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Mathura News: रामभक्तों ने नरहोली थाने का नाम रख दिया था नरबलि
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मथुरा। 90वें का वो दशक था। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति का आंदोलन अपने चरम पर था। मथुरा इस आंदोलन की राजधानी के तौर पर जाना जाने लगा। मुलायम सिंह यादव उप्र के मुख्यमंत्री थे। 1990 का गोलीकांड होकर चुका था। इसके बाद आंदोलनकारियों में उबाल था। इस दौरान मथुरा के नरहोली (अब हाईवे) थाना को आंदोलनकारियों ने नरबलि थाने का नाम दे दिया था। उस दौर के आंदोलनकारी बताते हैं कि शहर में पुलिस आंदोलनकारियों को तलाशती थी। गिरफ्तारी के बाद नरहोली थाने में ले जाया जाता था। यहां पुलिस ने टॉर्चर रूम बना रखा था। उसी में यातनाएं दी जातीं थीं।
1990 में विहिप के जिला मंत्री रहे आचार्य ब्रजेंद्र नागर ने बताया कि राजस्थान में उस भक्त भाजपा की सरकार थी। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति का आंदोलन अपने चरम पर था। उस वक्त मथुरा आंदोलन का केंद्र हुआ करता था। राजस्थान से आने वाली ट्रेनों को नरहोली (अब हाईवे थाना) पुलिस आउटर पर रोकती थी। राजस्थान से आने वाले लोगों को उतार लिया जाता था, जिनके भी परिचित या रिश्तेदार आंदोलन से जुड़े हुए पाए जाते थे। उनको नरहोली थाने में ले जाकर उनसे बर्बरता की जाती थी।
ब्रजेंद्र नागर बताते हैं कि उनके सगे साले दीपक नागर और राजेश नागर, उस वक्त जयपुर से मथुरा आए थे। नरहोली थाना पुलिस ने उन्हें अवैध रूप से हिरासत में लिया और इतना मारा कि दोनों के एक-एक हाथ में फ्रैक्चर हो गया। इसके बाद एटा जेल में बंद किया गया।
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नरहोली गांव के नाम पर पड़ा था थाने का नाम
नरहोली थाना अब हाईवे थाने के नाम से जाना जाता है। इस थाने को 1973 में स्थापित किया गया था। उस वक्त सीओडी की बिल्डिंग से थाना संचालित हुआ करता था। 17 मार्च 1979 में इस थाने के लिए हाईवे किनारे भूमि आवंटित हुई। पांच जनवरी 1987 को थाने की बिल्डिंग का शिलान्यास हुआ। 8 अप्रैल 1989 में थाने का उद्घाटन तत्कालीन सीएम एनडी तिवारी ने किया था। जनवरी 2004 में इस थाने का नाम नरहोली से बदलकर हाईवे थाना रखा गया। पुलिस स्तर से यह कहा जाता है कि इस थाने में हिरासत में मौत होने की कई घटनाएं हुईं। इसके चलते इस थाने का नाम बदला गया था।
वो दे गए जवानी की कुर्बानी, मंदिर बनता देख रूह हो रही रूमानी
मथुरा। ब्रज के आंदोलनकारियों की देन को अयोध्या में बन रहे भव्य-दिव्य श्रीराम मंदिर के इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। 1985 से लेकर 1992 तक यहां के नौजवान कंधे से कंधा मिलाकर साधु-संतों के साथ खड़े हुए। विश्व हिंदू परिषद से जुड़कर इन नौजवानों ने अपनी जवानी श्रीराम मंदिर के आंदोलन को कुर्बान कर दी। अब अयोध्या में भव्य मंदिर का सपना साकार होने पर उनकी रूह भी रूमानी हो गई है।
