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Mathura News: देवशयनी एकादशी आज
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मथुरा। आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी रविवार को धूमधाम से मनाई जाएगी।
मान्यता है कि इस दिन से चार माह भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। चार महीने के बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को निद्रा का त्याग करते हैं। इस बीच मांगलिक कार्यों पर विराम लगा रहता है। देवशयनी एकादशी व्रत के रहने से श्रद्धालुओं को भगवान विष्णु की कृपा बरसती है। एक नवंबर को देवउठनी एकादशी के दिन चतुर्मास समाप्त होगा, इस दिन विवाह होंगे।
ज्योतिषाचार्य कामेश्वर चतुर्वेदी ने बताया कि आषाढ़ माह शुक्ल पक्ष एकादशी को देवशयनी पद्मनाभा हरि शयनी एकादशी नाम से जाना जाता है। उन्होंने बताया कि एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी को विधिपूर्वक व्रत करना चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु की प्रतिमा अथवा शालिग्राम का षोडशोपचार पूजन किया जाता है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चातुर्मास का व्रत या अनुष्ठान करना चाहिए। इसका संकल्प इसी एकादशी के दिन किया जाता है। भगवान विष्णु के योग निद्रा में जाने के बाद सृष्टि को भगवान भोलेनाथ संभालते हैं।
साहित्य आचार्य शरद चतुर्वेदी ने बताया समस्त मांगलिक कार्य भगवान विष्णु के जाग्रत अवस्था में ही किए जाते हैं। विष्णु भगवान के शयन करने से मांगलिक कार्य निषिद्ध रहते हैं। जैसे विवाह, वर वरण, कन्या वरण, द्विरागमन, नूतन गृहप्रवेश, उपनयन, प्रतिष्ठा, महायज्ञ का शुभारंभ, राज्याभिषेक, कर्णवेध, मुंडन आदि कार्यों का निषेध किया गया है।
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मान्यता है कि इस दिन से चार माह भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। चार महीने के बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को निद्रा का त्याग करते हैं। इस बीच मांगलिक कार्यों पर विराम लगा रहता है। देवशयनी एकादशी व्रत के रहने से श्रद्धालुओं को भगवान विष्णु की कृपा बरसती है। एक नवंबर को देवउठनी एकादशी के दिन चतुर्मास समाप्त होगा, इस दिन विवाह होंगे।
ज्योतिषाचार्य कामेश्वर चतुर्वेदी ने बताया कि आषाढ़ माह शुक्ल पक्ष एकादशी को देवशयनी पद्मनाभा हरि शयनी एकादशी नाम से जाना जाता है। उन्होंने बताया कि एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी को विधिपूर्वक व्रत करना चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु की प्रतिमा अथवा शालिग्राम का षोडशोपचार पूजन किया जाता है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चातुर्मास का व्रत या अनुष्ठान करना चाहिए। इसका संकल्प इसी एकादशी के दिन किया जाता है। भगवान विष्णु के योग निद्रा में जाने के बाद सृष्टि को भगवान भोलेनाथ संभालते हैं।
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साहित्य आचार्य शरद चतुर्वेदी ने बताया समस्त मांगलिक कार्य भगवान विष्णु के जाग्रत अवस्था में ही किए जाते हैं। विष्णु भगवान के शयन करने से मांगलिक कार्य निषिद्ध रहते हैं। जैसे विवाह, वर वरण, कन्या वरण, द्विरागमन, नूतन गृहप्रवेश, उपनयन, प्रतिष्ठा, महायज्ञ का शुभारंभ, राज्याभिषेक, कर्णवेध, मुंडन आदि कार्यों का निषेध किया गया है।
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