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Mathura News: मथुरा की गलियों में ढपली बजाकर बड़े हुए थे गीतकार शैलेंद्र
Wed, 30 Aug 2023 11:53 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
Updated Wed, 30 Aug 2023 11:53 PM IST
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रामकुमार रौतेलामथुरा। देश के प्रख्यात गीतकार शैलेंद्र उर्फ शंकर का बचपन मथुरा के धौली प्याऊ इलाके की गलियों में बीता। हालांकि यह कुछेक लोग ही जानते हैं। धौली प्याऊ इलाके की जिस गली में वह रहते थे, उसमें रहने वाले कुछ बुजुर्गों के जेहन में उनकी धुंधली यादें हैं। वे इन्हीं गलियों में ढपली बजाकर कविता पाठ करते हुए बड़े हुए। पिता और भाई की मथुरा रेलवे में नौकरी होने के कारण उनकी प्रारंभिक शिक्षा यहीं हुई। बाद में उन्हें भी यहीं रेलवे में नौकरी मिल गई। हालांकि मथुरा छोड़ने के बाद वे सिर्फ एक बार ही यहां आए, लेकिन एक-दो अजीज मित्रों के पास उनके लिखे पत्र अवश्य आते थे, जो उन्होंने आज भी धरोहर के रूप में संजो रखें हैं।
मथुरा में बहुत कम लोगों को ही जानकारी है कि देश के प्रख्यात गीतकार शैलेंद्र बचपन में मथुरा की गलियों में कविताएं, गीत गुनगुनाते और ढपली बजाते थे। 100 साल पहले रावलपिंडी (पाकिस्तान) में 30 अगस्त 1923 को शैलेंद्र का जन्म हुआ। पिता और बडे़ भाई की रेलवे में नौकरी के कारण वे मथुरा आ गए। धौली प्याऊ की गली गंगा सिंह और स्टेट बैंक के निकट रेलवे कॉलोनी में उनका निवास हुआ करता था। रेलवे कॉलोनी का एक द्वार रोडवेज वर्कशॉप के सामने खुलता था, जहां रहने वाले विशम्भर नाथ सेठ के पुत्र द्वारिकानाथ से उनकी गहरी दोस्ती थी। द्वारिकानाथ बांसुरी तो शैलेंद्र ढपली बजाते हुए गीत गुनगुनाते थे। उनकी माध्यमिक शिक्षा किशोरी रमण इंटर कॉलेज में हुई। यहां से स्थानांतरण के बाद शैलेंद्र परिवार के साथ मुंबई चले गए और फिर गीतों की दुनिया के सरताज बन गए।
शैलेंद्र के नाम पर रखा अपने बेटे का नाम
द्वारिकानाथ की 83 वर्षीय पत्नी पुष्पा सेठ बताती हैं कि उनके घर में शैलेंद्र और उनकी भाभी का आना जाना था। पति द्वारिकानाथ के साथ शैलेंद्र की अच्छी दोस्ती थी। उनके पति बांसुरी और शैलेंद्र ढपली बजाते थे। वह गीत लिखकर उन्हें गुनगुनाते थे। वे काफी समय हमारे घर पर ही बिताते थे। उसक वक्ता पता नहीं था कि शैलेंद्र एक दिन देश के महान गीतकार बनेंगे। पुष्पा बताती हैं कि शैलेंद्र की मौत के बाद उनके पति द्वारिकानाथ ने हमारे सबसे छोटे बेटे का नाम भी शैलेंद्र ही रखा।
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धरोहर के रूप में मौजूद है शैलेंद्र का पत्र
द्वारिकानाथ के पुत्र भारत सेठ ने बताया कि शैलेंद्र ने मुंबई जाने के बहुत वर्षों बाद एक पत्र उनके पिता के नाम लिखा था, जो उनके पास आज भी मौजूद है। इसमें शैलेंद्र ने उनके पिता को लिखा है कि घर का सही पता न होने के कारण पत्र नहीं भेज सका। मुंबई आए बाबूलाल से सही पता मिला। मैंने एक फिल्म तीसरी कसम बनाई है, जो अगस्त में प्रदर्शित हो जाएगी । मेरे पांच पुत्र और पुत्रियां हैं। उनकी उम्र का भी उल्लेख शैलेंद्र ने इस पत्र में किया है। यह पत्र आज भी धरोहर के रूप में हमारे पास मौजूद है।
धौलीप्याऊ की गली गंगा सिंह निवासी ओमप्रकाश शर्मा ने बताया कि शैलेंद्र उनके मकान में किराए पर रहते थे। हालांकि उस वक्त यह घर उनका नहीं था। शैलेंद्र के यहां से जाने के बाद इस मकान को उन्होंने खरीदा है, लेकिन शैलेंद्र के मकान के रूप में लोगों की यादें इससे जुड़ी हुई हैं। आसपास के अनेक लोगों ने उन्हें शैलेंद्र के बचपन की जानकारी दी थी। लोग कहते थे कि गली के नुक्कड़ पर बैठकर कविता किया करते थे। यहां एक कवि सम्मेलन में भी शैलेंद्र ने कविता पाठ किया था।
द्वारिका और बाबूलाल थे गहरे दोस्त
