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फसलों को वक्त पर नहीं मिल रहा पानी, बढ़ रही किसानों की परेशानी
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खाली पड़ा खेत -संवाद
- फोटो : LALITPUR
ललितपुर। फसलों को समय से नहरों का पानी नहीं मिल रहा है। जिससे बुवाई प्रभावित हो रही है। जिले में नहरों के पानी का संचालन दस नवंबर के बाद किया जाता है। ऐसे में किसान परेशान हो रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार एक से 31 अक्तूबर से तक दलहनी फसलों की बुवाई का बेहतर समय होता है। जिले में 20 अक्तूबर से 15 नवंबर तक दलहनी फसलों की बुवाई होती है। जबकि नवंबर माह तक गेहूं व जवा (जौ) के फसलों की बुवाई की जाती है। क्षेत्र में दस नवंबर के बाद नहरों में पानी छोड़ा जाता है। जबकि दलहनी फसल चना, मटर और मसूर की बुवाई का काम पूरा हो गया है। वहीं जब तक नहरों का संचालन शुरू होगा, तब तक तिलहनी फसलों का भी समय भी समाप्त हो जाएगा। इसके चलते बड़ी संख्या में किसान मटर, चना व मसूर की फसल की बुवाई नहीं कर पाते हैं। इससे किसानों की आय नहीं बढ़ पा रही है।
फिसड्डी साबित हो रहे निर्देश
सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए फसलों का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है। जिसके लिए रबी उत्पादकता गोष्ठी हो रही हैं। वहीं अधिकारी भी क्षेत्रों में किसानों को फसलों पैदावार बढ़ाने के लिए जागरूक कर रहे हैं। लेकिन नहरों के पानी को लेकर जिम्मेदार मौन साधे हुए हैं।
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36 फीसदी हो सकी रबी फसलों की बुवाई
जिले में रबी की फसलों की सिंचाई के साधनों में लगभग 60 प्रतिशत क्षेत्रफल को नहरों से पानी दिया जाता है। ऐसे में नहरों को ही प्रमुख सिंचाई का साधन माना जाता है। लेकिन इनके समय पर संचालन न होने से किसान समय पर बुवाई नहीं कर पा रहे हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार महज 36 प्रतिशत ही अब तक बुवाई हो सकी है।
नहरों का संचालन समय पर नहीं होने से मटर व चना की बुवाई नहीं कर पाते हैं। गेंहू व जवा की बुवाई ही करनी पड़ती है। - कल्यान सिंह
एक से 31 अक्तूबर दलहनी फसलों की बुवाई होती है, लेकिन समय पर नहर का पानी नहीं मिल पाने से बुवाई प्रभावित हो रही है। - खिलान
नहरों का संचालन समय से हो तो फसल की पैदावार भी ठीक मिल पाएगी। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी। - जसवंत यादव
सर्दी के शुरू होने पर बुवाई ठीक रहती है। किसान बुवाई कार्य में तेजी से जुटे हुए हैं। शेष नहर के संचालन पर पूरी हो जाएगी। - राजीव कुमार भारती, जिला कृषि अधिकारी
अक्तूबर तक दलहनी फसलों की बुवाई होती है। वहीं नवंबर में गेहूं व जौ की फसल बोई जाती है। समय पर बुवाई से फसलों की पैदावार भी ठीक मिल जाती है। समय पर हुई बुवाई से फसलों को पाला से भी बचाया जा सकता है। - नितिन कुमार, कृषि वैज्ञानिक
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कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार एक से 31 अक्तूबर से तक दलहनी फसलों की बुवाई का बेहतर समय होता है। जिले में 20 अक्तूबर से 15 नवंबर तक दलहनी फसलों की बुवाई होती है। जबकि नवंबर माह तक गेहूं व जवा (जौ) के फसलों की बुवाई की जाती है। क्षेत्र में दस नवंबर के बाद नहरों में पानी छोड़ा जाता है। जबकि दलहनी फसल चना, मटर और मसूर की बुवाई का काम पूरा हो गया है। वहीं जब तक नहरों का संचालन शुरू होगा, तब तक तिलहनी फसलों का भी समय भी समाप्त हो जाएगा। इसके चलते बड़ी संख्या में किसान मटर, चना व मसूर की फसल की बुवाई नहीं कर पाते हैं। इससे किसानों की आय नहीं बढ़ पा रही है।
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फिसड्डी साबित हो रहे निर्देश
सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए फसलों का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है। जिसके लिए रबी उत्पादकता गोष्ठी हो रही हैं। वहीं अधिकारी भी क्षेत्रों में किसानों को फसलों पैदावार बढ़ाने के लिए जागरूक कर रहे हैं। लेकिन नहरों के पानी को लेकर जिम्मेदार मौन साधे हुए हैं।
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36 फीसदी हो सकी रबी फसलों की बुवाई
जिले में रबी की फसलों की सिंचाई के साधनों में लगभग 60 प्रतिशत क्षेत्रफल को नहरों से पानी दिया जाता है। ऐसे में नहरों को ही प्रमुख सिंचाई का साधन माना जाता है। लेकिन इनके समय पर संचालन न होने से किसान समय पर बुवाई नहीं कर पा रहे हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार महज 36 प्रतिशत ही अब तक बुवाई हो सकी है।
नहरों का संचालन समय पर नहीं होने से मटर व चना की बुवाई नहीं कर पाते हैं। गेंहू व जवा की बुवाई ही करनी पड़ती है। - कल्यान सिंह
एक से 31 अक्तूबर दलहनी फसलों की बुवाई होती है, लेकिन समय पर नहर का पानी नहीं मिल पाने से बुवाई प्रभावित हो रही है। - खिलान
नहरों का संचालन समय से हो तो फसल की पैदावार भी ठीक मिल पाएगी। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी। - जसवंत यादव
सर्दी के शुरू होने पर बुवाई ठीक रहती है। किसान बुवाई कार्य में तेजी से जुटे हुए हैं। शेष नहर के संचालन पर पूरी हो जाएगी। - राजीव कुमार भारती, जिला कृषि अधिकारी
अक्तूबर तक दलहनी फसलों की बुवाई होती है। वहीं नवंबर में गेहूं व जौ की फसल बोई जाती है। समय पर बुवाई से फसलों की पैदावार भी ठीक मिल जाती है। समय पर हुई बुवाई से फसलों को पाला से भी बचाया जा सकता है। - नितिन कुमार, कृषि वैज्ञानिक