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न्यूनतम तापमान में लगातार वृद्धि से हुई थी उत्तराखंड त्रासदी
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डॉ. रूपेन्द्र सिंह।
- फोटो : MAHOBA
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महोबा। उत्तराखंड के चमौली में ग्लेशियर टूटने से हुई तबाही ने वैज्ञानिकों के जेहन में भी कई सवाल खड़े कर दिए। जैसे यह घटना फरवरी यानी सर्दी के मौसम में क्यों हुई, जबकि इतनी बारिश भी नहीं हुई थी। अमूमन ऐसी घटनाएं अतिवृष्टि से होती हैं। ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने के लिए दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के रिसर्च वैज्ञानिक महोबा निवासी डॉ. रूपेंद्र सिंह ने शोध किया। डॉ. सिंह ने बताया कि उन्होंने 20 साल के तापमान, बारिश और उस पूरी घाटी की भौगोलिक स्थितियों का विश्लेषण किया। जिसमें त्रासदी का मुख्य कारण न्यूनतम तापमान में वृद्धि को माना।
उनका शोध जिओमैटिक्स नेचुरल हाजर्ड्ज एंड रिस्क पत्रिका से जुड़े विश्व के प्रमुख वैज्ञानिकों ने समीक्षा के बाद 22 दिसंबर 2021 को प्रकाशन के लिए स्वीकृत किया है। डॉ. सिंह ने बताया कि विश्लेषण में पाया की घटना के समय अधिकतम तापमान तो सामान्य ही था जैसा कि इस मौसम में होता है, जबकि न्यूनतम तापमान लगातार बढ़ता रहा।
न्यूनतम तापमान में वृद्धि से हैंगिंग (लटकते ) ग्लेशियर में कई साल पहले से दरार आनी शुरू हो गई थी। यहां पर जमीन के नीचे की नमी भी बर्फ के रूप में जमी होती है। न्यूनतम तापमान में बढ़ोतरी से मिट्टी के नीचे की बर्फ भी पिघलनी शुरू हो गई। जिस से पकड़ कमजोर हुई और हैंगिंग ग्लेशियर टूट कर नीचे गिरा। तीव्र ढाल होने से 100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से मलबा नीचे की ओर फिसलते चला गया। रास्ते में जो भी पड़ा उसे बर्बाद करते चला गया। उनकी कामयाबी पर पिता मदन मोहन राजपूत, मां ज्ञान देवी और सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता पत्नी सीमा पटनाहा सिंह समेत क्षेत्रीय लोगों ने उन्हें खुशी जाहिर कर बधाई दी है।
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यह भी जानें
- डॉ रूपेंद्र की इससे पूर्व अंतरिक्ष विज्ञान पर आधारित दो पुस्तकों को इसरो ने प्रकाशित किया है। इसके अलावा उनके 10 से ज्यादा शोधपत्र अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ रूपेन्द्र सिंह के इस कार्य ने उन्हे विश्व के प्रमुख भू वैज्ञानिकों की श्रेणी में खड़ा कर दिया है।
मुख्य बिंदु
- 20 वर्षों से ज्यादा समय का वायुमंडलीय अध्ययन
- शोध में रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट आधुनिक तकनीक व ग्राउंड वेरिफिकेशन परंपरागत तकनीक दोनों प्रकार की तकनीक का इस्तेमाल किया।
- जलवायु परिवर्तन एवं न्यूनतम तापमान में वृद्धि है मुख्य कारण।
- यह शोध पत्रिका विश्व में प्राकृतिक आपदा की प्रमुख पांच शोध पत्रिकाओं में से एक है।
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उनका शोध जिओमैटिक्स नेचुरल हाजर्ड्ज एंड रिस्क पत्रिका से जुड़े विश्व के प्रमुख वैज्ञानिकों ने समीक्षा के बाद 22 दिसंबर 2021 को प्रकाशन के लिए स्वीकृत किया है। डॉ. सिंह ने बताया कि विश्लेषण में पाया की घटना के समय अधिकतम तापमान तो सामान्य ही था जैसा कि इस मौसम में होता है, जबकि न्यूनतम तापमान लगातार बढ़ता रहा।
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न्यूनतम तापमान में वृद्धि से हैंगिंग (लटकते ) ग्लेशियर में कई साल पहले से दरार आनी शुरू हो गई थी। यहां पर जमीन के नीचे की नमी भी बर्फ के रूप में जमी होती है। न्यूनतम तापमान में बढ़ोतरी से मिट्टी के नीचे की बर्फ भी पिघलनी शुरू हो गई। जिस से पकड़ कमजोर हुई और हैंगिंग ग्लेशियर टूट कर नीचे गिरा। तीव्र ढाल होने से 100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से मलबा नीचे की ओर फिसलते चला गया। रास्ते में जो भी पड़ा उसे बर्बाद करते चला गया। उनकी कामयाबी पर पिता मदन मोहन राजपूत, मां ज्ञान देवी और सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता पत्नी सीमा पटनाहा सिंह समेत क्षेत्रीय लोगों ने उन्हें खुशी जाहिर कर बधाई दी है।
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यह भी जानें
- डॉ रूपेंद्र की इससे पूर्व अंतरिक्ष विज्ञान पर आधारित दो पुस्तकों को इसरो ने प्रकाशित किया है। इसके अलावा उनके 10 से ज्यादा शोधपत्र अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ रूपेन्द्र सिंह के इस कार्य ने उन्हे विश्व के प्रमुख भू वैज्ञानिकों की श्रेणी में खड़ा कर दिया है।
मुख्य बिंदु
- 20 वर्षों से ज्यादा समय का वायुमंडलीय अध्ययन
- शोध में रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट आधुनिक तकनीक व ग्राउंड वेरिफिकेशन परंपरागत तकनीक दोनों प्रकार की तकनीक का इस्तेमाल किया।
- जलवायु परिवर्तन एवं न्यूनतम तापमान में वृद्धि है मुख्य कारण।
- यह शोध पत्रिका विश्व में प्राकृतिक आपदा की प्रमुख पांच शोध पत्रिकाओं में से एक है।