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राधे-राधे सुनते ही बाहर आ गए थे अटलजी
अमर उजाला मथुरा
Updated Sun, 25 Dec 2016 12:19 AM IST
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मथुरा से विशेष लगाव रहा है पूर्व प्रधानमंत्री को
- फोटो : अमर उजाला
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का मथुरा से विशेष लगाव रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी पच्चीस साल तक दीनदयाल धाम स्मारक समिति के अध्यक्ष भी रहे। जब भी ब्रज के लोग उनसे मुलाकात करने के लिए दिल्ली जाते तो यमुना मैया के जयकारों के साथ होती थी भेंट। अगर कभी सिक्योरिटी रोकती तो बाहर खड़े लोग राधे-राधे कह देते थे। बस इतना सुनते ही प्रधानमंत्री या तो खुद ही बाहर आ जाते या सभी को भीतर बुला लिया करते थे।
यूं तो मथुरा में अटल बिहारी वाजपेयी को जानने वाले लोगों की फेहरिस्त लंबी है लेकिन उनके सबसे करीबी रहे हैं जयसिंहपुरा निवासी वरिष्ठ भाजपा नेता बांकेबिहारी माहेश्वरी। अटल बिहारी वाजपेयी और बांकेबिहारी हमउम्र बताए जाते हैं। जब भी अटल मथुरा आते थे तब बांके बिहारी से मुलाकात जरूर होती थी। बांकेबिहारी माहेश्वरी बताते हैं कि अटल जी समय के बहुत पाबंद हैं। अगर दस बजे दीनदयाल धाम में मीटिंग होती थी तो दिल्ली से ठीक दस बजे पहुंच जाते थे। पूरे वक्त मीटिंग में रहकर धाम के कायाकल्प पर प्लानिंग किया करते थे।
1957 में अटल बिहारी वाजपेयी मथुरा लोकसभा से चुनाव लड़े थे। लेकिन यहां वह चुनाव हार गए थे। मगर चुनाव हारने के बाद भी मथुरा आना-जाना नहीं छोड़ा। जिन लोगों से भी चुनाव के दौरान परिचय हो गया था उनसे लगातार मुलाकात करते रहे। जब प्रधानमंत्री थे तब भी कई बार मथुरा आए। बांकेबिहारी माहेश्वरी के साथ अटल स्कूटर पर बैठकर खूब घूमे हैं। मथुरा के लोग भी पूर्व प्रधानमंत्री से मुलाकात करने के लिए अक्सर दिल्ली जाया करते थे। एक बार मथुरा से दस लोग दिल्ली उनके आवास पर पहुंचे थे। यहां भारी सिक्योरिटी थी। प्रधानमंत्री अपने आवास में मौजूद थे। सिक्योरिटी वालों ने इन लोगों को आवास में नहीं घुसने दिया। इस पर सभी ने तेज आवाज में राधे-राधे पुकारना शुरू कर दिया। बस फिर क्या था अटल समझ गए कि मथुरा से लोग आए हैं। तत्काल सभी को भीतर बुलवा लिया। मथुरा वालों को देखते ही अटल भी यमुना मैया की जय बोलने लगे थे।
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पंडित जी की मौत का गहरा सदमा लगा था
अटल बिहारी वाजपेयी का पंडित दीनदयाल उपाध्याय से विशेष लगाव था। हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी पंडित दीनदयाल उपाध्याय से छोटे थे लेकिन संगठन में एक साथ काम करते हुए दोनों में काफी घनिष्ठता हो गई थी। 11 फरवरी, 1968 को जब दीनदयाल उपाध्याय का निधन हुआ तो उनका शव दिल्ली लाने के लिए भारतीय वायुसेना का विमान लेकर अटल जी गए थे। दीनदयाल उपाध्याय का शव भी अंतिम दर्शन के लिए अटल के 30, राजेंद्र प्रसाद मार्ग पर स्थित आवास पर ही रखा गया था। बताते हैं कि कई दिनों तक अटल सदमे में रहे। लोगों से मिलना-जुलना भी बंद कर दिया था। बाद में उन्होंने पंडित जी के पुश्तैनी गांव नगला चंद्रभान में दीनदयाल धाम की स्थापना कराई। समय-समय पर यहां आते रहे।
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यूं तो मथुरा में अटल बिहारी वाजपेयी को जानने वाले लोगों की फेहरिस्त लंबी है लेकिन उनके सबसे करीबी रहे हैं जयसिंहपुरा निवासी वरिष्ठ भाजपा नेता बांकेबिहारी माहेश्वरी। अटल बिहारी वाजपेयी और बांकेबिहारी हमउम्र बताए जाते हैं। जब भी अटल मथुरा आते थे तब बांके बिहारी से मुलाकात जरूर होती थी। बांकेबिहारी माहेश्वरी बताते हैं कि अटल जी समय के बहुत पाबंद हैं। अगर दस बजे दीनदयाल धाम में मीटिंग होती थी तो दिल्ली से ठीक दस बजे पहुंच जाते थे। पूरे वक्त मीटिंग में रहकर धाम के कायाकल्प पर प्लानिंग किया करते थे।
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1957 में अटल बिहारी वाजपेयी मथुरा लोकसभा से चुनाव लड़े थे। लेकिन यहां वह चुनाव हार गए थे। मगर चुनाव हारने के बाद भी मथुरा आना-जाना नहीं छोड़ा। जिन लोगों से भी चुनाव के दौरान परिचय हो गया था उनसे लगातार मुलाकात करते रहे। जब प्रधानमंत्री थे तब भी कई बार मथुरा आए। बांकेबिहारी माहेश्वरी के साथ अटल स्कूटर पर बैठकर खूब घूमे हैं। मथुरा के लोग भी पूर्व प्रधानमंत्री से मुलाकात करने के लिए अक्सर दिल्ली जाया करते थे। एक बार मथुरा से दस लोग दिल्ली उनके आवास पर पहुंचे थे। यहां भारी सिक्योरिटी थी। प्रधानमंत्री अपने आवास में मौजूद थे। सिक्योरिटी वालों ने इन लोगों को आवास में नहीं घुसने दिया। इस पर सभी ने तेज आवाज में राधे-राधे पुकारना शुरू कर दिया। बस फिर क्या था अटल समझ गए कि मथुरा से लोग आए हैं। तत्काल सभी को भीतर बुलवा लिया। मथुरा वालों को देखते ही अटल भी यमुना मैया की जय बोलने लगे थे।
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पंडित जी की मौत का गहरा सदमा लगा था
अटल बिहारी वाजपेयी का पंडित दीनदयाल उपाध्याय से विशेष लगाव था। हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी पंडित दीनदयाल उपाध्याय से छोटे थे लेकिन संगठन में एक साथ काम करते हुए दोनों में काफी घनिष्ठता हो गई थी। 11 फरवरी, 1968 को जब दीनदयाल उपाध्याय का निधन हुआ तो उनका शव दिल्ली लाने के लिए भारतीय वायुसेना का विमान लेकर अटल जी गए थे। दीनदयाल उपाध्याय का शव भी अंतिम दर्शन के लिए अटल के 30, राजेंद्र प्रसाद मार्ग पर स्थित आवास पर ही रखा गया था। बताते हैं कि कई दिनों तक अटल सदमे में रहे। लोगों से मिलना-जुलना भी बंद कर दिया था। बाद में उन्होंने पंडित जी के पुश्तैनी गांव नगला चंद्रभान में दीनदयाल धाम की स्थापना कराई। समय-समय पर यहां आते रहे।