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Maharajganj News: एक ही फर्म पर विभाग मेहरबान, दो करोड़ की दवा खरीदी
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संवाद न्यूज एजेंसी
महराजगंज। जिला अस्पताल में बाहर से दवा की खरीदारी के लिए लोकल परचेज (एलपी) के लिए एक ही फार्म पर विभाग मेहरबान है। 10 साल से करीब दो करोड़ से अधिक की दवाओं समेत अन्य मेडिकल सामग्री की खरीदारी हुई है। सर्वाधिक रकम कोरोना काल में खर्च की गई है। नियम के मुताबिक फर्म का चयन करने के लिए टेंडर होना चाहिए लेकिन जिम्मेदारों ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया।
जन सूचना अधिकार के तहत हैरान करने वाली जानकारी सामने आई है। एक ही फर्म को बीते दस साल से दवा खरीदारी के लिए चयनित किया जा रहा है। जबकि नियम के मुताबिक, निविदा निकालने के बाद चयन प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए। वर्ष 2016 से 2023 तक ही मेडिकल एजेंसी को चयनित किया जाता रहा है। वर्तमान में भी उसी फर्म से दवाएं मंगाई जा रही हैं। इसके अलावा बाहर मिलने वाली दवाएं निशुल्क देने में भी गड़बड़ी का मामला सामने आया है। जिसे मेडिकल भत्ता मिलता है, उसे भी निशुल्क दवा बाहर से खरीद कर दी गई।
सूत्र बताते हैं कि दवा देने में भी अनियमितता बरती जाती है। बीमारी हो या न हो, डॉक्टर से पर्ची पर दवा लिखवाकर बेच दिए जाने की बात कही जा रही है। विभाग की ओर से अधिकृत दुकान पर ही यह खेल किया जाता है। इसमें नियम कानून का उल्लंघन भी नहीं होती है। क्योंकि अगर दवा की कीमत 10,000 रुपये होती है तो सात से आठ हजार रुपये में सौदा तय होता है। दवा लेने वाला व्यक्ति पर्चे पर दवा रिसीव कर लेता है। यह दस्तावेजी रिकॉर्ड फाइल में लग जाने के बाद अपडेट हो जाता है। जबकि हकीकत में न तो दवा ली जाती है न ही कोई बीमारी होती है। मामला इसलिए बाहर नहीं आता है क्योंकि इसमें फायदा दोनों को होता है। इस वजह से लिखापढ़ी पूरी तरह से व्यवस्थित होती है।
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जन सूचना में जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक वर्ष 2016 से 2023 तक 2,75,83,222 रुपये की खरीदारी हुए है। इसमें दवा के अलावा अन्य सामान शामिल हैं। लोकल पर्चेज में वर्ष 2020 में 26,273 रुपये, वर्ष 2022 में 5,56,187 रुपये और वर्ष 2023 में 7,08,014 रुपये की दवा खरीदी गई। इसी तरह से बीते वर्ष में भी खरीदारी हुई है। उधर, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एके द्विवेदी ने बताया कि फर्म चयन के लिए टेंडर प्रक्रिया का पालन होता है। एक फर्म के बार-बार चयन के मसले पर वह सटीक जवाब नहीं दे सके। करोड़ों की बिक्री करने वाले दुकान पर बोर्ड भी नहीं : स्वास्थ्य विभाग की ओर से अधिकृत दुकान पर दवा किसी को लेनी हो तो दुकान ढूंढना पड़ेगा। लोगों के मुताबिक दुकान का एक बोर्ड भी कहीं नहीं दिखता है। मामले को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गुप्ता कहते हैं कि सब कुछ सेट रहता है। ऐसे में दुकान का दिखना जरूरी नहीं है। दुकान पर पता सिर्फ पिपरदेउरा रोड लिखा है। ऐसे में कोई भी दुकान ढूंढते ही रह जाएगा। यह बात समझ में नहीं आ रही है कि यदि सबकुछ निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है तो दुकान का बोर्ड बाहर क्यों नहीं लगाया जाता है।
