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सत्संग से बदल जाती है जीवन की धारा

Mon, 19 Aug 2019 09:00 PM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 19 Aug 2019 09:00 PM IST
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satsang becomes turning point of life
सत्संग से बदल जाती है जीवन की धारा
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पाली। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में बस स्टैंड कारसदेव मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा सुनाते हुए कथा व्यास कांशीराम शास्त्री ने कहा कि संतों का सत्संग करने पर यह नहीं सोचना चाहिए कि हमें कोई बीमारी नहीं आएगी। हमारा परिवार खुशहाल रहेगा या हमारा व्यापार अच्छा चल जाएगा, यह तो प्रारब्ध होता है। जो इस दुनिया में आया है उसे एक दिन जाना ही है। जब लाभ होता है तो हानि भी निश्चित है। सत्संग में जीवन की धारा बदल जाती है।

कथा व्यास ने कहा कि सत्संग जीवन की धारा बदल देता है और आप ज्ञान और भक्ति की धारा में बहने लगते हैं। बार-बार सत्संग करने के बाद उसका मूल नहीं समझ पाते तो जीवन पर्यंत सत्संग करने के बाद भी अंत में उनको कुछ भी हासिल नहीं होता है। जैसे जंगल में वृक्ष बहुत होते हैं, लेकिन चंदन वृक्ष की सुगंध से ही जंगल महकता है। ठीक उसी प्रकार एक पुत्र अपने परिवार सहित पुरखों का उद्धार कर देता है। आज के वर्तमान परिवेश में पुत्रों को कई नाम से पुकारा जाता है। जैसे बेटा, जो बैठा-बैठा खाए, लड़का जो लड़ झगड़ कर खाएं। इन्हीं में एक होता है पुत्र। गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी श्रीराम को दशरथ का पुत्र लिखा। रामायण के एक प्रसंग को सुनाते उन्होंने कहा कि एक पुत्र हुआ था केवट, जिसने श्रीराम के पांव पखार कर अकेले ही जल नहीं पिया था। जल पीते समय अपने पुरखों को भी याद किया, जिससे जो पुरखे नरक में पड़े थे उनके लिए भी धर्मराज ने स्वर्ग के दरवाजे खोल दिए। ऐसा प्रसंग देख देवता भी आसमान से पुष्पों की बरसात करने लगे और कहा कि विधाता किस्मत लिखते हैं, बनाते नहीं है। उदाहरण के तौर पर बताया कि जैसे बैंक में रुपये जमा करते तो बैंक कर्मचारी केवल पासबुक पर लेन-देन लिखता है। इसलिए कर्मों से अपनी किस्मत बनाओ, जिससे विधाता के पास आपका लेखा-जोखा अच्छा बना रहे। भागवत कथा को कल्प वृक्ष बताते हुए उन्होंने अनेक प्रसंग सुनाए। इस दौरान कथा पारीक्षत मुन्नालाल यादव, शालिकराम टोंटे, तिलक यादव, राहुल यादव, खिलान यादव, गोपाल यादव मौजूद रहे।
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