विश्व हिंदू परिषद के जिलाध्यक्ष अमित जैन बताते हैं कि उस दौरान में आंदोलन में अग्रणी भूमिका में विहिप के तत्कालीन जिलाध्यक्ष राधेनारायण भारद्वाज रहे। वे अभी जिंदा हैं। राधेनारायण भारद्वाज बताते हैं कि उस दौर का बच्चा-बच्चा राम जन्मभूमि के काज में जुटा हुआ था। अमित जैन के अनुसार इनके अलावा ब्रजकिशोर तिवारी प्रांतीय संत धर्माचार्य प्रमुख, वासुदेव भाटिया आगरा विभाग के मंत्री, विहिप, भूदेव प्रसाद शर्मा, विहिप के प्रांतीय पदाधिकारी, श्रीनिवास शर्मा, सहमंत्री विश्व हिंदू परिषद ने भी बढ़-चढ़कर आंदोलन में भाग लिया था। इन चारों की मृत्यु हो चुकी है।
उप्र में सबसे अधिक मथुरा के आंदोलनकारियों पर लगी थी रासुका
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन पूरे देश-उप्र में तेजी से 1990 में हुआ था। उस समय आंदोलनकारियों पर रासुका की कार्रवाई की गई थी। इनमें सबसे अधिक संख्या मथुरा के आंदोलनकारियों की थी। 1990 में मथुरा के वीरेंद्र अग्रवाल, चिंता हरण चतुर्वेदी, बालकृष्ण चतुर्वेदी, रविकांत गर्ग, गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी, बांके बिहारी माहेश्वरी, राम प्रसाद कमल, विजय बहादुर सिंह, अजय कुमार पोहिया, चतुर्भुज सराफ पर रासुका की कार्रवाई की गई थी।
श्रीराम के काज से वंचित, श्रीकृष्ण की लीला से पूजित
मथुरा। गोवर्धन महाराज पर्वत का नाता त्रेता युग से जुड़ा है। ग्रंथों में उल्लेख है कि भगवान हनुमान राम सेतु के निर्माण को हिमालय से लेकर गोवर्धन पर्वत को लेकर आए थे, मगर सेतु कार्य पूरा होने के चलते पर्वत को उन्होंने मथुरा में स्थापित कर दिया था। उस समय हनुमान जी ने ही वादा किया था कि त्रेता में तुम राम के काज से वंचित रहे। मगर, द्वापर में श्रीकृष्ण तुम्हें पूजित कर देंगे।
ब्रज एवं श्रीकृष्ण पर शोध करने वाले पीएचडी स्कॉलर महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि आज हम गोवर्धन पर्वत को श्रीकृष्ण के रूप में भी पूजते है। श्रीकृष्ण ने खुद ‘कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा’ के दिन गोवर्धन रूप में अपनी पूजा किए जाने की बात कही थी, मगर इस पर्वत का उल्लेख क्षेपक रामायण में मिलता है, जिसके अनुसार गोवर्धन महाराज का नाता त्रेता युग से जुड़ा है। क्षेपक रामायण में उल्लेख है कि जब त्रेता युग में भगवान श्रीराम के नेतृत्व में राम सेतु का निर्माण कार्य चल रहा था। उस समय हनुमान जी ने कुछ वानरों को बात करते सुना कि अगर बीच समुद्र में कोई बड़ा पर्वत रख दिया जाए तो सेतु निर्माण का कार्य जल्दी पूरा हो जाएगा। ये सुनते ही हनुमान जी एक बड़े पर्वत की खोज में हिमालय पर्वत की ओर निकाल गए और उन्हें गोवर्धन पर्वत मिला।
वे पर्वत को उठाने लगे, तब गोवर्धन पर्वत बहुत क्रोधित हो गए और उनसे बोले ‘में अपने स्थान से नहीं हिलूंगा’, तब हनुमान जी ने गोवर्धन पर्वत से विनती की, और सेतु निर्माण की बात बताई। तब भगवान श्रीराम के कार्य में अपना योगदान देने के लिए गोवर्धन पर्वत तैयार हो गए। पर्वत उठा कर श्रीलंका जाते हुए, हनुमान जी को जानकारी मिली कि राम सेतु का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। उन्होंने पर्वत को उसी जमीन पर रख दिया, जो आज मथुरा वृंदावन कहलाती है।
