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Maharajganj News: पैरों में अंगारे बांधे सीने में तूफान भरे...
Sun, 06 Oct 2024 03:50 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
Updated Sun, 06 Oct 2024 03:50 AM IST
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महराजगंज। ओज और वीर रस के विश्व विख्यात कवि डॉ हरिओम पवार ने ‘पैरों में अंगारे बांधे, सीने में तूफान भरे, आंखों में दो सागर आजें, कई हिमालय शीश धरे, मैं धरती के आंसू का संत्रास नहीं तो क्या सोऊं, खूनी तालिबानों का इतिहास नहीं तो क्या... के जरिए हालातों पर सवाल उठाएं। उन्होंने कविता के माध्यम से ज्वलंत मुद्दों पर तीखा हमला किया।
कविता के माध्यम से उन्होंने संविधान के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संसद को गुंडों-दागी चेहरे से खाली कर दो खेलों को नेताओं से पूंजीपतियों से मुक्त कर दो कुछ कानून बनाने में देर नहीं तो अंधेरी है । यूजीसी को लाने में 70 सालों की देरी है। आबादी का बढ़ना रोको सबसे बड़ी जरूरत है। जनसंख्या कानून बनाओ बहुत जरूरी है।
डॉ. हरिओम पवार ने कहा कि संविधान एक बहुत लोकप्रिय कविता है। उन्होंने ज्योंही मैं भारत का संविधान हूं। लाल किले से बोल रहा हूं। मेरा अंतर्मन घायल है दिल की बातें खोल रहा हूं। प्रस्तुत किया तो पूरा पंडाल तालिया से गूंज उठा।
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उन्होंने कहा कि कभी-कभी मैं रामायण हूं कभी-कभी गीता होता हूं। मैं जब से आबाद हुआ हूं, अपनों से बर्बाद हुआ हूं। संसद में सौ बार मारा हूं मैं भारत का संविधान हूं... कायरता के घर दासी है न्याय व्यवस्था भी रोती है, गुंडों के घर में सोती है पूरे कांप रहे आधों से राजा डरता है। प्यादों से गांधी को गाली मिलती है।
डाकू को ताली मिलती है क्या अपराधिक चलन हुआ है। मेरा भी अपहरण हुआ है। मैं चोटिल हूं क्षत विक्षत हूं। मैंने यूं आघात सहा है जैसे घायल पड़ा जटायु हारा थका कराह रहा है।
जिंदा हूं या मरा पड़ा हूं, अपनी नब्ज टटोल रहा हूं, मैं भारत का संविधान हूं, आ लालकिले से बोल रहा हूं। संवाद
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कविता के माध्यम से उन्होंने संविधान के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संसद को गुंडों-दागी चेहरे से खाली कर दो खेलों को नेताओं से पूंजीपतियों से मुक्त कर दो कुछ कानून बनाने में देर नहीं तो अंधेरी है । यूजीसी को लाने में 70 सालों की देरी है। आबादी का बढ़ना रोको सबसे बड़ी जरूरत है। जनसंख्या कानून बनाओ बहुत जरूरी है।
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डॉ. हरिओम पवार ने कहा कि संविधान एक बहुत लोकप्रिय कविता है। उन्होंने ज्योंही मैं भारत का संविधान हूं। लाल किले से बोल रहा हूं। मेरा अंतर्मन घायल है दिल की बातें खोल रहा हूं। प्रस्तुत किया तो पूरा पंडाल तालिया से गूंज उठा।
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उन्होंने कहा कि कभी-कभी मैं रामायण हूं कभी-कभी गीता होता हूं। मैं जब से आबाद हुआ हूं, अपनों से बर्बाद हुआ हूं। संसद में सौ बार मारा हूं मैं भारत का संविधान हूं... कायरता के घर दासी है न्याय व्यवस्था भी रोती है, गुंडों के घर में सोती है पूरे कांप रहे आधों से राजा डरता है। प्यादों से गांधी को गाली मिलती है।
डाकू को ताली मिलती है क्या अपराधिक चलन हुआ है। मेरा भी अपहरण हुआ है। मैं चोटिल हूं क्षत विक्षत हूं। मैंने यूं आघात सहा है जैसे घायल पड़ा जटायु हारा थका कराह रहा है।
जिंदा हूं या मरा पड़ा हूं, अपनी नब्ज टटोल रहा हूं, मैं भारत का संविधान हूं, आ लालकिले से बोल रहा हूं। संवाद