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दुनिया में नाम किया रोशन, मिलिए यूपी की 'मलाला' से
मेरठ/ब्यूरो
Updated Sat, 13 Jul 2013 11:46 AM IST
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उत्तर प्रदेश में मेरठ के जानी ब्लाक का गांव नंगला कुम्भा में शुक्रवार की सुबह कुछ अलग थी। हर ओर दो नामों की चर्चा थी।
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गांव का हर शख्श राजिया सुल्तान को जानता है और मलाला के बारे में बहुत से अंजान हैं। ये ग्रामीण मलाला के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं लेकिन इस बात पर बड़े खुश हैं कि उनके गांव की बेटी रजिया सुल्तान को कोई मलाला के नाम का बड़ा पुरस्कार मिल गया है।
पूरी दुनिया में उनकी रजिया का नाम हो गया है, उनके गांव का नाम हो गया है। दरअसल रजिया को संयुक्त राष्ट्र का पहला मलाला युसूफजई पुरस्कार मिला है।
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गांव नंगला कुम्भा निवासी फरमान की सबसे बडी पुत्री रजिया सुल्तान का जीवन पांच वर्ष की उम्र से गरीबी के चलते अपने परिवार के साथ नन्हें हाथों से फुटबाल बनाने में बीत रहा था।
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उसके जीवन में जब एक जबरदस्त मोड आया। जब गांव में दिल्ली की एक संस्था बचपन बचाओं आन्दोलन ने उसे स्कूल में पढने की राह दिखाई। सबसे पहले रजिया सुल्तान अपनी गांव की बाल पंचायत की सरपंच बनी।
उसने अपनी पढाई के साथ बचपन बचाओ संगठन के साथ काम करते हुए अपने गांव के बाल मजदूरी में लगे बच्चों को घर घर जा कर उनके परिजनों को उन्हें स्कूल में भेजने के लिये प्रेरित किया।
प्राइमरी शिक्षा गांव के ही सरकारी स्कूल से प्राप्त कर उसने जूनियर हाई स्कूल तक की शिक्षा सिवाल हाई स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद उसने हाई स्कूल वीटी पब्लिक स्कूल से किया।
अब वह बाहरवीं में कुराली स्थित एलटीआर पब्लिक स्कूल की छात्रा है। अब तक वह अनेक बच्चों को बाल मजदूरी से हटाकर स्कूलों में दाखिला दिलवा चुकी है।
रजिया ने अपने गांव के साथ साथ आस पास के आधा दर्जन गांवों को बाल मित्र गांव बनाया है। इन गावों को पूरी तरह से बाल श्रम मुक्त करवाया है।
उसने अपने गांव के साथ साथ देश के अनेक हिस्सों में बाल मित्र कारवां निकाला है। जिसके जरीये उसने बच्चों को बाल श्रम से रोकने की अपील की है।
रजिया ने भारत के अलावा नेपाली बच्चों के अधिकारों के लिये भी संघर्ष नेपाल मे किया है। बचपन बचाओ आन्दोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी के नेतृत्व में शिक्षा के अधिकार को लेकर वर्ष 2009 में नेपाल मार्च में एक महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी भूमिका निभाई में रही थी।
मलाला पुरस्कार के लिये रजिया सुल्तान का नाम प्रस्तावित करने वाले बचपन बचाओ आन्दोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी ने ही किया था।
तीन माह पहले आए थे गाडर्न ब्राउन
करीब तीन माह पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष दूत गॉडर्न ब्राउन भारत आये थे। उस समय बचपन बचाओ आन्दोलन के संस्थापक कै लाश सत्यार्थी से उनकी बात हुई थी। इस बातचीत में रजिया सुल्तान के किए कार्यों के बारें में भी चर्चा हुई थी।
उस समय गॉडर्न ब्राउन ने रजिया सुल्तान के समाजिक कार्यो का वीडियो लिया था। इसके बाद कैलाश सत्यार्थी ने भारत की और से मलाला सम्मान के लिये रजिया का नाम भेजा था।
पासपोर्ट नहीं मिलने के कारण नहीं जा पाई
रजिया आज संयुक्त राष्ट्रीय संघ के न्यूयार्क स्थित मुख्यालय के सभागार में विशेष शिक्षा दूत व ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री गॉडर्न ब्राउन से मलाला पुरस्कार प्राप्त करने से वंचित रह गई।
रजिया पासर्पोट और वीजा आदि की दिक्कतों के चलते पुरस्कार प्राप्त करने के लिये न्यूयार्क नहीं जा पाई। इसके स्थान पर भारत के प्रतिनिधि ने रजिया की और से यह पुरस्कार प्राप्त किया। इस अवसर पर रजिया का भाषण पढकर सुनाया गया।
उसने कहा कि बाल मजदूरी की पूर्ण समाप्ति के बगैर देश के बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिल पाना मुश्किल है। जब तक हर बच्चें को मुफ्त उपयोगी और अच्छी शिक्षा मुहैया नहीं करवाई जाती तक तक बाल मजदूरी भी नहीं रूकेगी।
इसके लिये केन्द्र सरकार बाल मजदूरी को पूरी तरह से रोकने के लिये कानून संसद में पास करें।