बीएसए कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अशोक बंसल बताते हैं कि शैलेंद्र के उस वक्त बाबूलाल और द्वारिका नाम के दो गहरे दोस्त थे। बाबूलाल को गीत- संगीत से कोई लेना देना नहीं था जबकि शैलेंद्र और द्वारिका कविता और संगीत में दिलचस्पी लेते थे। बाबूलाल एक बार मुंबई जाकर शैलेंद्र की फिल्मी दुनिया अपनी आंखों दे देख आए थे। शैलेंद्र ने राजकीय इंटर काॅलेज से हाई स्कूल और केआर इंटर काॅलेज से 11वीं पास की थी। आठ साल पहले धौली प्याऊ में गली गंगा सिंह के सामने शैलेंद्र की स्मृति में जन सांस्कृतिक मंच ने एक शिला पट्टिका लगवाई, लेकिन शहर में कोई ऐसा स्थल नहीं है, जहां उनकी स्मृति में कोई स्मारक बनवाया जा सके। संवाद
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मथुरा में बहुत कम लोगों को ही जानकारी है कि देश के प्रख्यात गीतकार शैलेंद्र बचपन में मथुरा की गलियों में कविताएं, गीत गुनगुनाते और ढपली बजाते थे। 100 साल पहले रावलपिंडी (पाकिस्तान) में 30 अगस्त 1923 को शैलेंद्र का जन्म हुआ। पिता और बडे़ भाई की रेलवे में नौकरी के कारण वे मथुरा आ गए। धौली प्याऊ की गली गंगा सिंह और स्टेट बैंक के निकट रेलवे कॉलोनी में उनका निवास हुआ करता था। रेलवे कॉलोनी का एक द्वार रोडवेज वर्कशॉप के सामने खुलता था, जहां रहने वाले विशम्भर नाथ सेठ के पुत्र द्वारिकानाथ से उनकी गहरी दोस्ती थी। द्वारिकानाथ बांसुरी तो शैलेंद्र ढपली बजाते हुए गीत गुनगुनाते थे। उनकी माध्यमिक शिक्षा किशोरी रमण इंटर कॉलेज में हुई। यहां से स्थानांतरण के बाद शैलेंद्र परिवार के साथ मुंबई चले गए और फिर गीतों की दुनिया के सरताज बन गए।
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शैलेंद्र के नाम पर रखा अपने बेटे का नाम
द्वारिकानाथ की 83 वर्षीय पत्नी पुष्पा सेठ बताती हैं कि उनके घर में शैलेंद्र और उनकी भाभी का आना जाना था। पति द्वारिकानाथ के साथ शैलेंद्र की अच्छी दोस्ती थी। उनके पति बांसुरी और शैलेंद्र ढपली बजाते थे। वह गीत लिखकर उन्हें गुनगुनाते थे। वे काफी समय हमारे घर पर ही बिताते थे। उसक वक्ता पता नहीं था कि शैलेंद्र एक दिन देश के महान गीतकार बनेंगे। पुष्पा बताती हैं कि शैलेंद्र की मौत के बाद उनके पति द्वारिकानाथ ने हमारे सबसे छोटे बेटे का नाम भी शैलेंद्र ही रखा।
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धरोहर के रूप में मौजूद है शैलेंद्र का पत्र
द्वारिकानाथ के पुत्र भारत सेठ ने बताया कि शैलेंद्र ने मुंबई जाने के बहुत वर्षों बाद एक पत्र उनके पिता के नाम लिखा था, जो उनके पास आज भी मौजूद है। इसमें शैलेंद्र ने उनके पिता को लिखा है कि घर का सही पता न होने के कारण पत्र नहीं भेज सका। मुंबई आए बाबूलाल से सही पता मिला। मैंने एक फिल्म तीसरी कसम बनाई है, जो अगस्त में प्रदर्शित हो जाएगी । मेरे पांच पुत्र और पुत्रियां हैं। उनकी उम्र का भी उल्लेख शैलेंद्र ने इस पत्र में किया है। यह पत्र आज भी धरोहर के रूप में हमारे पास मौजूद है।
धौलीप्याऊ की गली गंगा सिंह निवासी ओमप्रकाश शर्मा ने बताया कि शैलेंद्र उनके मकान में किराए पर रहते थे। हालांकि उस वक्त यह घर उनका नहीं था। शैलेंद्र के यहां से जाने के बाद इस मकान को उन्होंने खरीदा है, लेकिन शैलेंद्र के मकान के रूप में लोगों की यादें इससे जुड़ी हुई हैं। आसपास के अनेक लोगों ने उन्हें शैलेंद्र के बचपन की जानकारी दी थी। लोग कहते थे कि गली के नुक्कड़ पर बैठकर कविता किया करते थे। यहां एक कवि सम्मेलन में भी शैलेंद्र ने कविता पाठ किया था।
द्वारिका और बाबूलाल थे गहरे दोस्त
बीएसए कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अशोक बंसल बताते हैं कि शैलेंद्र के उस वक्त बाबूलाल और द्वारिका नाम के दो गहरे दोस्त थे। बाबूलाल को गीत- संगीत से कोई लेना देना नहीं था जबकि शैलेंद्र और द्वारिका कविता और संगीत में दिलचस्पी लेते थे। बाबूलाल एक बार मुंबई जाकर शैलेंद्र की फिल्मी दुनिया अपनी आंखों दे देख आए थे। शैलेंद्र ने राजकीय इंटर काॅलेज से हाई स्कूल और केआर इंटर काॅलेज से 11वीं पास की थी। आठ साल पहले धौली प्याऊ में गली गंगा सिंह के सामने शैलेंद्र की स्मृति में जन सांस्कृतिक मंच ने एक शिला पट्टिका लगवाई, लेकिन शहर में कोई ऐसा स्थल नहीं है, जहां उनकी स्मृति में कोई स्मारक बनवाया जा सके। संवाद