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पांडवों ने की थी भगवान भीमसेन की पूजा

Sun, 28 Jul 2013 05:33 AM IST
Mainpuri
Mainpuri Updated Sun, 28 Jul 2013 05:33 AM IST
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मैनपुरी। शहर का प्राचीन श्री भीमसेन मंदिर अपने आप में तमाम पौराणिक गाथाएं और किवदंतियां समेटे हुए है। यूं तो मंदिर में प्रत्येक सोमवार को भक्तों की भीड़ रहती है लेकिन महाशिवरात्रि और श्रावण मास के सोमवारों में तो मेले जैसा नजारा होता है। कहा जाता है कि यहां अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने भगवान भीमसेन की पूजा की थी। महर्षि मार्कंडेय ने भी भगवान भीमसेन की साधना की थी। इन दिनों मंदिर में जहां भक्ति रसधारा बह रही है वहीं बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए पहुंच रहे हैं।
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भगवान भीमसेन का वर्तमान मंदिर 12वीं शताब्दी में अपने स्वरूप में आया लेकिन भगवान भीमसेन का विग्रह पौराणिक काल का बताया जाता है। नगर के ईशान कोण में जहां मां शीतला देवी का मंदिर है, वहीं आग्नेय कोण में भगवान भीमसेन विराजमान हैं। कहा जाता है कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बीच इस पावन नगरी की रक्षा के लिए भगवान शिव को विराजमान किया गया है।
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बटेश्वर की भांति यहां भी भगवान शिव की प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में है। विग्रह में बड़े-बड़े जटा जूट से अलंकृत चंद्रकला को मस्तक पर धारण करने वाले एवं बड़ी-बड़ी मूंछों से सुशोभित शिव का रूपांकन किया गया है। मंदिर के बारे में किवदंती है कि अज्ञातवास के दौरान इच्छु नदी (वर्तमान में ईशन) के किनारे बिठूर जाते समय पांडव यहां रुके थे और भगवान भीमसेन की पूजा अर्चना की थी।
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मुस्लिम संत गुलाब खां की है समाधि
एक किवदंती के अनुसार लगभग दो सौ वर्ष पूर्व भीमसेन मंदिर में शिवरात्रि पर्व पर भंडारा चल रहा था। तभी मुस्लिम संत गुलाब खां आए और अपने कमंडल में खीर परोसने को कहा। खीर परोसने वाले कमंडल में खीर डालते रहे लेकिन कमंडल नहीं भरा। जब यह बात पुजारी नरोत्तमदास तक पहुंची तो वह स्वयं अपने कमंडल से खीर परोसने लगे लेकिन लोग यह देख कर दंग रह गए कि न तो गुलाब खां का कमंडल ही भर रहा है और न ही नरोत्तमदास जी के कमंडल से खीर की धार टूट रही है। इसके बाद दोनों संत गले मिले और संत गुलाब खां भी भीमसेन मंदिर में ही रहने लगे। मंदिर परिसर में गुलाब खां की समाधि आज भी बनी हुई है।
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