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Mathura News: कोक्लियर इम्प्लांट मूक बधिर बच्चों के लिए बना वरदान

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 04 Jun 2025 01:11 AM IST
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Cochlear implants have become a boon for deaf and dumb children
मथुरा। बचपन से बोलने और सुनने में कमजोर मूक बधिर बच्चों के लिए कोक्लियर इम्प्लांट वरदान साबित हो रहा है। सफल प्रत्यारोपण के बाद दो मूक बधिर बच्चों को स्पीच थेरेपी और संकेतों से बोलना सिखाया। यह सरकार की मदद से संभव हो सका है।
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कोक्लियर इम्प्लांट एक ऐसी मशीन है, जो कान के पीछे ऑपरेशन करके लगाई जाती है। इससे 2 से 5 साल के मूक बधिर बच्चों को बाेलने में काफी सहूलियत मिलती है। जन्म के समय ही बच्चों की स्कैनिंग की जाती है। सुनने और बोलने की क्षमता कितनी है, इसका पता लगाया जाता है। फिर दो या पांच साल के बीच में बोलने और सुनने में कमजोर बच्चों का कोक्लियर इम्प्लांट किया जाता है।
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इसके बाद प्रत्यारोपण वाले बच्चों को स्पीच थेरेपी और संकेतों के माध्यम से एक या डेढ़ साल तक बोलना सिखाया जाता है, ताकि कोक्लियर इम्प्लांट उपकरण से उन्हें बोलने में आसानी हो सके। इस मशीन को क्रांति के तौर पर देखा जा रहा है। वर्तमान में जिले के दो मूक बधिर बच्चों में कोक्लियर इम्प्लांट का सफल प्रत्यारोपण किया जा चुका है। इसमें राल निवासी नीरज सिंह का पुत्र माधव और लोहवन निवासी राजकुमार का बेटा युवराज शामिल हैं। माधव और युवराज जन्म से ही मूक बधिर थे, लेकिन कोक्लियर इम्प्लांट सर्जरी के बाद ये बोल और सुन सकते हैं।
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छह लाख रुपये की मदद करती है सरकार
आमतौर पर जन्म लेने वाले हजार बच्चों में से कोई तीन किसी न किसी प्रकार से बहरेपन का शिकार होते हैं। जन्म के दौरान यदि सतर्कता बरती जाए तो एक भी बच्चा मूक बधिर नहीं रहेगा। कोक्लियर इम्प्लांट के बाद इन बच्चों की यह समस्या खत्म हो जाएगी। सरकार इसकी सर्जरी के लिए प्रति बच्चा छह लाख रुपये की मदद करती है। बीते सप्ताह आगरा में इसी को लेकर कार्यशाला का आयोजन किया गया था। इसमें अधिकारियों ने अभिभावकों से अपील की कि वह बच्चे के जन्म के दौरान बहरेपन का परीक्षण कराएं, ताकि आगे चलकर किसी तरह की समस्या का सामना नहीं करना पड़े।

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बीते दो साल में दो मूक बधिर बच्चों का परीक्षण के बाद कोक्लियर इम्प्लांट किया गया है। ये बच्चे जन्मजात मूक बधिर थे। सफल सर्जरी के बाद दोनों बच्चों को सुनने और बोलने में सफलता मिली है। यह सरकार की मदद संभव हो सका है।

विशाल कुमार, दिव्यांगजन सशक्तिकरण अधिकारी
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