पर्वत ये देखकर बेहद दुखी हो गए, अब उन्होंने हनुमान जी से कहा ‘में न ही हिमालय पर रह सका और न ही भगवान राम के किसी काम आया। तब हनुमान जी ने पर्वत से वादा किया की भगवान श्रीराम कभी अपने भक्तों को निराश नहीं करेंगे। एक दिन भगवान तुम्हें साक्षात दर्शन तो देंगे ही, और साथ ही साथ तुम भगवान के कार्य में भी आओगे। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण, जो विष्णु जी का अवतार हैं, उन्होंने गोवर्धन पर्वत की मदद से गोकुल वासियों की रक्षा इंद्र के प्रकोप से की थी। तभी से गोवर्धन पर्वत पूजित है। संवाद
1990 में विहिप के जिला मंत्री रहे आचार्य ब्रजेंद्र नागर ने बताया कि राजस्थान में उस भक्त भाजपा की सरकार थी। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति का आंदोलन अपने चरम पर था। उस वक्त मथुरा आंदोलन का केंद्र हुआ करता था। राजस्थान से आने वाली ट्रेनों को नरहोली (अब हाईवे थाना) पुलिस आउटर पर रोकती थी। राजस्थान से आने वाले लोगों को उतार लिया जाता था, जिनके भी परिचित या रिश्तेदार आंदोलन से जुड़े हुए पाए जाते थे। उनको नरहोली थाने में ले जाकर उनसे बर्बरता की जाती थी।
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ब्रजेंद्र नागर बताते हैं कि उनके सगे साले दीपक नागर और राजेश नागर, उस वक्त जयपुर से मथुरा आए थे। नरहोली थाना पुलिस ने उन्हें अवैध रूप से हिरासत में लिया और इतना मारा कि दोनों के एक-एक हाथ में फ्रैक्चर हो गया। इसके बाद एटा जेल में बंद किया गया।
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नरहोली गांव के नाम पर पड़ा था थाने का नाम
नरहोली थाना अब हाईवे थाने के नाम से जाना जाता है। इस थाने को 1973 में स्थापित किया गया था। उस वक्त सीओडी की बिल्डिंग से थाना संचालित हुआ करता था। 17 मार्च 1979 में इस थाने के लिए हाईवे किनारे भूमि आवंटित हुई। पांच जनवरी 1987 को थाने की बिल्डिंग का शिलान्यास हुआ। 8 अप्रैल 1989 में थाने का उद्घाटन तत्कालीन सीएम एनडी तिवारी ने किया था। जनवरी 2004 में इस थाने का नाम नरहोली से बदलकर हाईवे थाना रखा गया। पुलिस स्तर से यह कहा जाता है कि इस थाने में हिरासत में मौत होने की कई घटनाएं हुईं। इसके चलते इस थाने का नाम बदला गया था।
वो दे गए जवानी की कुर्बानी, मंदिर बनता देख रूह हो रही रूमानी
मथुरा। ब्रज के आंदोलनकारियों की देन को अयोध्या में बन रहे भव्य-दिव्य श्रीराम मंदिर के इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। 1985 से लेकर 1992 तक यहां के नौजवान कंधे से कंधा मिलाकर साधु-संतों के साथ खड़े हुए। विश्व हिंदू परिषद से जुड़कर इन नौजवानों ने अपनी जवानी श्रीराम मंदिर के आंदोलन को कुर्बान कर दी। अब अयोध्या में भव्य मंदिर का सपना साकार होने पर उनकी रूह भी रूमानी हो गई है।
विश्व हिंदू परिषद के जिलाध्यक्ष अमित जैन बताते हैं कि उस दौरान में आंदोलन में अग्रणी भूमिका में विहिप के तत्कालीन जिलाध्यक्ष राधेनारायण भारद्वाज रहे। वे अभी जिंदा हैं। राधेनारायण भारद्वाज बताते हैं कि उस दौर का बच्चा-बच्चा राम जन्मभूमि के काज में जुटा हुआ था। अमित जैन के अनुसार इनके अलावा ब्रजकिशोर तिवारी प्रांतीय संत धर्माचार्य प्रमुख, वासुदेव भाटिया आगरा विभाग के मंत्री, विहिप, भूदेव प्रसाद शर्मा, विहिप के प्रांतीय पदाधिकारी, श्रीनिवास शर्मा, सहमंत्री विश्व हिंदू परिषद ने भी बढ़-चढ़कर आंदोलन में भाग लिया था। इन चारों की मृत्यु हो चुकी है।
