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पहले कुदरत, अब प्रशासन की मार

Wed, 15 Apr 2015 07:57 PM IST
पलियाकलां।
पलियाकलां। Updated Wed, 15 Apr 2015 07:57 PM IST
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The nature , now hitting Administration
इलाके के किसान बर्बादी को लेकर परेशान हैं। कभी बारिश तो कभी ओलों ने उनकी फसलों को तबाह कर डाला। एक आखिरी उम्मीद प्रशासन से थी सो वह भी टूट गई जब प्रशासन की सर्वे रिपोर्ट उनके सामने आई। सब हैरान और परेशान हैं कि जिन इलाकों में सर्वे किया गया था वहां नुकसान न के बराबर दिखाया गया। किसानाें का हैरान होना लाजिमी भी था क्योंकि यहां कुदरत की मार से जो तबाही हुई वह देखते नहीं बनती है। फसलें जमीन पर बिछ गईं हैं और जिन खेतों में खड़ी रह भी गईं उनकी बालियों में दाना न के बराबर ही रह गया है। गन्ना भुगतान न होने से किसान पहले ही कर्जों की मार से टूट गए थे अब फसल भी गई और मुआवजा भी नहीं। ऐसे में किसानों की हालत पतली हो गई है। अब किसानों के पास परिवारों का पेट पालने को ढेला भी नहीं रह गया है।
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बची ही कहां गेहूं की फसल
पलिया तहसील के त्रिकौलिया क्षेत्र के किसान इंद्रजीत सिंह बघौवा कहते हैं कि गेहूं की फसल बची ही कहां है। खेत में फसल दिखाई दे रही है लेकिन दाने गायब हो चुके हैं और प्रति एकड़ महज चार से पांच क्विंटल गेहूं हुआ है। जिससे लागत निकलना भी मुश्किल है।
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खेत में ही खराब हो गई फसल
ढाका क्षेत्र के किसान गोपी कहते हैं कि खेत में गेहूं की फसल कट कर पड़ी थी बारिश और ओले पड़ने से वह भी खराब हो गई। पहले गन्ने का भुगतान नहीं मिला अब गेहूं से जो उम्मीदें थीं वह भी टूट गईं हैं।
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कैसे भरें बच्चों की फीस और कैसे चलाएं घर
ऐंठपुर निवासी किसान कुलदीप सिंह कहते हैं कि करीब ढाई एकड़ गेहूं की फसल बर्बाद हो गई। पहले गन्ना भुगतान नहीं हुआ तो कर्ज लेकर घर चलाया और गेहूं बोया। सोचा था कि इससे कर्ज उतार देंगे और घर चल जाएगा, लेकिन अब कुछ भी नहीं बचा है बच्चों की फीस जमा नहीं हो सकी है और घर के खर्च चलाने को धेला नहीं है।


नमी प्रतिशत 20 किया जाए
किसान मजदूर संगठन के विधानसभा अध्यक्ष और किसान मनप्रीत सिंह कहते हैं कि खड़ी फसलों में दाना न के बराबर रह गया है और इल्ड बुरी तरह प्रभावित हुई है, लेकिन जो बची-खुची गेहूं की फसल है उसकी भी दुर्दशा हो रही है। बारिश के कारण नमी है और एजेंसियां उसे खरीदने को राजी नहीं हैं। नमी का प्रतिशत बढ़ाकर 20 किया जाना चाहिए।
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