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‘मन की दुर्बलता दूर करना ही गीता का उद्देश्य’
ब्यूरो, अमर उजाला मथुरा
Updated Sun, 25 Oct 2015 11:50 PM IST
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अमरनाथ शिक्षण संस्थान में श्रीअरविन्द सोसायटी हिंदी क्षेत्रीय समिति के 16वें वार्षिक अधिवेशन के अंतिम दिन रविवार को ‘श्रीअरविन्द के काव्य में श्रीकृष्ण’ विषय पर वक्ताओं ने विचार रखे।
साथ ही गीता के उद्देश्य पर भी मंथन किया गया। वक्ताओं ने कहा कि मन की दुर्बलता को दूर करना ही गीता का उद्देश्य है। आयोजन में श्रीकृष्णलीलामृत श्रीगणेश वंदना और मयूर नृत्य ने समां बांध दिया। वेणु कला केन्द्र के कलाकारों ने भगवान के दशावतारों का भव्य मंचन किया।
मुख्य वक्ता सुरेश त्यागी ने ‘श्रीअरविन्द के काव्य में श्रीकृष्ण’ विष्य पर कहा कि श्रीअरविन्द बड़े ही उच्च कोटि के कवि थे। उन्होंने अपने व्यापक काव्य में भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न स्वरूप का बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जीएलए विश्वविद्यालय के कुलपति डीएस चौहान ने कहा कि महापुरुष हमेशा आगे की सोचते हैं।
अधिवेशन के अगले सत्र में वक्ताओं ने श्रीअरविन्द की दृष्टि में गीता विषय पर बोलते हुए कहा कि उनका पहला योग गीता ही है। भगवान की दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है।
इसी विषय पर चरणसिंह केदारखंडी ने कहा कि श्रीअरविन्द का साहित्य भविष्य दृष्टि का है। भगवान श्रीकृष्ण श्रीअरविन्द के काव्य में हर जगह उपस्थित हैं।
अधिवेशन के समापन सत्र में स्वामी गोविन्दानन्द तीर्थ महाराज ने कहा कि अनन्त का रंग नीला है और भगवान श्रीकृष्ण भी अनन्त हैं। उन्होंने राधाजी का जिक्र करते हुए कहा कि राधाजी भगवान श्रीकृष्ण को देखने की दूरबीन है।
मन की दुर्बलता को दूर करना ही गीता का उद्देश्य है। उन्होंने स्वार्थ को छोड़कर समाज और राष्ट्र के हितों को ध्यान में रखकर ही महत्वपूर्ण निर्णय लेने की सीख दी। समापन की सत्र की अध्यक्षता हिंदी क्षेत्रीय समिति के चेयरमैन विजय पोद्दार ने की।
सांस्कृतिक कार्यक्रम में पद्मश्री कृष्ण कन्हाई चित्रकार मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अमरनाथ शिक्षण संस्थान के चेयरमैन डा. आदित्य कुमार वाजपेयी ने स्वामी गोविन्दानन्द और देशभर से पधारे श्रीअरविन्द सोसाइटी के साधकों का आभार व्यक्त किया। लगभग 12 राज्यों के पांच सौ से अधिक साधक मौजूद रहे।
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साथ ही गीता के उद्देश्य पर भी मंथन किया गया। वक्ताओं ने कहा कि मन की दुर्बलता को दूर करना ही गीता का उद्देश्य है। आयोजन में श्रीकृष्णलीलामृत श्रीगणेश वंदना और मयूर नृत्य ने समां बांध दिया। वेणु कला केन्द्र के कलाकारों ने भगवान के दशावतारों का भव्य मंचन किया।
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मुख्य वक्ता सुरेश त्यागी ने ‘श्रीअरविन्द के काव्य में श्रीकृष्ण’ विष्य पर कहा कि श्रीअरविन्द बड़े ही उच्च कोटि के कवि थे। उन्होंने अपने व्यापक काव्य में भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न स्वरूप का बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जीएलए विश्वविद्यालय के कुलपति डीएस चौहान ने कहा कि महापुरुष हमेशा आगे की सोचते हैं।
अधिवेशन के अगले सत्र में वक्ताओं ने श्रीअरविन्द की दृष्टि में गीता विषय पर बोलते हुए कहा कि उनका पहला योग गीता ही है। भगवान की दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है।
इसी विषय पर चरणसिंह केदारखंडी ने कहा कि श्रीअरविन्द का साहित्य भविष्य दृष्टि का है। भगवान श्रीकृष्ण श्रीअरविन्द के काव्य में हर जगह उपस्थित हैं।
अधिवेशन के समापन सत्र में स्वामी गोविन्दानन्द तीर्थ महाराज ने कहा कि अनन्त का रंग नीला है और भगवान श्रीकृष्ण भी अनन्त हैं। उन्होंने राधाजी का जिक्र करते हुए कहा कि राधाजी भगवान श्रीकृष्ण को देखने की दूरबीन है।
मन की दुर्बलता को दूर करना ही गीता का उद्देश्य है। उन्होंने स्वार्थ को छोड़कर समाज और राष्ट्र के हितों को ध्यान में रखकर ही महत्वपूर्ण निर्णय लेने की सीख दी। समापन की सत्र की अध्यक्षता हिंदी क्षेत्रीय समिति के चेयरमैन विजय पोद्दार ने की।
सांस्कृतिक कार्यक्रम में पद्मश्री कृष्ण कन्हाई चित्रकार मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अमरनाथ शिक्षण संस्थान के चेयरमैन डा. आदित्य कुमार वाजपेयी ने स्वामी गोविन्दानन्द और देशभर से पधारे श्रीअरविन्द सोसाइटी के साधकों का आभार व्यक्त किया। लगभग 12 राज्यों के पांच सौ से अधिक साधक मौजूद रहे।