उप्र में सबसे अधिक मथुरा के आंदोलनकारियों पर लगी थी रासुका
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन पूरे देश-उप्र में तेजी से 1990 में हुआ था। उस समय आंदोलनकारियों पर रासुका की कार्रवाई की गई थी। इनमें सबसे अधिक संख्या मथुरा के आंदोलनकारियों की थी। 1990 में मथुरा के वीरेंद्र अग्रवाल, चिंता हरण चतुर्वेदी, बालकृष्ण चतुर्वेदी, रविकांत गर्ग, गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी, बांके बिहारी माहेश्वरी, राम प्रसाद कमल, विजय बहादुर सिंह, अजय कुमार पोहिया, चतुर्भुज सराफ पर रासुका की कार्रवाई की गई थी।
श्रीराम के काज से वंचित, श्रीकृष्ण की लीला से पूजित
मथुरा। गोवर्धन महाराज पर्वत का नाता त्रेता युग से जुड़ा है। ग्रंथों में उल्लेख है कि भगवान हनुमान राम सेतु के निर्माण को हिमालय से लेकर गोवर्धन पर्वत को लेकर आए थे, मगर सेतु कार्य पूरा होने के चलते पर्वत को उन्होंने मथुरा में स्थापित कर दिया था। उस समय हनुमान जी ने ही वादा किया था कि त्रेता में तुम राम के काज से वंचित रहे। मगर, द्वापर में श्रीकृष्ण तुम्हें पूजित कर देंगे।
ब्रज एवं श्रीकृष्ण पर शोध करने वाले पीएचडी स्कॉलर महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि आज हम गोवर्धन पर्वत को श्रीकृष्ण के रूप में भी पूजते है। श्रीकृष्ण ने खुद ‘कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा’ के दिन गोवर्धन रूप में अपनी पूजा किए जाने की बात कही थी, मगर इस पर्वत का उल्लेख क्षेपक रामायण में मिलता है, जिसके अनुसार गोवर्धन महाराज का नाता त्रेता युग से जुड़ा है। क्षेपक रामायण में उल्लेख है कि जब त्रेता युग में भगवान श्रीराम के नेतृत्व में राम सेतु का निर्माण कार्य चल रहा था। उस समय हनुमान जी ने कुछ वानरों को बात करते सुना कि अगर बीच समुद्र में कोई बड़ा पर्वत रख दिया जाए तो सेतु निर्माण का कार्य जल्दी पूरा हो जाएगा। ये सुनते ही हनुमान जी एक बड़े पर्वत की खोज में हिमालय पर्वत की ओर निकाल गए और उन्हें गोवर्धन पर्वत मिला।
वे पर्वत को उठाने लगे, तब गोवर्धन पर्वत बहुत क्रोधित हो गए और उनसे बोले ‘में अपने स्थान से नहीं हिलूंगा’, तब हनुमान जी ने गोवर्धन पर्वत से विनती की, और सेतु निर्माण की बात बताई। तब भगवान श्रीराम के कार्य में अपना योगदान देने के लिए गोवर्धन पर्वत तैयार हो गए। पर्वत उठा कर श्रीलंका जाते हुए, हनुमान जी को जानकारी मिली कि राम सेतु का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। उन्होंने पर्वत को उसी जमीन पर रख दिया, जो आज मथुरा वृंदावन कहलाती है।
पर्वत ये देखकर बेहद दुखी हो गए, अब उन्होंने हनुमान जी से कहा ‘में न ही हिमालय पर रह सका और न ही भगवान राम के किसी काम आया। तब हनुमान जी ने पर्वत से वादा किया की भगवान श्रीराम कभी अपने भक्तों को निराश नहीं करेंगे। एक दिन भगवान तुम्हें साक्षात दर्शन तो देंगे ही, और साथ ही साथ तुम भगवान के कार्य में भी आओगे। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण, जो विष्णु जी का अवतार हैं, उन्होंने गोवर्धन पर्वत की मदद से गोकुल वासियों की रक्षा इंद्र के प्रकोप से की थी। तभी से गोवर्धन पर्वत पूजित है। संवाद

राम प्रतिष्ठा के लिए सजा नेरचौक बाजार संवाद