{"_id":"661ad4e22f01ebc140098154","slug":"the-unique-beauty-of-the-beautiful-valleys-can-be-seen-from-maa-vindhyavasini-temple-lalitpur-news-c-131-1-ltp1002-113217-2024-04-14","type":"story","status":"publish","title_hn":"Lalitpur News: मां विंध्यवासिनी मंदिर से दिखता है खूबसूरत वादियों का अनोखा सौंदर्य","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Lalitpur News: मां विंध्यवासिनी मंदिर से दिखता है खूबसूरत वादियों का अनोखा सौंदर्य
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। डोंगराकलां की पहाड़ी पर मां विंध्यवासिनी की मूर्ति है। जनवरी 2006 में इस मंदिर का निर्माण शुरू किया गया था। पहाड़ की चोटी पर दो एकड़ जमीन को समतल कर बड़ी मुश्किल से यहां उतंग शिखर वाला मंदिर व धर्मशालाएं बनवाई गई हैं। मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा 9 मार्च सन 2011 को हुई। घुमावदार पहाड़ी रास्ते से होकर इस मंदिर पर चढ़ते समय विशालकाय मुख्य दरवाजा दिखाई देता है, जो प्राचीन मुगल और राजपूताना शैली का नमूना है।
सागर हाईवे पर 25 किलोमीटर बंगरिया गांव से लिंक रोड है। यहां से दायीं ओर पांच किलोमीटर चलकर दूर से दिख रहे मंदिर पर पहुंचा जाता है। चारों ओर से विंध्याचल की पहाड़ियों से घिरे इस मंदिर का नजारा एकदम अलग है। यहां आकर असीम शांति का अनुभव होता है। यहां पानी की व्यवस्था न होने के कारण प्रतिदिन एक टैंकर से पानी चढ़ाया जाता है। जिससे यहां के नलों में लगातार पानी आता है। बिजली की व्यवस्था समुचित है। प्रतिदिन आसपास व मध्य प्रदेश के श्रद्धालु यहां मत्था टेकने आते हैं। पहाड़ी पर पेड़ लगाए जाने से हमेशा हरियाली रहती है। स्थानीय ग्रामीणों ने एक परिवार की मदद से इस मंदिर को बनवाया है।
=-- -- -- -- -- -- -
मंदिर से दिखाई देते हैं चारों बांधों के भराव : यहां से गौर से देखने पर चार दिशाओं में चार बांधों का जलभराव दिखाई देता है। जामनी बांध, सजनाम बांध, राजघाट और गोविंदसागर बांध के विहंगम दृश्य चारों ओर फैली विंध्य पर्वतमालाओं के बीच अनोखी छवि प्रस्तुत करती है।
विज्ञापन
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -
भव्य है मुख्य दरवाजा : मंदिर के रास्ते में मुख्य दरवाजा राजपूताना शैली में बनाया गया है। इसकी दोनों मीनारें खास मुगल शैली में बनाई गई हैं। दरवाजे में चार सर्व सुविधायुक्त आवासीय कक्ष, प्राकृतिक रोशनी और हवा से युक्त गुप्त दरवाजे मौजूद हैं। अंदर से देखने पर यह दरवाजा भूल-भुलैया से कम नजर नहीं आता।
-- -- -- -- -- -- -- -- --
अनोखे नाग ने डाला था डेरा
मंदिर के मुख्य द्वार पर बने चबूतरे पर करीब दस साल पहले दीपावली के पहले एक काला विशाल नाग डेरा जमा कर बैठ गया था। इसको देव मानकर लोगों ने इसकी पूजा अर्चना शुरू कर दी थी। यह चमत्कारी सर्प 18 दिन यहां रहकर अचानक अंतर्ध्यान हो गया था। स्थानीय कुलीन परिवार की महिलाओं ने नाग के माथे पर टीका कर उसे दूध आदि भोग लगाया था। यह चर्चा इलाके में आज भी रोचक तरीके से सुनाई जाती है।
-- -- -- -- -
भक्तों ने की स्कंदमाता की आराधना
