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ब्रज में भारत छोड़ो आंदोलन के 72 वर्ष पूरे
Mathura
Updated Sat, 09 Aug 2014 05:30 AM IST
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मथुरा। यह बात युवाओं को बताना बहुत जरूरी है कि 9 अगस्त का दिन ब्रज के इतिहास में बहुत महत्व रखता है। 1942 में आज ही की तारीख को मथुरा ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। देशभक्तों का लक्ष्य था जिले भर में क्रांति के संदेश को फैलाना। भारत मां के सपूतों को एकजुट करने के लिए यमुना नदी में नाव पर दाल-बाटी कार्यक्रम हुआ। उसके बाद आजादी की यह नाव ऐसे बही कि गोरे भी गोते खा गए।
विस्तार से बताते हैं। भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में अंग्रेजों के खिलाफ छेड़ा गया निर्णायक आंदोलन था। सारे देशवासी इसमें ऊर्जा के साथ भाग ले रहे थे। अब तक संघर्ष ने पूर्वाभास करा दिया था कि अब विजय निश्चित है। इसी उत्साह में समाज का हर वर्ग आंदोलन का हिस्सा बन रहा था। मथुरा में इसके शंखनाद के लिए 9 अगस्त का दिन तय हुआ। लोगों को जोड़ने का बहाना बना यमुना नदी में नाव पर दाल-बाटी कार्यक्रम का आयोजन। जिसके रणनीतिकार हकीम ब्रजलाल वर्मन, रामजीदास गुप्त, भजनलाल स्वामी, रघुवीर शरण, देवनायक हटीला, रामस्वरूप वर्मा, मुकुंद लाल वर्मन आदि थे। हालांकि इसका पता पुलिस को लग गया। लेकिन अब देशभक्त उनके हाथ आने वाले नहीं थे। पुलिस योजना को रोकती उससे पहले ब्रज के वीर बहादुरों ने नदी के पार कर आंदोलन का संदेश जिले भर में फैला दिया।
सबसे पहले गिरफ्तार हुए राधेश्याम जी
9 अगस्त 1942 को पुलिस ने मथुरा जिले में आंदोलन को रोकने के लिए सबसे पहले राधेश्याम जी को नजरबंद कर दिया। इसके बाद अंग्रेजी शासन ने केदारनाथ भार्गव जी को भी नजरबंद किया। लेकिन सेनानियों में जोश इतना था कि इन घटनाओं से बिना विचलित हुए राधामोहन चतुर्वेदी जी बाजार बंद कराने निकल पड़े। पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद डा. श्रीनाथ भार्गव भी बंदी बना लिए गए।
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छात्र आंदोलन को मिली चिनगारी
पुलिस द्वारा मनमानी गिरफ्तारियों नेे छात्र आंदोलन को जन्म दिया। शिक्षण संस्थाओं को बंद कराया जाने लगा। सरकारी संस्थानों पर धरने का निर्णय हुआ। 10 अगस्त 1942 को चंपा अग्रवाल इंटर कालेज में छात्रों ने जुलूस निकाला जो किशोरीरमण इंटर कालेज के छात्रों को साथ लेते हुए गवर्नमेंट हाईस्कूल की तरफ बढ़ा। छात्रों की संख्या देखकर अंग्रेजी सरकार घबरा गई और गवर्नमेंट हाईस्कूल बंद कराने के दौरान छात्रों पर लाठियां बरसाई गईं। जिसमें सतीश चंद्र वाजपेयी बुरी तरह घायल हुए। सतीश, दीनानाथ चतुर्वेदी, द्वारिकानाथ गिरफ्तार कर लिए गए। शाम को गांधी पार्क में सभा की तैयारी हुई तो वहां भी पुलिस ने बर्बरता दिखाई। जिसमें रामशरण दास जौहरी घायल हुए। छात्रों आंदोलन में कैलाश पुष्प, वासुदेव चतुर्वेदी, कुंदन लाल चतुर्वेदी और राधेश्याम चतुर्वेदी आदि सक्रिय रहे। आज भी ब्रज में आजादी के नायकों की चर्चा कर गर्व की अनुभूति होती है।
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विस्तार से बताते हैं। भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में अंग्रेजों के खिलाफ छेड़ा गया निर्णायक आंदोलन था। सारे देशवासी इसमें ऊर्जा के साथ भाग ले रहे थे। अब तक संघर्ष ने पूर्वाभास करा दिया था कि अब विजय निश्चित है। इसी उत्साह में समाज का हर वर्ग आंदोलन का हिस्सा बन रहा था। मथुरा में इसके शंखनाद के लिए 9 अगस्त का दिन तय हुआ। लोगों को जोड़ने का बहाना बना यमुना नदी में नाव पर दाल-बाटी कार्यक्रम का आयोजन। जिसके रणनीतिकार हकीम ब्रजलाल वर्मन, रामजीदास गुप्त, भजनलाल स्वामी, रघुवीर शरण, देवनायक हटीला, रामस्वरूप वर्मा, मुकुंद लाल वर्मन आदि थे। हालांकि इसका पता पुलिस को लग गया। लेकिन अब देशभक्त उनके हाथ आने वाले नहीं थे। पुलिस योजना को रोकती उससे पहले ब्रज के वीर बहादुरों ने नदी के पार कर आंदोलन का संदेश जिले भर में फैला दिया।
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सबसे पहले गिरफ्तार हुए राधेश्याम जी
9 अगस्त 1942 को पुलिस ने मथुरा जिले में आंदोलन को रोकने के लिए सबसे पहले राधेश्याम जी को नजरबंद कर दिया। इसके बाद अंग्रेजी शासन ने केदारनाथ भार्गव जी को भी नजरबंद किया। लेकिन सेनानियों में जोश इतना था कि इन घटनाओं से बिना विचलित हुए राधामोहन चतुर्वेदी जी बाजार बंद कराने निकल पड़े। पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद डा. श्रीनाथ भार्गव भी बंदी बना लिए गए।
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छात्र आंदोलन को मिली चिनगारी
पुलिस द्वारा मनमानी गिरफ्तारियों नेे छात्र आंदोलन को जन्म दिया। शिक्षण संस्थाओं को बंद कराया जाने लगा। सरकारी संस्थानों पर धरने का निर्णय हुआ। 10 अगस्त 1942 को चंपा अग्रवाल इंटर कालेज में छात्रों ने जुलूस निकाला जो किशोरीरमण इंटर कालेज के छात्रों को साथ लेते हुए गवर्नमेंट हाईस्कूल की तरफ बढ़ा। छात्रों की संख्या देखकर अंग्रेजी सरकार घबरा गई और गवर्नमेंट हाईस्कूल बंद कराने के दौरान छात्रों पर लाठियां बरसाई गईं। जिसमें सतीश चंद्र वाजपेयी बुरी तरह घायल हुए। सतीश, दीनानाथ चतुर्वेदी, द्वारिकानाथ गिरफ्तार कर लिए गए। शाम को गांधी पार्क में सभा की तैयारी हुई तो वहां भी पुलिस ने बर्बरता दिखाई। जिसमें रामशरण दास जौहरी घायल हुए। छात्रों आंदोलन में कैलाश पुष्प, वासुदेव चतुर्वेदी, कुंदन लाल चतुर्वेदी और राधेश्याम चतुर्वेदी आदि सक्रिय रहे। आज भी ब्रज में आजादी के नायकों की चर्चा कर गर्व की अनुभूति होती है।