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दुधवा टाइगर रिजर्व को चाहिए स्थायी पशु चिकित्सक
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बांकेगंज। दुधवा टाइगर रिजर्व के वन्यजीवों की देखरेख का जिम्मा संविदा पर तैनात सिर्फ दो पशु चिकित्सा अधिकारियों के कंधे पर है। स्थापना का करीब आधा दशक पूरा कर रहे डीटीआर को अभी तक एक स्थायी पशु चिकित्सक तक नहीं मिला। जबकि गैंडा पुनर्वासन जैसी विलक्षण योजना दुधवा में संचालित है।
कभी आपसी संघर्ष में तो कभी प्रबल हिंसक जानवरों के हमले में घायल होने वाले वन्यजीवों के इलाज का कोई इंतजाम न होने से दुर्लभ वन्यजीवों को असमय ही जान गंवानी पड़ रही है। दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना वर्ष 1977 में हुई थी। वर्ष 1988 में इसे दुधवा टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया। दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के साथ ही यहां स्थायी पशु चिकित्सक की कमी अनुभव की जाने लगी थी।
यदा-कदा इसकी मांग भी की जाने लगी थी, लेकिन जरूरत 2018 में पूरी हुई। इतने बड़े क्षेत्रफल के लिए सिर्फ दो पशु चिकित्सा अधिकारियों की नियुक्ति संविदा के आधार पर की गई। डीटीआर में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज वन और टू में करीब 40 गैंडे हैं। दुधवा नेशनल पार्क में करीब 26 पालतू हाथी हैं।
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इसके अलावा बाघ, तेंदुए और हिरन जैसे दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीव हैं। कभी दूसरे जानवरों के हमले में, कभी आपसी संघर्ष में तो कभी शिकारियों के फंदे में फंसने से दुर्लभ वन्यजीव घायल होते हैं। इनके इलाज के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। इतने बड़े वन क्षेत्र में एक-दो घायल या बीमार जंगली जानवर का पता लगाना ही मुश्किल होता है।
यदि पता लग भी जाए तो उसे बेहोशकर इलाज करना एक दो पशु चिकित्सकों के बस की बात नहीं है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि डीटीआर की सभी रेंज में कम से कम एक पशु चिकित्सक की नियुक्ति होनी चाहिए। ताकि घायल या बीमार वन्यजीवों को समय से इलाज मिल सके।
शासन की ओर से डीटीआर में संविदा के आधार पर दो पशु चिकित्सा अधिकारियों की तैनाती की गई है। इन्हीं के जरिए जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सेवाएं ली जा रही हैं। पोस्टमार्टम के लिए स्थानीय पशु चिकित्सकों की मदद ली जाती है।
- संजय पाठक, मुख्य वन संरक्षक/फील्ड निदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व
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कभी आपसी संघर्ष में तो कभी प्रबल हिंसक जानवरों के हमले में घायल होने वाले वन्यजीवों के इलाज का कोई इंतजाम न होने से दुर्लभ वन्यजीवों को असमय ही जान गंवानी पड़ रही है। दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना वर्ष 1977 में हुई थी। वर्ष 1988 में इसे दुधवा टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया। दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के साथ ही यहां स्थायी पशु चिकित्सक की कमी अनुभव की जाने लगी थी।
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यदा-कदा इसकी मांग भी की जाने लगी थी, लेकिन जरूरत 2018 में पूरी हुई। इतने बड़े क्षेत्रफल के लिए सिर्फ दो पशु चिकित्सा अधिकारियों की नियुक्ति संविदा के आधार पर की गई। डीटीआर में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज वन और टू में करीब 40 गैंडे हैं। दुधवा नेशनल पार्क में करीब 26 पालतू हाथी हैं।
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इसके अलावा बाघ, तेंदुए और हिरन जैसे दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीव हैं। कभी दूसरे जानवरों के हमले में, कभी आपसी संघर्ष में तो कभी शिकारियों के फंदे में फंसने से दुर्लभ वन्यजीव घायल होते हैं। इनके इलाज के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। इतने बड़े वन क्षेत्र में एक-दो घायल या बीमार जंगली जानवर का पता लगाना ही मुश्किल होता है।
यदि पता लग भी जाए तो उसे बेहोशकर इलाज करना एक दो पशु चिकित्सकों के बस की बात नहीं है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि डीटीआर की सभी रेंज में कम से कम एक पशु चिकित्सक की नियुक्ति होनी चाहिए। ताकि घायल या बीमार वन्यजीवों को समय से इलाज मिल सके।
शासन की ओर से डीटीआर में संविदा के आधार पर दो पशु चिकित्सा अधिकारियों की तैनाती की गई है। इन्हीं के जरिए जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सेवाएं ली जा रही हैं। पोस्टमार्टम के लिए स्थानीय पशु चिकित्सकों की मदद ली जाती है।
- संजय पाठक, मुख्य वन संरक्षक/फील्ड निदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व