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युवराज आदिकुमार को संसार से हुआ वैराग्य

Mon, 24 Feb 2020 01:48 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 24 Feb 2020 01:48 AM IST
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yuvraj adi kumar become sant
ललितपुर। महरौनी विकासखंड में स्थित प्रागैतिहासिक क्षेत्र नवागढ़ में मंत्रात्मक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में रविवार को जन्म कल्याणक और तप कल्याणक विधि विधान से मनाया गया। युवराज आदिकुमार को संसार से वैराग्य हो गया।
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सुबह पात्र शुद्धि, अभिषेक, शांतिधारा एवं नित्य पूजन किया गया। प्रतिष्ठाचार्य द्वारा घोषणा करने पर कि तीर्थंकर बालक आदिकुमार का जन्म हो गया है, श्रद्धालुओं में खुशी छा गई। श्रद्धालु भावी तीर्थंकर भगवान के जन्म की खुशियां बांटने लगे। जन्म की बधाइयां हुईं। नगाड़े बजे और मंगल गीत गाए गए। तीर्थंकर बालक का जन्माभिषेक शोभायात्रा निकाली। पांडुक शिला पर हुए जन्माभिषेक को देखने श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। बालक को सौधर्म इंद्र ने पांडुक शिला पर ले जाकर अभिषेक कराया। इंद्राणी द्वारा तीर्थंकर बालक का प्रथम दर्शन एवं इंद्र द्वारा सहस्र नेत्रों द्वारा दर्शन का मंचन पंचकल्याणक के पात्रों द्वारा किया गया।
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बालक आदिकुमार को पालना झुलाने भारी उत्साह रहा। तप कल्याणक के अंतर्गत महाराजा नाभिराय का दरबार, राज्याभिषेक, भेंट समर्पण और विवाह की क्रियाओं को किया गया। दीक्षा संस्कार, वैराग्य, देवों का आगमन दर्शाया गया।संसार की क्षणभंगुरता के बोध से युवराज आदिकुमार को संसार से वैराग्य हो गया और उनके जैनेश्वरी दीक्षा की प्रक्रिया मंचित की गई। इसके बाद दीक्षा विधि हुई।
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इस अवसर पर अहिंसा करुणा के आचार्य शांतिसागर छाणी विशेषांक का विमोचन अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन शास्त्री परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. श्रेयांस कुमार जैन बड़ौत, महामंत्री ब्रह्मचारी जयकुमार निशांत टीकमगढ़, प्रतिष्ठाचार्य विनोद जैन रजवांस, सलाहकार संपादक डॉ. सुनील संचय, मनीष संजू, मनोज आहार, विजय शास्त्री, संतोष शास्त्री, शाहगढ़, ऋषभ शास्त्री, सुरेंद्र बड़ागांव, शोभालाल जैन, अजित, कैलाश शास्त्री, अखिलेश आदि विद्वानों द्वारा किया गया।

आचार्यश्री विनिश्चय सागर महाराज ने कहा कि जीव का सबसे बड़ा शत्रु मोह है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए सबसे पहले मोह को समाप्त करना पड़ेगा। दीक्षाकल्याणक विरक्ति का महोत्सव है। यदि राग नहीं छूटा तो दीक्षा लेने का कोई मतलब नहीं है। वैराग्य टेढ़ी खीर नहीं है, बस प्रज्ञा को जगाने की जरूरत है। गृहस्थी आत्म कल्याण भुला देता है। संसार का यह रूप, सम्पदा क्षणिक है, अस्थिर है, किन्तु आत्मा का रूप आलौकिक है, आत्मा की संपदा अनंत अक्षय है।
अतिथियों का स्वागत अध्यक्ष सनत जैन, योगेंद्र जैन, राजकुमार चूना, वीरचंद नेकौरा, शिखरचंद, अशोक मैनवार, संजीव जैन ने किया।
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