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नौ माह में किया 227 शिशुओं में जन्म श्वांसरोध की समस्या को ठीक

Sun, 13 Jan 2019 02:11 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sun, 13 Jan 2019 02:11 AM IST
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नौ माह में किया 227 शिशुओं में जन्म श्वांसरोध की समस्या को ठीक
227 शिशुओं में जन्म श्वांसरोध को ठीक किया
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लापरवाही से नवजात में होती है बर्थ एसफिक्सिया की बीमारी
जन्म के बाद शिशु का सांस न लेना हैं बर्थ एसफिक्सिया के लक्षण
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। जनपद में पिछले वर्ष अप्रैल माह से दिसंबर 2018 तक बर्थ एसफिक्सिया या जन्म श्वांसरोधक से पीड़ित 227 नवजात शिशुओं को सिक न्यू बोर्न केयर यूनिट में भर्ती करके ठीक किया गया है। वहीं, स्वास्थ्य विभाग द्वारा वही आशाओं को भी गृह आधारित नवजात शिशु देखभाल माड्यूल प्रशिक्षण 6-7 के तहत प्रशिक्षित किया गया है। ताकि यदि किसी बच्चे के अंदर गंदा पानी चला जाता है तो आशाओं द्वारा वह म्यूकस एक्सट्रेक्टर के द्वारा गंदा पानी बाहर निकाल सके।

बर्थ एसफिक्सिया या जन्म श्वांसरोधक एक ऐसी दशा होती है, जिसमें नवजात पैदा होने के बाद न तो रोता है और न ही सांस लेता हैं। यह बच्चे के मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी के कारण होता हैं। आक्सीजन की कमी होना मुख्तय: बच्चे के मुंह में गंदा पानी चले जाने, कम वजन का होने, समय से पूर्व पैदा होने, या जन्मजात दोष होने की वजह से हो सकती है। इस दौरान यदि नवजात को तुरंत उचित देखभाल नहीं मिलती हैं तो उसकी जान जाने का भी खतरा हो सकता हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 20 प्रतिशत शिशुओं की मौत दम घुटने की वजह से होती है। यह स्थिति ज्यादातर जन्म के पहले एक घंटे के अंदर होती हैं। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट 2018 के अनुसार भारत में अधिकांश नवजात मृत्यु (75%) जीवन के पहले सप्ताह के दौरान होती है और पहले 24 घंटों के भीतर लगभग 10 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु हो जाती हैं। इन सबकी मृत्यु की मुख्य वजह प्रसव पूर्व जन्म, अंतर्गर्भाशयी संबंधी जटिलताओं (जन्म के समय श्वांसनली या जन्म के समय सांस लेने में कमी), संक्रमण और जन्म दोष आदि हैं। इसलिए पहले एक घंटे में नवजात शिशुओं की उचित देखभाल की सबसे अधिक जरूरत होती हैं, क्योंकि यह एक घंटा नवजात के लिए काफी मुश्किल भरा होता हैं, इस दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही होने पर शिशु की मृत्यु हो सकती है। एसफिक्सिया की वजह से मस्तिष्क को हमेशा के लिए क्षति हो सकती हैं और इसकी वजह से जीवन पर्यंत अपंगता भी हो सकती हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा मिले आंकड़ों के अनुसार जनपद में अप्रैल से लेकर दिसंबर माह 2018 तक लगभग 227 नवजात शिशुओं को जन्म श्वांसरोध की समस्या के तहत सिक न्यू बोर्न केयर में भर्ती करके ठीक किया गया। इस स्थिति से शिशुओं को बचाने के लिए एक ओर सिक न्यू बोर्न केयर यूनिट हैं वहीं आशाओं को भी गृह आधारित नवजात शिशु देखभाल माड्यूल प्रशिक्षण 6-7 के तहत प्रशिक्षित किया गया है। जैसे कि यदि किसी बच्चे के अंदर गंदा पानी चला गया हैं तो आशाओं को प्रशिक्षित किया गया हैं कि वह म्यूकस एक्सट्रेक्टर के द्वारा गंदा पानी बाहर निकाल सकती हैं जिससे नवजात की जान बच सकें। जिला महिला अस्पताल के सिक न्यू बोर्न केयर यूनिट के नोडल आफिसर डॉ. राजनारायन ने बताया कि शिशु जब जन्म लेता हैं तो उसके अंदर यह प्राकृतिक ताकत या गुण होता है कि वह खुद से सांस लेने लगता है। वहीं वह बच्चे जिनके अंदर इतनी ताकत न हो कि वह खुद से सांस ले सके बर्थ एसफिक्सिया या जन्म श्वांसरोधक का शिकार हो जाते हैं। यह स्थिति प्राय: समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में या जिस गर्भवती को प्रसव के समय जटिलताओं का सामना करना पड़ता हैं, उनमें होती हैं। इसके लिए जरुरी हैं कि माताएं गर्भ के समय सभी प्रसव पूर्ण जांचों को समय से कराएं और साथ ही संस्थागत प्रसव ही कराएं, जिससे कि प्रसव के समय किसी भी प्रकार की जटिलता न हो, और मां एवं बच्चे को किसी भी प्रकार की आकस्मिक घटना से बचाया जा सके।
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