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मतदाता जोश में रहा या उदासीन, बदल गई तस्वीर
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Neta Ji
- फोटो : iStock
जिले में 1985 के विधानसभा चुनाव में हुआ था सबसे कम 39.69 फीसदी मतदान
पिछले चुनाव में सबसे ज्यादा 68.47 फीसदी वोटिंग, इस बार 0.36 प्रतिशत कमी
लखीमपुर खीरी। अब तक के विधानसभा चुनावों में हुए मतदान पर नजर डालें तो वह नतीजों में बदलाव का आइना नजर आते हैं। आजादी के बाद से अब तक हुए जिले में हुए कुल 18 चुनावों में सर्वाधिक 68.47 फीसदी मतदान 2017 में हुआ था, लेकिन इस बार इसमें 0.36 प्रतिशत की मामूली कमी आई है। सबसे कम 39.69 फीसदी मतदान 1985 के विधानसभा चुनाव में हुआ था। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी मतदाताओं ने वोटिंग में जोश तो दिखाया, लेकिन 2017 के चुनाव का रिकार्ड से 0.36 प्रतिशत से पीछे ही रह गया। लगभग बराबर हुए मतदान से राजनीतिक भी उलझ गए हैं। मतगणना के बाद नतीजे बदले आएंगे या नहीं, इस बार भविष्यवाणी करना उनके लिए मुश्किल हो रहा है।
अब तक हुए 18 विधानसभा चुनावों में केवल पांच बार 60 फीसदी से अधिक मतदान हुआ है। आजादी के बाद हुए दूसरे विधानसभा चुनाव 1957 में वोटों की अच्छी बरसात हुई थी। उत्साहित मतदाताओं ने 63.52 फीसदी मतदान कर रिकार्ड बनाया था। इसके बाद 1996 में 62.40 फीसदी, 2012 में 64.60, 2017 में 68.47 और 2022 में 68.11 फीसदी मतदान हुआ। केवल तीन चुनाव ऐसे हैं, जिनमें 50 से 60 फीसदी के बीच मतदान हुआ है। 1974 के विधानसभा चुनाव में 50.54 प्रतिशत, 1993 में 54.98 और 2002 के चुनाव में 58.66 फीसदी मतदान हुआ।
इनके अलावा नौ विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत 50 फीसदी से भी कम रहा है। 1952 में हुए पहले चुनाव में 49.83 फीसदी वोट पड़े थे। 1962 के चुनाव मतदान प्रतिशत घटकर 44.60 फीसदी रह गया। 1967 के चुनाव मतदान प्रतिशत बढ़कर 49.34 फीसदी पर जा पहुंचा। 1969 में मतदान घटकर 43.19 फीसदी रह गया। 1977 में 45.86 प्रतिशत मतदान हुआ।
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1977 के चुनाव में 45.86, 1980 में 41.73 फीसदी मतदान हुआ। 1985 में मतदाताओं ने चुनाव में पूरी उदासीनता दिखाई और इस बार मतदान घटकर 40 फीसदी से भी नीचे चला गया। 1985 में मतदान प्रतिशत घटकर केवल 39.69 रह गया। 1989 में 46.92, 1991 में 48.77 फीसदी और 2002 केवल 47.61 फीसदी मतदान हुआ। गौरतलब यह भी है कि ग्रामीण मतदाताओं की अपेक्षा शहरी वोटरों ने हमेशा ही सुस्ती दिखाई है।
मतदान के उतार-चढ़ाव का दिखा परिणाम पर असर
आजादी के बाद 1957 में दूसरे चुनाव में 63.52 फीसदी मतदान हुआ था। यह मतदान 1957 के चुनाव से करीब 14 फीसदी ज्यादा था। इस चुनाव में कांग्रेस सभी सीटों पर चुनाव हार गई थी। उनकी जगह प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीते थे। 1962 के चुनाव में मतदान प्रतिशत घटकर 44.60 रह गया। बदलाव इस बार भी आया और सभी सातों सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव जीत गए। 1977 में मतदान प्रतिशत घटकर 45.86 फीसदी रह गया तो जिले की सभी सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार हारे और जनता पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीते। 1980 के चुनाव में मतदाता फिर उदासीन हुआ और मतदान प्रतिशत घटकर 41.73 रह गया। इस बार फिर बदलाव दिखा। जनता पार्टी के सभी उम्मीदवारों को हराकर कांग्रेस काबिज हुई। 1985 के चुनाव में मतदान प्रतिशत सबसे कम 39.69 फीसदी रहा। इस चुनाव में सात में से छह सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत हुई। 1996 के चुनाव मतदान में उछाल आया और मतदान प्रतिशत बढ़कर 62.40 हो गया। तब जिले की सात सीटों में से तीन पर सपा, दो पर भाजपा, एक पर लोकतांत्रिक कांग्रेस उम्मीदवार जीते। 1991 के बाद जिले में कांग्रेस के पैर पूरी तरह उखड़ गए।
2017 के चुनाव में भी मतदान फीसदी बढ़ने का दिखा था असर
वर्ष 2017 के चुनाव में अब तक सबसे ज्यादा 68.47 फीसदी मतदान हुआ। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने जिले की आठों विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। इससे पहले 2012 के चुनाव में 64.60 फीसदी मतदान हुआ था। इस चुनाव में जिले की आठ सीटों में से चार पर सपा, तीन पर बसपा और एक सीट पर भाजपा चुनाव जीती थी। 2022 के चुनाव में भी तकरीबन 2017 के बराबर ही मतदान हुआ है। इस मतदान का चुनाव परिणाम पर क्या असर पड़ेगा। इसको लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक अपने-अपने अपने ढंग से चुनावी विश्लेषण में माथापच्ची कर रहे हैं, लेकिन अंतिम परिणाम 10 मार्च को ही पता चल सकेंगे।
