भी वह मुक्त नहीं हो सकता।
जगद्गुरु महाब्रह्मर्षि कुमार स्वामी ने कहा कि मंत्रों के अधिष्ठाता भगवान शिव हैं। इनका कथन है कि मंत्रों के बिना औषधि सूखी लकड़ी के समान है। भगवान शिव ने कहा है कि वैसे तो सभी मंत्रों के पाठ लाभकारी होते हैं, लेकिन मां दुर्गा का पाठ सदैव लाभकारी होता है क्योंकि अन्य पाठों का संचित पुण्य समाप्त हो जाता है जबकि मां दुर्गा के पाठ का पुण्य कभी समाप्त नहीं होता है। इस पाठ से धन-संपदा, यश-कीर्ति, ऐश्वर्य, संतान आदि की प्राप्ति होती है और मनुष्य सौ साल से अधिक वर्षों तक जीवित रहता है।

भगवान श्री लक्ष्मी नारायण धाम के महामंत्री सुशील वर्मा गुरुदास ने कहा कि आज गुरु पूर्णिमा का पावन दिवस भगवान श्री लक्ष्मी नारायण धम के करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए कृतज्ञता जताने का शुभ अवसर है। सद्गुरुदेव ने हमें बीज मंत्रों की कृपा तो प्रदान की ही है साथ ही दैवव्यपाश्रय रूपी अमृत भी प्रदान किया है, जिसके फलस्वरूप पूरे विश्व में 50 करोड़ से अधिक श्रद्धालु लाभान्वित हुए हैं। दैवव्यपाश्रय एक दिव्य अलौकिक विज्ञान है। इस औषधि का मूलाधार पर प्रयोग करने से तुरंत ही रोग समाप्त हो जाते हैं। पश्चिमी देशों के समागमों में इस औषधि का प्रयोग करने के बाद श्रद्धालुओं ने अपने अनुभव भी सुनाए।
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