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मैदान से मेडल तक : अभावों के बीच निखरा किसान के बेटे अभय पस्तोर का हुनर

Sun, 23 Aug 2026 01:24 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sun, 23 Aug 2026 01:24 AM IST
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From the Field to the Podium: The Talent of Farmer's Son Abhay Pastor Blossoms Amidst Adversity
ललितपुर। बुंदेलखंड की धरती पर प्रतिभाओं की कमी नहीं है, जरूरत है तो उन्हें सही मंच और मार्गदर्शन मिलने की। जिले की मड़ावरा तहसील के अर्जुन खिरिया गांव निवासी अभय पस्तोर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। सीमित संसाधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बीच शुरू हुआ उनका वॉलीबाल का सफर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुका है। गांव के मैदान से शुरू हुई मेहनत ने उन्हें देश की टीम तक पहुंचाया और विदेश में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया।
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गांव से शुरू हुआ खेल का सफर

ग्राम पंचायत अर्जुन खिरिया निवासी दिनेश पस्तोर के पुत्र अभय पस्तोर की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। कक्षा छह से दस तक उन्होंने बिरधा स्थित माया ज्ञानोदय आवासीय विद्यालय में पढ़ाई की। विद्यालय में वॉलीबाल खेला जाता था। यहीं से अभय की इस खेल के प्रति रुचि बढ़ी और उन्होंने नियमित रूप से वॉलीबाल खेलना शुरू किया। हाईस्कूल के बाद उन्होंने तेरई फाटक स्थित आवासीय विद्यालय से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद प्रयागराज में कोचिंग की, लेकिन बाद में वह वापस गांव लौट आए। गांव और आसपास के क्षेत्रों में होने वाले वॉलीबाल मुकाबलों में वह लगातार हिस्सा लेते रहे।
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कोच नहीं मिला, फिर भी नहीं छोड़ा मैदान

अभय का खेल अच्छा था, लेकिन गांव में उन्हें प्रशिक्षण देने वाला कोई कोच या उचित मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने खेलना जारी रखा और अपने प्रदर्शन को लगातार बेहतर करते रहे। इसी दौरान मध्य प्रदेश के बड़ागांव में आयोजित एक टूर्नामेंट ने उनके खेल को नई दिशा दी। प्रतियोगिता में उनके प्रदर्शन को देखकर निर्णायकों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उनका चयन मध्य प्रदेश की वॉलीबाल टीम के लिए किया गया। इसके बाद छत्तीसगढ़ में भी उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया।
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पांडिचेरी से मिली राष्ट्रीय टीम में जगह

अभय के लिए अगला बड़ा पड़ाव पांडिचेरी में आयोजित राज्य स्तरीय वॉलीबाल प्रतियोगिता रही। प्रतियोगिता में 22 राज्यों की टीमों ने हिस्सा लिया। यहां भी अभय ने शानदार प्रदर्शन किया। उनके प्रदर्शन के आधार पर उन्हें भारतीय टीम में जगह बनाने का अवसर मिला। यह उनके लिए ही नहीं, बल्कि अर्जुन खिरिया और जिले के लिए गौरव का क्षण था। गांव की सीमित सुविधाओं में अभ्यास करने वाला खिलाड़ी अब देश का प्रतिनिधित्व करने की राह पर था।
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थाईलैंड में भारत का परचम

राष्ट्रीय स्तर पर चयन के बाद अभय को विदेश में खेलने का मौका मिला। थाईलैंड में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में सात देशों की टीमों ने प्रतिभाग किया। भारतीय टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक और ट्रॉफी अपने नाम की। अंतरराष्ट्रीय मंच पर मिली यह सफलता अभय के वर्षों के संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास का परिणाम रही।
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किसान पिता के बेटे ने पार की आर्थिक बाधाएं

अभय के पिता दिनेश पस्तोर किसान हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। ऐसे में खेल के लिए यात्रा, प्रशिक्षण और विदेश जाने का खर्च जुटाना परिवार के लिए बड़ी चुनौती रहा। विदेश जाने के लिए आर्थिक सहयोग की उम्मीद में कई जनप्रतिनिधियों से संपर्क किया गया। हालांकि, सांसद की ओर से यह कहते हुए मदद नहीं मिल सकी कि वॉलीबाल राष्ट्रीय खेलों में शामिल नहीं है। वहीं श्रम सेवा योजन राज्य मंत्री मनोहर लाल के पुत्र चंद्रशेखर ने व्यक्तिगत स्तर पर आगे बढ़कर कुछ आर्थिक सहयोग किया।

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सुविधाएं और मार्गदर्शन मिले तो और आगे बढ़ सकता है

गांव की प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती, लेकिन उसे आगे बढ़ने के लिए प्रशिक्षण, उचित मार्गदर्शन और आर्थिक सहयोग की जरूरत होती है। गांव से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे अभय जैसे खिलाड़ियों को यदि बेहतर सुविधाएं, नियमित कोचिंग और संस्थागत सहयोग मिले तो वे भविष्य में देश के लिए और बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं। अभय का सफर बुंदेलखंड के उन तमाम युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाने का सपना देखते हैं। गांव के मैदान से शुरू हुआ उनका सफर अब मैदान से मेडल तक पहुंच चुका है।
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