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अन्नदाता के हिस्से में सिर्फ आंसू
ब्यूरो, अमर उजाला मथ्ाुरा
Updated Mon, 10 Aug 2015 11:51 PM IST
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डेढ़ दशक पहले तक यमुना किनारे के जिन गांवों में खुशहाली का राज था, आज वहां कंगाली घर कर गई है। दो से ढाई हजार लोगों को रोजगार देने वाले किसान अब कहीं बेलदारी कर रहे हैं तो कहीं रिक्शा चलाने को मजबूर हैं। यह स्थिति ब्रज भूमि की पेयजल समस्या के समाधान के लिए बनाए गए गोकुल बैराज के जलाशय में किसानों की जमीन डूबने से पैदा हुई।
17 साल हो गए गोकुल बैराज के डूब क्षेत्र में 11 राजस्व गांवों के किसानों की जमीन को डूबे। 942 में से अधिकांश परिवार अर्श से फर्स पर आ गए हैं, लेकिन प्रभावित किसानों को उनकी जमीन का मुआवजा नहीं मिल रहा है। इसके लिए किसानों ने अनेक बार धरना, प्रदर्शन और आंदोलन किए। पुलिस की लाठियां खाईं और जेल भी गए। अब तक किसानों को मुकदमों की पैरवी करनी पड़ रही है। सब कुछ सहने के बाद भी उन्हें मुआवजा नहीं मिल रहा है।
जिला मुख्यालय से सटे यमुना किनारे के औरंगाबाद, दामोदरपुर, रावल, मथुरा खादर, बांगर सहित 11 गांवों के संबंध में कहा जाता है कि यहां के किसानों की खुशहाली की दास्तां कभी बाहर के किसानों को भी प्रेरणा के तौर पर बताई जाती थी। इस खेती पर अधिकांश सब्जी की फसल होती थी। मध्य प्रदेश और दिल्ली की कई मंडियां में मथुरा की सब्जियां प्रख्यात थीं। खासकर हरी मिर्च यहां की पहचान बन गई थी। 30 से 40 ट्रक सब्जी प्रतिदिन विभिन्न राज्यों की मंडियों में भेजी जाती थी। यहां की खेती से हो रही खुशहाली के चलते किसान बच्चों को नौकरी नहीं कराना चाहते थे। बिहार के करीब दो से ढाई हजार मजदूर यहां प्रतिवर्ष काम के लिए आते थे।
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गोकुल बैराज बनने के बाद डेढ़ दशक में सब कुछ उलट-पलट हो गया। क्षेत्र में जमींदार कहे जाने वाले किसान दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं। 333 हेक्टेयर से अधिक जमीन के मालिकों में अनेक मजदूर बन गए। मुआवजे के लिए किसानों ने अनेक बार अफसर और जनप्रतिनिधियों का द्वार खटखटाया। धरना प्रदर्शन किए, लेकिन मुआवजा नहीं मिला। पिछले साल एक नवंबर को पुलिस ने किसानों पर लाठीचार्ज किया और एक दर्जन से अधिक को जेल में डाल दिया। इस घटना को भी नौ माह बीत चुके हैं, लेकिन किसानों को अब भी मुआवजे का इंतजार ही है। इस स्थिति में अनेक परिवारों में बच्चों की शादी के भी लाले पड़ रहे हैं।
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17 साल हो गए गोकुल बैराज के डूब क्षेत्र में 11 राजस्व गांवों के किसानों की जमीन को डूबे। 942 में से अधिकांश परिवार अर्श से फर्स पर आ गए हैं, लेकिन प्रभावित किसानों को उनकी जमीन का मुआवजा नहीं मिल रहा है। इसके लिए किसानों ने अनेक बार धरना, प्रदर्शन और आंदोलन किए। पुलिस की लाठियां खाईं और जेल भी गए। अब तक किसानों को मुकदमों की पैरवी करनी पड़ रही है। सब कुछ सहने के बाद भी उन्हें मुआवजा नहीं मिल रहा है।
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जिला मुख्यालय से सटे यमुना किनारे के औरंगाबाद, दामोदरपुर, रावल, मथुरा खादर, बांगर सहित 11 गांवों के संबंध में कहा जाता है कि यहां के किसानों की खुशहाली की दास्तां कभी बाहर के किसानों को भी प्रेरणा के तौर पर बताई जाती थी। इस खेती पर अधिकांश सब्जी की फसल होती थी। मध्य प्रदेश और दिल्ली की कई मंडियां में मथुरा की सब्जियां प्रख्यात थीं। खासकर हरी मिर्च यहां की पहचान बन गई थी। 30 से 40 ट्रक सब्जी प्रतिदिन विभिन्न राज्यों की मंडियों में भेजी जाती थी। यहां की खेती से हो रही खुशहाली के चलते किसान बच्चों को नौकरी नहीं कराना चाहते थे। बिहार के करीब दो से ढाई हजार मजदूर यहां प्रतिवर्ष काम के लिए आते थे।
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गोकुल बैराज बनने के बाद डेढ़ दशक में सब कुछ उलट-पलट हो गया। क्षेत्र में जमींदार कहे जाने वाले किसान दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं। 333 हेक्टेयर से अधिक जमीन के मालिकों में अनेक मजदूर बन गए। मुआवजे के लिए किसानों ने अनेक बार अफसर और जनप्रतिनिधियों का द्वार खटखटाया। धरना प्रदर्शन किए, लेकिन मुआवजा नहीं मिला। पिछले साल एक नवंबर को पुलिस ने किसानों पर लाठीचार्ज किया और एक दर्जन से अधिक को जेल में डाल दिया। इस घटना को भी नौ माह बीत चुके हैं, लेकिन किसानों को अब भी मुआवजे का इंतजार ही है। इस स्थिति में अनेक परिवारों में बच्चों की शादी के भी लाले पड़ रहे हैं।