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मथुरा: पांडुलिपियां हैं ब्रज के अज्ञात इतिहास की प्रमुख स्त्रोत
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संस्कृति शोध संस्थान के सचिव लक्ष्मी नारायण तिवारी दुर्लभ ग्रंथ दिखाते हुए।
- फोटो : VRINDAVAN
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वृंदावन (मथुरा)। गोदा बिहार मंदिर स्थित ब्रज संस्कृति शोध संस्थान को दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों की प्राप्ति पर संस्थान के सचिव लक्ष्मीनारायण तिवारी ने कहा कि 16वीं सदी से भारत की वैष्णव संस्कृति का केंद्र रहा है। यहां विपुल भक्ति का साहित्य रचा गया है, जो अभी तक अप्रकाशित पांडुलिपि संपदा के रूप में है जिस के संरक्षण और प्रकाशन के लिए हम संकल्पित हैं।
उन्होंने कहा कि संस्थान में प्रति वर्ष प्राचीन पांडुलिपियों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। संस्थान के प्रकाशन अधिकारी गोपाल शरण शर्मा के सद् प्रयासों से वृंदावन से ही 30 दुर्लभ ग्रंथों की प्राप्ति हुई है। जिन ग्रंथों में ब्रज के विभिन्न भक्ति संप्रदायों के ग्रंथों के अतिरिक्त महाभारत के पंचरत्न जिनमें गीता, विष्णु सहस्त्रनाम, अनु स्मृति, भीष्म स्तवराज, गजेंद्र मोक्ष की सचित्र पांडुलिपि भी शामिल हैं।
संस्थान को ग्रंथ दान करने वाले ब्राह्मण महासभा के संस्थापक सुरेशचंद्र शर्मा एवं श्रीरामकृष्ण विवेकानंद विद्यालय के सचिव सव्यसांची घोष ने कहा कि ब्रज संस्कृति शोध संस्थान विगत 11 वर्षों से संस्कृति की सेवा बिना किसी सरकारी अनुदान के नि:स्वार्थ भाव से कर रहा है।
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उन्होंने कहा कि संस्थान में प्रति वर्ष प्राचीन पांडुलिपियों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। संस्थान के प्रकाशन अधिकारी गोपाल शरण शर्मा के सद् प्रयासों से वृंदावन से ही 30 दुर्लभ ग्रंथों की प्राप्ति हुई है। जिन ग्रंथों में ब्रज के विभिन्न भक्ति संप्रदायों के ग्रंथों के अतिरिक्त महाभारत के पंचरत्न जिनमें गीता, विष्णु सहस्त्रनाम, अनु स्मृति, भीष्म स्तवराज, गजेंद्र मोक्ष की सचित्र पांडुलिपि भी शामिल हैं।
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संस्थान को ग्रंथ दान करने वाले ब्राह्मण महासभा के संस्थापक सुरेशचंद्र शर्मा एवं श्रीरामकृष्ण विवेकानंद विद्यालय के सचिव सव्यसांची घोष ने कहा कि ब्रज संस्कृति शोध संस्थान विगत 11 वर्षों से संस्कृति की सेवा बिना किसी सरकारी अनुदान के नि:स्वार्थ भाव से कर रहा है।
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