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उजड़ रही राजा बखत सिंह की विरासत
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खंडहर में तब्दील हो रहा सौरई का किला
- फोटो : LALITPUR
डोंगरा खुर्द (ललितपुर)। ग्राम सौरई में राजा बखतवली सिंह की विरासत देखरेख के अभाव में उजड़ रहीं है। उन्होंने वर्षों पहले मराठों से हुए एक युद्ध में संधि के बाद ग्राम सौरई में अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था, उनकी एक संपन्न रियासत रहीं है। इसे राजा की बैठक का मुख्य गढ़ माना जाता था।
जिले के गांव-गांव में पुरातत्व स्थलों का इतिहास विद्यमान है लेकिन अब उन विरासतों को देखरेख के अभाव में खतरा उत्पन्न हो गया है। कई विरासतें पुरातत्व विभाग की उपेक्षा की भेंट चढ़ गई हैं। ऐसा ही कुछ हाल राजा बखतवली सिंह की विरासत का हो गया है। जिले से करीब 70 किलोमीटर दूर तहसील मड़ावरा के अंतर्गत सौरई गांव है। जहां लगभग 18वी शताब्दी में मराठा शासनकाल के दौरान किले का निर्माण मोराजी द्वारा कराया गया था। कुछ समय बाद शाहगढ़ स्टेट के राजा बखतवली सिंह जिन्हें तालबेहट के राजा मर्दन सिंह की ममेरी बहन ब्याही थी। उन्होंने मराठों से एक युद्ध में हुई संधि के बाद सौरई पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।
अंग्रेजी सेना से विद्रोह के चलते राजा युद्ध में शहीद हो गए और रानी ने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली थी
समय बीतने के साथ ही यहां सब उस वक्त वीरान हो गया, जब अंग्रेजी सेना से विद्रोह के चलते राजा युद्ध में शहीद हो गए और रानी ने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली थी। वर्ष 1857 की क्रांति में सौरई नरेश महाराजा बखत सिंह का योगदान रहा है। वर्तमान में किले के अंदर प्रवेश के दो मुख्य मार्ग हैं, जिनमें एक को सैन्य पूर्वी प्रवेश द्वार और दूसरे को पश्चिमी हाथी दरवाजा के नाम से जाना जाता है। किले की बाह्य संरचना अत्यंत मनोहारी है। यहां बनी अलग-अलग छह बुर्ज आकर्षण का केंद्र है, जिनमें चार को कमल बुर्ज के नाम से जाने जाते हैं क्योंकि इनकी कलाकृति कमल की पंखुड़ियों के आकार में ढली हुई है। उनके अंदर भी बेहतरीन नक्काशी, कलाकृतियों का सृजन किया गया है। बाहरी भाग में एक कुआं है। किवदंतियों के अनुसार, इस कुएं को किला निर्माण के दौरान बनाया गया था, जिसके गुप्त मार्ग से होकर रानी स्नान करने बावड़ी तक पहुंचा करती थीं। जहां बड़े-बड़े स्नानगृह अब भी मौजूद हैं। राजा बखत बली सिंह इसी अंदरखाने के मध्य से अपनी पड़ोसी विरासत मड़ावरा तक पहुंचा करते थे।
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आज भी मिलते हैं अवशेष
लोग बताते हैं कि मकान निर्माण के लिए नींव या अन्य किसी कार्य से जब जमीन को खोदा जाता है तो अभी भी इसके अवशेष निकलते हैं। यहां किले से कुछ दूरी पर एक प्राचीन शिलाओं का बांध बना हुआ था, जो अब छिन्न-भिन्न हो चुका है। बांध की शिलाएं अब तक उस इतिहास की गौरवगाथा बयां करते दिखती हैं। किला परिसर के बीचोंबीच एक बड़ी अट्टालिका बनी थी जो देखरेख के अभाव में अब जमींदोज हो चुकी है। किला के बाह्य भाग में स्थित एक प्राचीन मंदिर उस समय के मंत्री ने विशेष पूजा-अर्चना के लिए बनवाया था। इसकी मूल बेदी पर अपठित भाषा में कुछ शब्दावली देखी जा सकती है। इस मंदिर की दैवीय मूर्तियों का कोई अता पता नहीं है। अभी भी इस किला की बेहतरीन नक्काशी के अवशेषों को देखा जा सकता है।
किला अति प्राचीन धरोहर है, जिसे सहेजने के लिए प्रशासन और पुरातत्व विभाग को खास इंतजाम करने चाहिए।-दयाराम मिश्रा, ग्राम सौरई
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देखरेख के अभाव में किला बदहाल होता जा रहा है। इसके संरक्षण के लिए सुरक्षा गार्ड की तैनाती अति आवश्यक है।-अनिल खरे, अध्यापक
