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पांडव वंश की कुलदेवी हैं मां मंशा देवी
अमर उजाला मथुरा
Updated Tue, 04 Apr 2017 11:35 PM IST
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मां मंशा देवी
- फोटो : अमर उजाला
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खुटैल पट्टी की आराध्य कुल देवी मां मंशा देवी के मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। मंदिर पर चैत्र शुक्लपक्ष की त्रयोदशी से पूर्णमासी तक मेला लगता है। देश-विदेश में बसे खुटैल वंश के लोग अपने बच्चों का मुंडन संस्कार इन्हीं दिनों में मंशा देवी के चरणों में आकर कराते हैं।
मंशा देवी का मंदिर मथुरा-भरतपुर मार्ग पर गोपालपुर गांव के निकट पीली मिट्टी के 50 फीट ऊंचे एक हजार वर्ग मीटर के चबूतरे पर बना है। मंदिर में अंकित शिला लेख से पता चलता है कि इस का निर्माण पांडवों की 71वीं पीढ़ी में जन्मे जाट राजा सम्राट अग्नपाल नाग ने विक्रम सवत् 1094 को फागुन मास की पंचमी को कराया था। राजा अग्नपाल को मंशा देवी ने स्वप्न में मंदिर निर्माण की बात कही थी। राजा अग्नपाल के दरबार में एक बार महर्षि वेद व्यास आए। मां की पूजा से प्रेरित होकर उन्होंने राजा से वरदान मांगने को कहा। राजा ने दो वरदान मांगे। पहला वरदान पुत्र प्राप्ति और दूसरे में राज्य अटल रहे। वेद व्यास ने पुत्र के वरदान के साथ एक बबूल की एक लकड़ी महल के बीचों बीच गाढ़ दी और कहा कि राजन तेरा राज्य अटल हो गया। यह खूंटी भगवान शेषनाग की फन पर टिकी है।
राजा को भ्रम हो गया कि खूंटी शेषनाग के फन पर पहुंच गई। राजा ने भ्रम वश उसे उखाड़ दिया तो देखा कि खूंटी की नोंक पर खून लगा है। राजा इसे देख घबरा गया। बताते हैं कि सम्राट अग्नपाल के आठ पुत्र हुए। उन्होंने आठ गड़ बनाए जो आज भी खुटैली के आठ खेरों के नाम से जाने जाते हैं।
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खुटैल वंश उन्हीं पुत्रों की संतान है। खुटैल वंश अपनी आराध्य कुल देवी मंशा की पूजा करता चला रहा है। मंदिर का दोबारा निर्माण खुटैल पट्टी के लोगों ने कराया। देवी मंदिर के मुख्यद्वार पर राजा अग्नपाल की भव्य प्रतिमा स्थापित की जो देवी के सामने हाथ जोड़े हैं।
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मंशा देवी का मंदिर मथुरा-भरतपुर मार्ग पर गोपालपुर गांव के निकट पीली मिट्टी के 50 फीट ऊंचे एक हजार वर्ग मीटर के चबूतरे पर बना है। मंदिर में अंकित शिला लेख से पता चलता है कि इस का निर्माण पांडवों की 71वीं पीढ़ी में जन्मे जाट राजा सम्राट अग्नपाल नाग ने विक्रम सवत् 1094 को फागुन मास की पंचमी को कराया था। राजा अग्नपाल को मंशा देवी ने स्वप्न में मंदिर निर्माण की बात कही थी। राजा अग्नपाल के दरबार में एक बार महर्षि वेद व्यास आए। मां की पूजा से प्रेरित होकर उन्होंने राजा से वरदान मांगने को कहा। राजा ने दो वरदान मांगे। पहला वरदान पुत्र प्राप्ति और दूसरे में राज्य अटल रहे। वेद व्यास ने पुत्र के वरदान के साथ एक बबूल की एक लकड़ी महल के बीचों बीच गाढ़ दी और कहा कि राजन तेरा राज्य अटल हो गया। यह खूंटी भगवान शेषनाग की फन पर टिकी है।
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राजा को भ्रम हो गया कि खूंटी शेषनाग के फन पर पहुंच गई। राजा ने भ्रम वश उसे उखाड़ दिया तो देखा कि खूंटी की नोंक पर खून लगा है। राजा इसे देख घबरा गया। बताते हैं कि सम्राट अग्नपाल के आठ पुत्र हुए। उन्होंने आठ गड़ बनाए जो आज भी खुटैली के आठ खेरों के नाम से जाने जाते हैं।
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खुटैल वंश उन्हीं पुत्रों की संतान है। खुटैल वंश अपनी आराध्य कुल देवी मंशा की पूजा करता चला रहा है। मंदिर का दोबारा निर्माण खुटैल पट्टी के लोगों ने कराया। देवी मंदिर के मुख्यद्वार पर राजा अग्नपाल की भव्य प्रतिमा स्थापित की जो देवी के सामने हाथ जोड़े हैं।