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महराजगंज। जिला अस्पताल में बाहर से दवा की खरीदारी के लिए लोकल परचेज (एलपी) के लिए एक ही फार्म पर विभाग मेहरबान है। 10 साल से करीब दो करोड़ से अधिक की दवाओं समेत अन्य मेडिकल सामग्री की खरीदारी हुई है। सर्वाधिक रकम कोरोना काल में खर्च की गई है। नियम के मुताबिक फर्म का चयन करने के लिए टेंडर होना चाहिए लेकिन जिम्मेदारों ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया।
जन सूचना अधिकार के तहत हैरान करने वाली जानकारी सामने आई है। एक ही फर्म को बीते दस साल से दवा खरीदारी के लिए चयनित किया जा रहा है। जबकि नियम के मुताबिक, निविदा निकालने के बाद चयन प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए। वर्ष 2016 से 2023 तक ही मेडिकल एजेंसी को चयनित किया जाता रहा है। वर्तमान में भी उसी फर्म से दवाएं मंगाई जा रही हैं। इसके अलावा बाहर मिलने वाली दवाएं निशुल्क देने में भी गड़बड़ी का मामला सामने आया है। जिसे मेडिकल भत्ता मिलता है, उसे भी निशुल्क दवा बाहर से खरीद कर दी गई।
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सूत्र बताते हैं कि दवा देने में भी अनियमितता बरती जाती है। बीमारी हो या न हो, डॉक्टर से पर्ची पर दवा लिखवाकर बेच दिए जाने की बात कही जा रही है। विभाग की ओर से अधिकृत दुकान पर ही यह खेल किया जाता है। इसमें नियम कानून का उल्लंघन भी नहीं होती है। क्योंकि अगर दवा की कीमत 10,000 रुपये होती है तो सात से आठ हजार रुपये में सौदा तय होता है। दवा लेने वाला व्यक्ति पर्चे पर दवा रिसीव कर लेता है। यह दस्तावेजी रिकॉर्ड फाइल में लग जाने के बाद अपडेट हो जाता है। जबकि हकीकत में न तो दवा ली जाती है न ही कोई बीमारी होती है। मामला इसलिए बाहर नहीं आता है क्योंकि इसमें फायदा दोनों को होता है। इस वजह से लिखापढ़ी पूरी तरह से व्यवस्थित होती है।
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जन सूचना में जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक वर्ष 2016 से 2023 तक 2,75,83,222 रुपये की खरीदारी हुए है। इसमें दवा के अलावा अन्य सामान शामिल हैं। लोकल पर्चेज में वर्ष 2020 में 26,273 रुपये, वर्ष 2022 में 5,56,187 रुपये और वर्ष 2023 में 7,08,014 रुपये की दवा खरीदी गई। इसी तरह से बीते वर्ष में भी खरीदारी हुई है। उधर, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एके द्विवेदी ने बताया कि फर्म चयन के लिए टेंडर प्रक्रिया का पालन होता है। एक फर्म के बार-बार चयन के मसले पर वह सटीक जवाब नहीं दे सके। करोड़ों की बिक्री करने वाले दुकान पर बोर्ड भी नहीं : स्वास्थ्य विभाग की ओर से अधिकृत दुकान पर दवा किसी को लेनी हो तो दुकान ढूंढना पड़ेगा। लोगों के मुताबिक दुकान का एक बोर्ड भी कहीं नहीं दिखता है। मामले को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गुप्ता कहते हैं कि सब कुछ सेट रहता है। ऐसे में दुकान का दिखना जरूरी नहीं है। दुकान पर पता सिर्फ पिपरदेउरा रोड लिखा है। ऐसे में कोई भी दुकान ढूंढते ही रह जाएगा। यह बात समझ में नहीं आ रही है कि यदि सबकुछ निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है तो दुकान का बोर्ड बाहर क्यों नहीं लगाया जाता है।