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Mathura News: सैनिक की बंदूक से गोली गरजी और बर्ल्टन ढेर हो गया...
Fri, 11 Aug 2023 12:32 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
Updated Fri, 11 Aug 2023 12:32 AM IST
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मथुरा। स्वतंत्रता आंदोलन में एक वक्त ऐसा आया जब मथुरा ब्रिटिश हुकूमत के नियंत्रण से बाहर हो गया था। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन की जडे़ं हिला दी थीं। यहां सैनिक ने विद्रोह कर दिया। सरकारी खजाना छीन लिया और एक अंग्रेज अफसर को गोली मार दी। सरकारी दफ्तरों में आग लगा दी। अंग्रेज जान बचाने के लिए भाग गए। बात 1857 की क्रांति के दौरान मई-जून माह की है।
मथुरा में हुए इस विद्रोह का उल्लेख 5 जून 1857 को मथुरा के तत्कालीन कलक्टर मार्क थॉर्नहिल द्वारा लिखे पत्र में मिलता है। पश्चिमोत्तर प्रांत के आगरा स्थित तत्कालीन गवर्नमेंट सेक्रेटरी सीबी थॉर्नहिल के नाम लिखे पत्र में कहा है कि यहां तैनात 67वीं पल्टन को दो माह होने पर कार्य मुक्त करते हुए उसके स्थान पर 44 वीं नेटिव इंनफैंट्री को तैनात किया जाना था। इससे पहले पश्चिमोत्तर प्रांत के लेखाकार ने 67वीं पल्टन को मथुरा का अतिरिक्त खजाना आगरा पहुंचाने का आदेश दिया। कोषाधिकारी डैशमैन ने खजाने को दस बैलगाड़ियों में लदवा दिया। ग्यारहवीं अंतिम गाड़ी तैयार हो रही थीं, 67 वीं पल्टन के सैनिक अख्तियार खां ने कमांडर बर्ल्टन से पूछा ''''कूच कहां को होगा ।
'''' इस पर बर्ल्टन ने घुर्राते हुए कहा ''''आगरा की ओर और कहां '''''''' सैनिक ने कहा ''''दिल्ली क्यों नहीं''''। बर्ल्टन कड़का ''''बदमाश, बेईमान'''', इस पर सैनिक की बंदूक से गोली गरजी और बर्ल्टन ढेर हो गया। इस घटना के साथ ही 44 वीं पल्टन भी तुरंत विद्रोहियों से जा मिली। अंग्रेजों पर जमकर गोलिंयां दागी गईं, वे जान बचाकर भाग खड़े हुए। विद्रोहियों ने उनके कार्यालयों में आग लगा दी और सरकारी अभिलेखागार को नष्ट कर डाला। विदेशियों के बंगलों में आग लगा दी।
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कोषागार में बची सम्पत्ति को लूट लिया गया। कारागार में जितने भी बंदी थे, जेल तोड़कर मुक्त करा दिए। कारागार के प्रहरी भी क्रांतिकारियों के साथ मिल गए और खजाने के साथ स्वतंत्रता आंदोलन के लिए दिल्ली की ओर चल दिए। सड़क के सहारे कार्यालय या बंगला, चुंगी चौकी, पुलिस चौकी या कोई भी सरकारी भवन मिला, उनमें आग लगा दी। रास्ते के सभी जमींदार विद्रोहियों के साथ हो गए। ब्रज डिस्कवरी में इस घटना का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है। इसमें जनपद का नियंत्रण अंग्रेजी हुकूमत के हाथ में न रहने की बात कही गई है।
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मथुरा में हुए इस विद्रोह का उल्लेख 5 जून 1857 को मथुरा के तत्कालीन कलक्टर मार्क थॉर्नहिल द्वारा लिखे पत्र में मिलता है। पश्चिमोत्तर प्रांत के आगरा स्थित तत्कालीन गवर्नमेंट सेक्रेटरी सीबी थॉर्नहिल के नाम लिखे पत्र में कहा है कि यहां तैनात 67वीं पल्टन को दो माह होने पर कार्य मुक्त करते हुए उसके स्थान पर 44 वीं नेटिव इंनफैंट्री को तैनात किया जाना था। इससे पहले पश्चिमोत्तर प्रांत के लेखाकार ने 67वीं पल्टन को मथुरा का अतिरिक्त खजाना आगरा पहुंचाने का आदेश दिया। कोषाधिकारी डैशमैन ने खजाने को दस बैलगाड़ियों में लदवा दिया। ग्यारहवीं अंतिम गाड़ी तैयार हो रही थीं, 67 वीं पल्टन के सैनिक अख्तियार खां ने कमांडर बर्ल्टन से पूछा ''''कूच कहां को होगा ।
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'''' इस पर बर्ल्टन ने घुर्राते हुए कहा ''''आगरा की ओर और कहां '''''''' सैनिक ने कहा ''''दिल्ली क्यों नहीं''''। बर्ल्टन कड़का ''''बदमाश, बेईमान'''', इस पर सैनिक की बंदूक से गोली गरजी और बर्ल्टन ढेर हो गया। इस घटना के साथ ही 44 वीं पल्टन भी तुरंत विद्रोहियों से जा मिली। अंग्रेजों पर जमकर गोलिंयां दागी गईं, वे जान बचाकर भाग खड़े हुए। विद्रोहियों ने उनके कार्यालयों में आग लगा दी और सरकारी अभिलेखागार को नष्ट कर डाला। विदेशियों के बंगलों में आग लगा दी।
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कोषागार में बची सम्पत्ति को लूट लिया गया। कारागार में जितने भी बंदी थे, जेल तोड़कर मुक्त करा दिए। कारागार के प्रहरी भी क्रांतिकारियों के साथ मिल गए और खजाने के साथ स्वतंत्रता आंदोलन के लिए दिल्ली की ओर चल दिए। सड़क के सहारे कार्यालय या बंगला, चुंगी चौकी, पुलिस चौकी या कोई भी सरकारी भवन मिला, उनमें आग लगा दी। रास्ते के सभी जमींदार विद्रोहियों के साथ हो गए। ब्रज डिस्कवरी में इस घटना का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है। इसमें जनपद का नियंत्रण अंग्रेजी हुकूमत के हाथ में न रहने की बात कही गई है।