नवरात्र के पांचवें दिन भक्तों ने देवी मां के पांचवें स्वरूप स्कंदमाता की आराधना कर मंदिरों में पूजन किया। श्रद्धालु सुबह से ही मंदिरों में पूजन अर्चन को पहुंचे और शक्ति स्वरूपा मां स्कंदमाता की आराधना की। वहीं आचार्यों ने दुर्गा सप्तसती का पाठ किया। बड़ी माता (ललितेश्वरी देवी), छोटी माता और चंडी माता मंदिर में देवी के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। इधर, घरों में देवी का पूजन कर शाम को भजन संध्या की गई। संवाद
विज्ञापन
ललितपुर। डोंगराकलां की पहाड़ी पर मां विंध्यवासिनी की मूर्ति है। जनवरी 2006 में इस मंदिर का निर्माण शुरू किया गया था। पहाड़ की चोटी पर दो एकड़ जमीन को समतल कर बड़ी मुश्किल से यहां उतंग शिखर वाला मंदिर व धर्मशालाएं बनवाई गई हैं। मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा 9 मार्च सन 2011 को हुई। घुमावदार पहाड़ी रास्ते से होकर इस मंदिर पर चढ़ते समय विशालकाय मुख्य दरवाजा दिखाई देता है, जो प्राचीन मुगल और राजपूताना शैली का नमूना है।
सागर हाईवे पर 25 किलोमीटर बंगरिया गांव से लिंक रोड है। यहां से दायीं ओर पांच किलोमीटर चलकर दूर से दिख रहे मंदिर पर पहुंचा जाता है। चारों ओर से विंध्याचल की पहाड़ियों से घिरे इस मंदिर का नजारा एकदम अलग है। यहां आकर असीम शांति का अनुभव होता है। यहां पानी की व्यवस्था न होने के कारण प्रतिदिन एक टैंकर से पानी चढ़ाया जाता है। जिससे यहां के नलों में लगातार पानी आता है। बिजली की व्यवस्था समुचित है। प्रतिदिन आसपास व मध्य प्रदेश के श्रद्धालु यहां मत्था टेकने आते हैं। पहाड़ी पर पेड़ लगाए जाने से हमेशा हरियाली रहती है। स्थानीय ग्रामीणों ने एक परिवार की मदद से इस मंदिर को बनवाया है।
विज्ञापन
=
मंदिर से दिखाई देते हैं चारों बांधों के भराव : यहां से गौर से देखने पर चार दिशाओं में चार बांधों का जलभराव दिखाई देता है। जामनी बांध, सजनाम बांध, राजघाट और गोविंदसागर बांध के विहंगम दृश्य चारों ओर फैली विंध्य पर्वतमालाओं के बीच अनोखी छवि प्रस्तुत करती है।
विज्ञापन
भव्य है मुख्य दरवाजा : मंदिर के रास्ते में मुख्य दरवाजा राजपूताना शैली में बनाया गया है। इसकी दोनों मीनारें खास मुगल शैली में बनाई गई हैं। दरवाजे में चार सर्व सुविधायुक्त आवासीय कक्ष, प्राकृतिक रोशनी और हवा से युक्त गुप्त दरवाजे मौजूद हैं। अंदर से देखने पर यह दरवाजा भूल-भुलैया से कम नजर नहीं आता।
अनोखे नाग ने डाला था डेरा
मंदिर के मुख्य द्वार पर बने चबूतरे पर करीब दस साल पहले दीपावली के पहले एक काला विशाल नाग डेरा जमा कर बैठ गया था। इसको देव मानकर लोगों ने इसकी पूजा अर्चना शुरू कर दी थी। यह चमत्कारी सर्प 18 दिन यहां रहकर अचानक अंतर्ध्यान हो गया था। स्थानीय कुलीन परिवार की महिलाओं ने नाग के माथे पर टीका कर उसे दूध आदि भोग लगाया था। यह चर्चा इलाके में आज भी रोचक तरीके से सुनाई जाती है।
भक्तों ने की स्कंदमाता की आराधना
नवरात्र के पांचवें दिन भक्तों ने देवी मां के पांचवें स्वरूप स्कंदमाता की आराधना कर मंदिरों में पूजन किया। श्रद्धालु सुबह से ही मंदिरों में पूजन अर्चन को पहुंचे और शक्ति स्वरूपा मां स्कंदमाता की आराधना की। वहीं आचार्यों ने दुर्गा सप्तसती का पाठ किया। बड़ी माता (ललितेश्वरी देवी), छोटी माता और चंडी माता मंदिर में देवी के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। इधर, घरों में देवी का पूजन कर शाम को भजन संध्या की गई। संवाद