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पिछले चुनाव में सबसे ज्यादा 68.47 फीसदी वोटिंग, इस बार 0.36 प्रतिशत कमी
लखीमपुर खीरी। अब तक के विधानसभा चुनावों में हुए मतदान पर नजर डालें तो वह नतीजों में बदलाव का आइना नजर आते हैं। आजादी के बाद से अब तक हुए जिले में हुए कुल 18 चुनावों में सर्वाधिक 68.47 फीसदी मतदान 2017 में हुआ था, लेकिन इस बार इसमें 0.36 प्रतिशत की मामूली कमी आई है। सबसे कम 39.69 फीसदी मतदान 1985 के विधानसभा चुनाव में हुआ था। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी मतदाताओं ने वोटिंग में जोश तो दिखाया, लेकिन 2017 के चुनाव का रिकार्ड से 0.36 प्रतिशत से पीछे ही रह गया। लगभग बराबर हुए मतदान से राजनीतिक भी उलझ गए हैं। मतगणना के बाद नतीजे बदले आएंगे या नहीं, इस बार भविष्यवाणी करना उनके लिए मुश्किल हो रहा है।
अब तक हुए 18 विधानसभा चुनावों में केवल पांच बार 60 फीसदी से अधिक मतदान हुआ है। आजादी के बाद हुए दूसरे विधानसभा चुनाव 1957 में वोटों की अच्छी बरसात हुई थी। उत्साहित मतदाताओं ने 63.52 फीसदी मतदान कर रिकार्ड बनाया था। इसके बाद 1996 में 62.40 फीसदी, 2012 में 64.60, 2017 में 68.47 और 2022 में 68.11 फीसदी मतदान हुआ। केवल तीन चुनाव ऐसे हैं, जिनमें 50 से 60 फीसदी के बीच मतदान हुआ है। 1974 के विधानसभा चुनाव में 50.54 प्रतिशत, 1993 में 54.98 और 2002 के चुनाव में 58.66 फीसदी मतदान हुआ।
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इनके अलावा नौ विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत 50 फीसदी से भी कम रहा है। 1952 में हुए पहले चुनाव में 49.83 फीसदी वोट पड़े थे। 1962 के चुनाव मतदान प्रतिशत घटकर 44.60 फीसदी रह गया। 1967 के चुनाव मतदान प्रतिशत बढ़कर 49.34 फीसदी पर जा पहुंचा। 1969 में मतदान घटकर 43.19 फीसदी रह गया। 1977 में 45.86 प्रतिशत मतदान हुआ।
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1977 के चुनाव में 45.86, 1980 में 41.73 फीसदी मतदान हुआ। 1985 में मतदाताओं ने चुनाव में पूरी उदासीनता दिखाई और इस बार मतदान घटकर 40 फीसदी से भी नीचे चला गया। 1985 में मतदान प्रतिशत घटकर केवल 39.69 रह गया। 1989 में 46.92, 1991 में 48.77 फीसदी और 2002 केवल 47.61 फीसदी मतदान हुआ। गौरतलब यह भी है कि ग्रामीण मतदाताओं की अपेक्षा शहरी वोटरों ने हमेशा ही सुस्ती दिखाई है।
मतदान के उतार-चढ़ाव का दिखा परिणाम पर असर
आजादी के बाद 1957 में दूसरे चुनाव में 63.52 फीसदी मतदान हुआ था। यह मतदान 1957 के चुनाव से करीब 14 फीसदी ज्यादा था। इस चुनाव में कांग्रेस सभी सीटों पर चुनाव हार गई थी। उनकी जगह प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीते थे। 1962 के चुनाव में मतदान प्रतिशत घटकर 44.60 रह गया। बदलाव इस बार भी आया और सभी सातों सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव जीत गए। 1977 में मतदान प्रतिशत घटकर 45.86 फीसदी रह गया तो जिले की सभी सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार हारे और जनता पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीते। 1980 के चुनाव में मतदाता फिर उदासीन हुआ और मतदान प्रतिशत घटकर 41.73 रह गया। इस बार फिर बदलाव दिखा। जनता पार्टी के सभी उम्मीदवारों को हराकर कांग्रेस काबिज हुई। 1985 के चुनाव में मतदान प्रतिशत सबसे कम 39.69 फीसदी रहा। इस चुनाव में सात में से छह सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत हुई। 1996 के चुनाव मतदान में उछाल आया और मतदान प्रतिशत बढ़कर 62.40 हो गया। तब जिले की सात सीटों में से तीन पर सपा, दो पर भाजपा, एक पर लोकतांत्रिक कांग्रेस उम्मीदवार जीते। 1991 के बाद जिले में कांग्रेस के पैर पूरी तरह उखड़ गए।
2017 के चुनाव में भी मतदान फीसदी बढ़ने का दिखा था असर
वर्ष 2017 के चुनाव में अब तक सबसे ज्यादा 68.47 फीसदी मतदान हुआ। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने जिले की आठों विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। इससे पहले 2012 के चुनाव में 64.60 फीसदी मतदान हुआ था। इस चुनाव में जिले की आठ सीटों में से चार पर सपा, तीन पर बसपा और एक सीट पर भाजपा चुनाव जीती थी। 2022 के चुनाव में भी तकरीबन 2017 के बराबर ही मतदान हुआ है। इस मतदान का चुनाव परिणाम पर क्या असर पड़ेगा। इसको लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक अपने-अपने अपने ढंग से चुनावी विश्लेषण में माथापच्ची कर रहे हैं, लेकिन अंतिम परिणाम 10 मार्च को ही पता चल सकेंगे।