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स्वाधीनता आंदोलन में राजनरायन मिश्र ने दी थी अंतिम आहुति

Sat, 14 Aug 2021 12:25 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 14 Aug 2021 12:25 AM IST
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Rajnarayan Mishra had given the last sacrifice in the freedom movement
नौ दिसंबर 1944 को 24 साल की उम्र में लखनऊ जेल में दी गई थी उन्हें फांसी
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फरारी के दौरान भी अपना नाम-पता बदलकर लेते रहे स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा
लखीमपुर खीरी। देश के स्वाधीनता आंदोलन के महायज्ञ में अंतिम आहुति देने का गौरव भी लखीमपुर खीरी जिले के खाते में है। नौ दिसंबर 1944 को जिले के भीखमपुर गांव के नौजवान राजनरायन मिश्र को दी गई फांसी स्वाधीनता आंदोलन में अंतिम फांसी थी। इसके बाद किसी स्वतंत्रता सेनानी को फांसी नहीं दी गई।
वर्ष 1942 में स्वाधीनता आंदोलन अपने चरम पर था। इसी दौरान भीखमपुर गांव का उत्साही नौजवान राजनरायन मिश्र स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़ा। सशस्त्र क्रांति के पक्षधर राजनरायन मिश्र ने क्रांति के लिए शस्त्र जुटाने शुरू कर दिए। इसी क्रम में वह महमूदाबाद के कोठार में जिलेदार से उसकी बंदूक मांगने पहुंच गए। जिलेदार ने न केवल बंदूक देने से इनकार कर दिया, बल्कि राजनरायन मिश्र पर बंदूक तान दी। यह देख राजनरायन ने उसकी बंदूक छीन ली और उसी से जिलेदार को गोली मार दी। जिलेदार मौके पर ही ढेर हो गया। राजनरायन बंदूक लेकर फरार हो गए। घटना के बाद अंग्रेजों ने भीखमपुर गांव में खूब जुल्म ढाए।
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राजनरायन मिश्र इस घटना के बाद से फरार होकर इधर-उधर भटकते रहे। अदालत से फरार घोषित किए जाने और जीवित अथवा मृत अवस्था में पकड़े जाने पर 500 रुपया के पुरस्कार की घोषणा के बाद राजनरायन ने जिला छोड़ दिया। वे देश के विभिन्न हिस्सों में घूमते हुए क्रांति का सृजन करते रहे।
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मध्य प्रदेश में ब्रिटिश सरकार विरोधी कार्यों के कारण उन्हें दो महीने नजरबंद रहना पड़ा। इस दौरान उन्होंने अपना नाम-पता बदल लिया था। जब गांधी जी ने आगा खां महल की कैद में 21 दिन का ऐतिहासिक अनशन किया, तब भी राजनरायन को हड़ताल कराने के दंड में मुंबई में छह महीने की सजा मिली, जिसे उन्होंने नाम-पता बदलकर भुगता। अक्टूबर 1943 में जेल से छूटने के बाद फिर उत्तर प्रदेश लौट आए। हरिद्वार, ऋषिकेश, काशी आदि स्थानों पर घूमते हुए मेरठ पहुंचे, जहां उन्हें पहचान कर गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर हत्या का मुकदमा चला। 27 जून 1944 को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। अंत में उन्हें लखनऊ जिला जेल ले जाया गया।
नौ दिसंबर 1944 की सुबह लखनऊ जिला जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उस समय राजनरायन की उम्र सिर्फ 24 साल थी। फांसी के फंदे पर खड़े होकर उन्होंने वंदेमातरम गीत गाया और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए।
शहादत के जोश में और बढ़ गया राजनरायन का वजन
शहीद राजनरायन की जीवटता और देश के लिए बलिदान देने की यह ललक का ही यह प्रमाण है कि फांसी की सजा सुनाए जाने के दिन यानी 27 जून 1944 से फांसी पर लटकाए जाने के दिन यानी नौ दिसंबर 1944 तक शहादत के जोश और खुशी में राजनरायन मिश्र का वजन छह पौंड बढ़ गया था।

पांच साल पहले लोकसभा में सांसद ने उठाया था मुद्दा
देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीद राजनरायन मिश्र को आजादी के बाद भी वह सम्मान नहीं मिल पाया, जिसके वे हकदार थे। क्षेत्रीय सांसद मौजूदा समय में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्र टेनी ने दस अगस्त 2016 को लोकसभा में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए मांग की थी कि नेशनल हाईवे 730ए का नामकरण शहीद राजनरायन मिश्र के नाम पर किया जाए। यह हाईवे राजनरायन मिश्र के गांव से होकर गुजरता है। साथ ही उनके नाम से एक स्मारक द्वार भी बनाया जाए। इस मांग को उठाए पांच साल बीत गए हैं, लेकिन इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है।
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