{"_id":"574886004f1c1b2f2d692d16","slug":"dalit-family-bread-cloth-and-shelter","type":"story","status":"publish","title_hn":"दलित परिवार के पास नहीं रोटी कपड़ा और मकान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दलित परिवार के पास नहीं रोटी कपड़ा और मकान
अमर उजाला ब्यूरो मैनपुरी
Updated Fri, 27 May 2016 11:27 PM IST
विज्ञापन
दलित परिवार के पास नहीं रोटी कपड़ा और मकान
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ग्राम पंचायत चीतई में 10 सदस्यीय दलित परिवार सरकारी योजनाओं से अछूता है। कई सालों से ये परिवार एक टूटी फूटी झोपड़ी में गुजर बसर कर रहा है। परिवार के पास जमीन और न ही राशनकार्ड है।
गांव चीतई निवासी अवधेश कठेरिया के परिवार में उनकी पत्नी राधा देवी, बच्चे आलम, अरविंद, मनमोहन, चंदन, सूरज सोनी, बुजुर्ग मां रामश्री और बाप राजकुमार कई सालों से लाचारी की जिंदगी जी रहे हैं। बच्चों को रोजाना भरपेट भोजन भी नसीब नहीं होता। अवधेश और उसकी पत्नी मजदूरी कर जो भी कमाते हैं वो अपने बच्चों और बूढे़ मां बाप की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी काफी नहीं रहती। सरकारी मदद की बात करें तो इस परिवार के पास राशनकार्ड है और न मनरेगा जॉब कार्ड है। अन्य सरकारी सुविधाओं के नाम पर भी ये परिवार खाली हाथ है।
एक दिन भी अगर मजदूरी न मिले तो परिवार को पानी पीकर ही सोना पड़ता है। दस माह पूर्व ही अवधेश का पुत्र भारत इलाज के अभाव में अपनी जान गंवा चुका है। अभी परिवार इस सदमे से उबर भी नहीं पाया था। कि वर्ष 2002 में खरीदी गई जमीन पर डाली गई झोपड़ी की कुछ लोगों ने दीवार भी तोड़ दी है। परिवार ने इसकी शिकायत अधिकारियों से की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। विमलेश का कहना है कि अगर परिवार को उक्त भूमि से भी बेदखल कर दिया तो उसके पास गांव से पलायन के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचेगा।
विज्ञापन
मामले की जांच कराई जाएगी। अगर वास्तव में परिवार को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिला है। राशनकार्ड और जॉब कार्ड नहीं है तो उसे सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाया जाएगा। कोई भी किसी का घर नहीं तोड़ सकता।
- महेश गुप्ता, एसडीएम घिरोर
विज्ञापन
गांव चीतई निवासी अवधेश कठेरिया के परिवार में उनकी पत्नी राधा देवी, बच्चे आलम, अरविंद, मनमोहन, चंदन, सूरज सोनी, बुजुर्ग मां रामश्री और बाप राजकुमार कई सालों से लाचारी की जिंदगी जी रहे हैं। बच्चों को रोजाना भरपेट भोजन भी नसीब नहीं होता। अवधेश और उसकी पत्नी मजदूरी कर जो भी कमाते हैं वो अपने बच्चों और बूढे़ मां बाप की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी काफी नहीं रहती। सरकारी मदद की बात करें तो इस परिवार के पास राशनकार्ड है और न मनरेगा जॉब कार्ड है। अन्य सरकारी सुविधाओं के नाम पर भी ये परिवार खाली हाथ है।
विज्ञापन
एक दिन भी अगर मजदूरी न मिले तो परिवार को पानी पीकर ही सोना पड़ता है। दस माह पूर्व ही अवधेश का पुत्र भारत इलाज के अभाव में अपनी जान गंवा चुका है। अभी परिवार इस सदमे से उबर भी नहीं पाया था। कि वर्ष 2002 में खरीदी गई जमीन पर डाली गई झोपड़ी की कुछ लोगों ने दीवार भी तोड़ दी है। परिवार ने इसकी शिकायत अधिकारियों से की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। विमलेश का कहना है कि अगर परिवार को उक्त भूमि से भी बेदखल कर दिया तो उसके पास गांव से पलायन के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचेगा।
विज्ञापन
मामले की जांच कराई जाएगी। अगर वास्तव में परिवार को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिला है। राशनकार्ड और जॉब कार्ड नहीं है तो उसे सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाया जाएगा। कोई भी किसी का घर नहीं तोड़ सकता।
- महेश गुप्ता, एसडीएम घिरोर