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Mathura News: दुनिया में हो रहे खूनी संघर्ष को भारतीय संस्कृति के संदेश से रोका जा सकता है
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कार्यक्रम को संबोधित करते बिहार के राज्यपाल मोहम्मद आरिफ खान।
वृंदावन। बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि दुनिया में हमसे भी पुरानी संस्कृति थी लेकिन पांच हजार साल पुरानी मानी जाने वाली भारतीय संस्कृति आज भी निरंतरता लिए हैं। यह संस्कृति प्राचीन होने के साथ ही मृत्युंजय भी है। भारतीय संस्कृति के संदेश के माध्यम से दुनिया में चौतरफा जो खूनी संघर्ष हो रहा है वह रोका जा सकता है। कहा कि भारतीय संस्कृति की जीवंतता के पीछे संत, भागवताचार्य हैं, जो श्रद्धा के पटल पर पूरा जीवन गुजार देते हैं।
यह बात उन्होंने परिक्रमा मार्ग स्थित ब्रज धाम में आयोजित रामकथा के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने राम कथा का श्रवण कराने वाले स्वामी रामह्रदय दास को कश्मीरी अंजीर तोहफे के रूप में दिए। कथा वाचक ने स्मृति चिह्न प्रदान कर उनका स्वागत किया। राज्यपाल ने कहा कि श्रद्धा के आदर्श संत, कथा वाचक लोक शिक्षक हैं, जो अपना जीवन इसी काम में लगा देते हैं। पांच हजार साल पहले हमारे ऋषियों-मुनियों ने जो आदर्श और मूल्य तय किए थे, आज जब इनकी वाणी सुनते हैं तो हमारे दिल में अपनी संस्कृति के लिए भाव एवं प्यार पैदा होता है।
उन्होंने कहा कि संतों ने भारतीय परंपराओं को जिंदा रखा है। भारतीय संस्कृति श्रेष्ठ है। यह हममें अहंकार पैदा नहीं होने देती। यह बताती है कि जो ब्रह्म मेरे ह्रदय में निवास करता है वह सबके ह्रदय में वास करता है। परम चेतना ही ब्रह्म है। उन्होंने कहा कि दुनिया में पहली बार 1948 में संयुक्त राष्ट्र में स्वीकार किया कि मानव के तौर पर प्रतिष्ठा का अधिकार मिला और भारत ने हजारों साल पहले दुनिया में घोषणा की कि मानव के अंदर बुनियादी तौर पर दिव्यता है। यह हमारी कमी है जो माननी चाहिए कि यह संदेश दुनिया को ठीक से बता नहीं सके।
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यह बात उन्होंने परिक्रमा मार्ग स्थित ब्रज धाम में आयोजित रामकथा के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने राम कथा का श्रवण कराने वाले स्वामी रामह्रदय दास को कश्मीरी अंजीर तोहफे के रूप में दिए। कथा वाचक ने स्मृति चिह्न प्रदान कर उनका स्वागत किया। राज्यपाल ने कहा कि श्रद्धा के आदर्श संत, कथा वाचक लोक शिक्षक हैं, जो अपना जीवन इसी काम में लगा देते हैं। पांच हजार साल पहले हमारे ऋषियों-मुनियों ने जो आदर्श और मूल्य तय किए थे, आज जब इनकी वाणी सुनते हैं तो हमारे दिल में अपनी संस्कृति के लिए भाव एवं प्यार पैदा होता है।
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उन्होंने कहा कि संतों ने भारतीय परंपराओं को जिंदा रखा है। भारतीय संस्कृति श्रेष्ठ है। यह हममें अहंकार पैदा नहीं होने देती। यह बताती है कि जो ब्रह्म मेरे ह्रदय में निवास करता है वह सबके ह्रदय में वास करता है। परम चेतना ही ब्रह्म है। उन्होंने कहा कि दुनिया में पहली बार 1948 में संयुक्त राष्ट्र में स्वीकार किया कि मानव के तौर पर प्रतिष्ठा का अधिकार मिला और भारत ने हजारों साल पहले दुनिया में घोषणा की कि मानव के अंदर बुनियादी तौर पर दिव्यता है। यह हमारी कमी है जो माननी चाहिए कि यह संदेश दुनिया को ठीक से बता नहीं सके।
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