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बाघों ने किसी की गोद उजाड़ी तो किसी की मांग       

Sun, 14 May 2017 11:21 PM IST
अनिल मिश्र       बांकेगंज।
अनिल मिश्र       बांकेगंज। Updated Sun, 14 May 2017 11:21 PM IST
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Tigers lap someone's lap so someone's demand
बाघ - फोटो : अमर उजाला
बच्चों के सिर से उठा पिता का साया, कितनों के ही बिछड़ गए सपने      
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 बाघ के हमलों से दर्जनों परिवार उजड़ चुके हैं। कई माताओं की गोद सूनी हुई तो कई महिलाओं ने अपना सुहाग खोया है। बच्चों के सिर से पिता की छाया छिनीं, तो कई माता-पिता के आंखों के तारे बाघों का निवाला बने। जंगल के किनारे बसना इन ग्रामीणों के लिए अभिशाप बन गया है।      
बांकेगंज कस्बे से सटे गांव ढाका निवासी मां गायत्री और पिता राजकिशोर की लाडली बेटी किरन 15 अप्रैल 2016 को गेहूं की फसल काटने गई थी, जहां बाघ ने उसे निवाला बना लिया। घटना के तेरह माह बीत गए हैं, लेकिन गायत्री आज भी इस घटना को भुला नहीं पा रही है। इसी कड़ी में दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मैलानी रेंज के गांव कपरहा कुंआ निवासी मां सुमारी देवी और पिता हिंछलाल की 15 वर्षीय किशोरी सरस्वती भी जंगल से सटे खेत में काम करने गई थी, सरस्वती को भी बाघ ने अपना निवाला बना लिया। यह घटना 15 अगस्त 2016 को हुई। जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब हिंछपाल और सुमारी देवी के घर में गम का पहाड़ टूटा था। उसकी मां इस हादसे को अभी तक नहीं भुला पाई है। इससे पहले इसी रेंज में 16 फरवरी 2016 को कस्बे से सटी कुकरा-भीरा रोड से गुजर रहे कुकरा निवासी रईश अहमद,16 मार्च 2016, को खेत की रखवाली कर रहे सोहनरा भूड़ के तरसेम सिंह, 07 जुलाई खरेहटा निवासी भोगन, 19 अगस्त छेदीपुर के टीकाराम, 20 अगस्त बाबूराम और 30 अगस्त को भरिगवां निवासी जानकी प्रसाद पर जंगल से निकले बाघ ने हमला कर मार डाला था। बाघ के हमलों में हुई मौतों के बाद मृतकों की पत्नियों क्रमश: सलीमा बेगम, सुखविंदर कौर, उर्मिला देवी, जया देवी की गृहस्थी उजड़ने के साथ ही उनकी मांग उजड़ गई। परिवारीजनों के चेहरे पर बाघ हमलों का खौफ आज भी झलक रहा है। वन विभाग बाघ हमलों में हुई मौतों के बाद मृतक आश्रितों के परिवारों को मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। वन विभाग और जनप्रतिनिधि जंगल से सटे गांवों में बाघ के हमलों में घायल होने वाले और जान गंवाने वाले ग्रामीणों की न परवाह कर रहे हैं और न ही बाघ हमलों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाए गए। इससे उनका जीवन नरक बन गया है।          
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मांसाहारी और शाकाहारी वन्यजीवों के लिए जंगल के अंदर पानी और भोजन की कोई कमी नहीं है। अमूमन बाघ-बाघिन रास्ता भटकर जंगल से सटे इलाकों में पहुंच जाते हैं। वनकर्मियों जिनकी लगातार निगरानी कर रहे हैं। बाघ हमलों से बचाव के लिए वन विभाग और डब्लूडब्लूएफ अभियान चलाकर ग्रामीणों को जागरूक कर रहे हैं। इंसानों पर बाघ हमलों को  रोकने के लिए विभाग गंभीर है।
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अखिलेश पांडे, डीएफओ साउथ खीरी। 
 
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