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साफ-सफाई के नाम पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाया गया। इसके बावजूद सूरतेहाल जस के तस बने हुए हैं।-पदमचंद जैन सेवानिवृत्त शिक्षक सौरई
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जिले के गांव-गांव में पुरातत्व स्थलों का इतिहास विद्यमान है लेकिन अब उन विरासतों को देखरेख के अभाव में खतरा उत्पन्न हो गया है। कई विरासतें पुरातत्व विभाग की उपेक्षा की भेंट चढ़ गई हैं। ऐसा ही कुछ हाल राजा बखतवली सिंह की विरासत का हो गया है। जिले से करीब 70 किलोमीटर दूर तहसील मड़ावरा के अंतर्गत सौरई गांव है। जहां लगभग 18वी शताब्दी में मराठा शासनकाल के दौरान किले का निर्माण मोराजी द्वारा कराया गया था। कुछ समय बाद शाहगढ़ स्टेट के राजा बखतवली सिंह जिन्हें तालबेहट के राजा मर्दन सिंह की ममेरी बहन ब्याही थी। उन्होंने मराठों से एक युद्ध में हुई संधि के बाद सौरई पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।
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अंग्रेजी सेना से विद्रोह के चलते राजा युद्ध में शहीद हो गए और रानी ने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली थी
समय बीतने के साथ ही यहां सब उस वक्त वीरान हो गया, जब अंग्रेजी सेना से विद्रोह के चलते राजा युद्ध में शहीद हो गए और रानी ने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली थी। वर्ष 1857 की क्रांति में सौरई नरेश महाराजा बखत सिंह का योगदान रहा है। वर्तमान में किले के अंदर प्रवेश के दो मुख्य मार्ग हैं, जिनमें एक को सैन्य पूर्वी प्रवेश द्वार और दूसरे को पश्चिमी हाथी दरवाजा के नाम से जाना जाता है। किले की बाह्य संरचना अत्यंत मनोहारी है। यहां बनी अलग-अलग छह बुर्ज आकर्षण का केंद्र है, जिनमें चार को कमल बुर्ज के नाम से जाने जाते हैं क्योंकि इनकी कलाकृति कमल की पंखुड़ियों के आकार में ढली हुई है। उनके अंदर भी बेहतरीन नक्काशी, कलाकृतियों का सृजन किया गया है। बाहरी भाग में एक कुआं है। किवदंतियों के अनुसार, इस कुएं को किला निर्माण के दौरान बनाया गया था, जिसके गुप्त मार्ग से होकर रानी स्नान करने बावड़ी तक पहुंचा करती थीं। जहां बड़े-बड़े स्नानगृह अब भी मौजूद हैं। राजा बखत बली सिंह इसी अंदरखाने के मध्य से अपनी पड़ोसी विरासत मड़ावरा तक पहुंचा करते थे।
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आज भी मिलते हैं अवशेष
लोग बताते हैं कि मकान निर्माण के लिए नींव या अन्य किसी कार्य से जब जमीन को खोदा जाता है तो अभी भी इसके अवशेष निकलते हैं। यहां किले से कुछ दूरी पर एक प्राचीन शिलाओं का बांध बना हुआ था, जो अब छिन्न-भिन्न हो चुका है। बांध की शिलाएं अब तक उस इतिहास की गौरवगाथा बयां करते दिखती हैं। किला परिसर के बीचोंबीच एक बड़ी अट्टालिका बनी थी जो देखरेख के अभाव में अब जमींदोज हो चुकी है। किला के बाह्य भाग में स्थित एक प्राचीन मंदिर उस समय के मंत्री ने विशेष पूजा-अर्चना के लिए बनवाया था। इसकी मूल बेदी पर अपठित भाषा में कुछ शब्दावली देखी जा सकती है। इस मंदिर की दैवीय मूर्तियों का कोई अता पता नहीं है। अभी भी इस किला की बेहतरीन नक्काशी के अवशेषों को देखा जा सकता है।
किला अति प्राचीन धरोहर है, जिसे सहेजने के लिए प्रशासन और पुरातत्व विभाग को खास इंतजाम करने चाहिए।-दयाराम मिश्रा, ग्राम सौरई
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देखरेख के अभाव में किला बदहाल होता जा रहा है। इसके संरक्षण के लिए सुरक्षा गार्ड की तैनाती अति आवश्यक है।-अनिल खरे, अध्यापक
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साफ-सफाई के नाम पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाया गया। इसके बावजूद सूरतेहाल जस के तस बने हुए हैं।-पदमचंद जैन सेवानिवृत्त शिक्षक सौरई