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Lalitpur News: अब नहीं होतीं कटरा बाजार और घंटाघर पर जनसभाएं, नुक्कड़ सभाओं का भी नहीं रहा क्रेज
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रवि शंकर सेन
ललितपुर। वक्त के साथ चुनाव प्रचार के तौर-तरीके भी बदल गए हैं। चुनाव आयोग की सख्ती से नुक्कड़ सभाओं का चलन भी लगभग खत्म हो गया है। वहीं, जनसभाएं भी अब कम ही होती हैं। झांसी-ललितपुर संसदीय सीट के तहत ललितपुर जिला मुख्यालय के कटरा बाजार और घंटाघर पर जनसभाएं नहीं होती हैं। यहां जनसंघ के लोग सुबह जनसभा करते तो सोशलिस्ट पार्टी के लोग शाम को उनके खिलाफ जनता के बीच में ताल ठोंकते थे।
पहले इन सभाओं को सुनने के लिए बैलगाड़ी, ट्रैक्टर से ग्रामीण जनपद मुख्यालय आया करते थे। कई दिनों पहले इसकी सूचना गांव-गांव में पहुंचाई जाती थी। लोगों की भीड़ सभा सुनने के लिए एकत्रित होती थी। ग्रामीण इलाकों में होने वाली नुक्कड़ सभाओं को मशालें रोशन करती थी। मंच भी समर्थकों के घर से लाए गए तख्त पर बनता था। अब तो अगर सभा होती हैं तो टेंट हाउस से मंच तैयार किया जाता है। चुनाव के पहले ही पार्टियां चुनाव की तैयारियां प्रारंभ कर देतीं थीं। नेताओं का सीधा संपर्क जनता से होता था। शहरी क्षेत्रों में प्रमुख चौराहों पर जनसभा का आयोजन किया जाता था। गांवों में नुक्कड़ सभाएं प्रारंभ हो जातीं थीं। विपक्षी सरकार की कमियां लोगों के सामने पेश कर पार्टी के वादों को दोहराते थे। वहीं, सत्ता पक्ष अपने कार्यों को जनता के बीच गिनाते नहीं थकती थी। आधुनिक युग में मोबाइल और इंटरनेट ने चुनाव को हाईटेक बना दिया है। संवाद
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सावरकर चौक पर चुनावी चर्चा भी हुई समाप्त
चुनाव के समय सावरकर चौक पर स्थानीय नेताओं का जमावड़ा लगा रहता था। चाय की चुस्की के साथ चुनावी समीकरणों पर बहस-मुबाहिसों का दौर चलता था। कभी-कभी तो मतदान के पहले ही प्रत्याशियों की जीत-हार भी तय कर दी जाती। अब यहां भी वह चुनावी चक्कलस नहीं रह गई।
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बच्चों को भी खूब भाते थे प्लास्टिक बिल्ले
उस दौर में चुनाव प्रचार का बड़ा जरिया प्लास्टिक के बिल्ले हुआ करते थे। बच्चों को यह खूब भाते थे। वहीं, बड़ों में प्लास्टिक और लोहे की चादर से निर्मित बिल्ला लगाने वाला पार्टी का खास माना जाता था। जनसंपर्क के दौरान कागज के बिल्ले बांटे जाते।
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वॉल पेंटिंग से रंग दी जाती थी घरों की दीवारों
वॉल पेंटिंग से घरों की दीवारें रंग दी जातीं थीं। प्रत्याशी के समर्थक रात भर जागकर दीवारों पर वोट के लिए लाल और नीले रंग से लिखते थे।
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ललितपुर। वक्त के साथ चुनाव प्रचार के तौर-तरीके भी बदल गए हैं। चुनाव आयोग की सख्ती से नुक्कड़ सभाओं का चलन भी लगभग खत्म हो गया है। वहीं, जनसभाएं भी अब कम ही होती हैं। झांसी-ललितपुर संसदीय सीट के तहत ललितपुर जिला मुख्यालय के कटरा बाजार और घंटाघर पर जनसभाएं नहीं होती हैं। यहां जनसंघ के लोग सुबह जनसभा करते तो सोशलिस्ट पार्टी के लोग शाम को उनके खिलाफ जनता के बीच में ताल ठोंकते थे।
पहले इन सभाओं को सुनने के लिए बैलगाड़ी, ट्रैक्टर से ग्रामीण जनपद मुख्यालय आया करते थे। कई दिनों पहले इसकी सूचना गांव-गांव में पहुंचाई जाती थी। लोगों की भीड़ सभा सुनने के लिए एकत्रित होती थी। ग्रामीण इलाकों में होने वाली नुक्कड़ सभाओं को मशालें रोशन करती थी। मंच भी समर्थकों के घर से लाए गए तख्त पर बनता था। अब तो अगर सभा होती हैं तो टेंट हाउस से मंच तैयार किया जाता है। चुनाव के पहले ही पार्टियां चुनाव की तैयारियां प्रारंभ कर देतीं थीं। नेताओं का सीधा संपर्क जनता से होता था। शहरी क्षेत्रों में प्रमुख चौराहों पर जनसभा का आयोजन किया जाता था। गांवों में नुक्कड़ सभाएं प्रारंभ हो जातीं थीं। विपक्षी सरकार की कमियां लोगों के सामने पेश कर पार्टी के वादों को दोहराते थे। वहीं, सत्ता पक्ष अपने कार्यों को जनता के बीच गिनाते नहीं थकती थी। आधुनिक युग में मोबाइल और इंटरनेट ने चुनाव को हाईटेक बना दिया है। संवाद
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सावरकर चौक पर चुनावी चर्चा भी हुई समाप्त
चुनाव के समय सावरकर चौक पर स्थानीय नेताओं का जमावड़ा लगा रहता था। चाय की चुस्की के साथ चुनावी समीकरणों पर बहस-मुबाहिसों का दौर चलता था। कभी-कभी तो मतदान के पहले ही प्रत्याशियों की जीत-हार भी तय कर दी जाती। अब यहां भी वह चुनावी चक्कलस नहीं रह गई।
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बच्चों को भी खूब भाते थे प्लास्टिक बिल्ले
उस दौर में चुनाव प्रचार का बड़ा जरिया प्लास्टिक के बिल्ले हुआ करते थे। बच्चों को यह खूब भाते थे। वहीं, बड़ों में प्लास्टिक और लोहे की चादर से निर्मित बिल्ला लगाने वाला पार्टी का खास माना जाता था। जनसंपर्क के दौरान कागज के बिल्ले बांटे जाते।
वॉल पेंटिंग से रंग दी जाती थी घरों की दीवारों
वॉल पेंटिंग से घरों की दीवारें रंग दी जातीं थीं। प्रत्याशी के समर्थक रात भर जागकर दीवारों पर वोट के लिए लाल और नीले रंग से लिखते थे।