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लोक अदालतें विश्वास की अदालतें है
Kushinagar
Updated Mon, 23 Dec 2013 05:43 AM IST
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पडरौना। रविवार को नगर के हनुमान इंटर कॉलेज के प्रांगण में आयोजित मेगा लोक अदालत में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एपी शाही ने कहा कि लोक अदालतें विश्वास की अदालतें हैं, जहां द्विपक्षीय जीत होती है। यहां से कोई हार कर घर नहीं जाता है। इसे स्वयं की अदालत बताते हुए उन्होंने कहा कि यहां वादी को अपने विवादों के निस्तारण का अधिकार दिया जाता है।
न्यायमूर्ति लीगल एड क्लीनिक का उद्घाटन करने से पूर्व लोगों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि न्यायालय और चिकित्सालय लोग मजबूरी में जाते हैं। लोगों के विवादों को रखने के लिए उचित प्लेटफार्म मिले, इस लिए ऐसे विधिक चिकित्सालय की व्यवस्था की गई है। उन्हाेंने कहा कि 1980 से लोक अदालतों का आगाज हुआ। अब ये अदालतें व्यवस्था का एक अंग बनती जा रही हैं। इसके बाद विधिक सेवा प्राधिकरण का गठन किया गया। इस सेवा प्राधिकरण में अधिकारों का ज्ञान कराया जाता है और समझौते के आधार पर मामलों का निस्तारण किया जाता है। अधिकारों का ज्ञान होने पर व्यक्ति विवादों के निस्तारण का अधिकारी हो जाता है। कई विचारकों, लेखकों, और समाज सुधारकों ने दिशा दी है कि हम स्वयं के साथ न्याय करें और दूसरों को भी न्याय की राह दिखाएं। न्यायपालिका में जिम्मेदारी के आधार पर दंड की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि लीगल एड क्लीनिक में समझाने की प्रक्रिया में कानूनी हस्तक्षेप नहीं किया जाए, बल्कि मामलों को हल कराने के लिए मनोवैज्ञानिक तरीके अपनाएं जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि आज की न्यायपालिका राजत्व पद्धति की नहीं, बल्कि लोक पद्धति की है। गांव के साधारण व्यक्ति की पीड़ा को एक प्लेटफार्म मिले, उनकी भी बात सक्षम अधिकारी तक पहुंचाकर उन्हें न्याय दिलाने की व्यवस्था दिलाने के लिए विधिक सेवा प्राधिकरण का गठन किया गया, जहां नि:शुल्क सहायता दी जाती है। विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव राघवेंद्र कुमार ने आंकड़ेवार ने बताया कि लोक अदालतों के माध्यम से उत्तर प्रदेश में साढ़े नौ लाख वादों का निस्तारण किया गया है। इन वादों के निस्तारण से बैंकों को 200 करोड़ की वसूली हुई है तो वहीं राजस्व के रूप में तीन करोड़ का अर्थ दंड भी वसूला गया है। इनके साथ-साथ क्षतिपूर्ति के रूप में 90 करोड़ रुपये भी वादियों को दिलाए गए हैं। उन्होंने कहा कि न्यायालय के लिए विलंब से न्याय देना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। उन्होंने बताया कि 23 नवंबर को राष्ट्रीय लोक अदालतों का आयोजन किया गया था। यह एक शतत प्रक्रिया है, जो चलती रहेगी। अब तो यह व्यवस्था का एक अंग बन चुकी है। उन्होंने न्यायमूर्ति एपी शाही को न्यायपालिका का गौरव बताते हुए कहा कि इनके निर्णय अन्य के लिए प्रेरणस्रोत बनते हैं। उन्होंने कहा कि संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को न्याय दिलाने की व्यवस्था दी गई है। इसी लिए 1987 में विधिक सेवा अधिनियम बनाकर राष्ट्र, प्रदेश और जिले स्तर पर विधिक सहायता बोर्ड का गठन किया गया। डीएम रिग्जियान सैंफिल ने कहा कि देश के पिछड़े जिलों में से एक इस जिले में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की संख्या वर्ष 2002 के आंकड़े के अनुसार तो 2 लाख 80 हजार है, लेकिन वास्तविकता इससे कुछ हट कर है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानक के हिसाब से इस जिले में 90 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं। उन्होंने सरकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने और जनता को सुलभ तथा समय से न्याय दिलाने के लिए तहसील दिवस, थाना दिवस के साथ-साथ बारह बजे तक दफ्तरों में बैठकर उनकी समस्याओं का निराकरण करने की बात भी कही। एसपी ललित कुमार सिंह ने कहा कि सात साल से कम सजा वाले केस में आरोपी की गिरफ्तारी नहीं किए जाने से वादी संतुष्ट नहीं होता है। इसके लिए कोई प्रावधान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामाजिक एकता से राष्ट्र की एकता मजबूत होती है। इसके लिए ग्राम स्तर पर न्यायालयों की व्यवस्था की प्रक्रिया को गति दिलाए जाने की आवश्यकता है। इसके पूर्व जिला जज एके उपाध्याय ने कहा कि जिला एवं सत्र न्यायालय में जजों की कमी के बारे में मांग करने के पूर्व ही न्यायालयों में खाली पदों को भर दिया गया। इसके बाद भी उन्होंने कहा कि जिला एवं सत्र न्यायालय में और न्यायधीशोें की तैनाती की आवश्यकता है। उन्होंने न्यायालय में एक माली का पद सृजित करने की बात भी कही। विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव और सीजेएम सुरेंद्रनाथ ने कहा कि लोक अदालताें के माध्यम से ही अदालतों से मुकदमों का बोझ कम किया जा सकता है। इसके पूर्व बार एसासिएशन के अध्यक्ष महंत गोपाल जी दास ने कहा कि जिला एंव सत्र न्यायालय में मात्र एक तहसील के वादों की सुनवाई होती है, जबकि बाह्य न्यायालय में तीन तहसीलों के वाद सुने जाते हैं। उन्होंने मांग की कि सत्र न्यायालय में कम से कम तीन तहसीलों के वादों की सुनवाई की व्यवस्था सुनिश्चित कराई जाए। इस मौके पर अधिवक्ता आरके शाही ने लोक अदालतों में फौजदारी के विवादों के निपटारा कराए जाने पर जोर देते कहा कि इस तरह से 35 फीसदी फौजदारी के वाद समाप्त किए जा सकते हैं। अधिवक्ता हरिशंकर दीक्षित, मिथिलेश दीक्षित आदि अधिवक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। इसके बाद विद्यालय के प्रधानाचार्य शैलेंद्र दत्त शुक्ल ने सभी आगंतुकों का स्वागत करते हुए स्मृतिचिह्न और अंग वस्त्र प्रदान किया। जबकि मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति एपी शाही को जनपद न्यायाधीश ने स्मृतिचिह्न और अंगवस्त्र प्रदान किया। इसके बाद विद्यालय परिसर के एक कमरे में विधिक सहायता क्लीनिक का पूजन भी न्यायमूर्ति एपी शाही ने किया। इस अवसर पर अशोक कुमार श्रीवास्तव, मुकेश श्रीवास्तव, अनिरुद्ध शुक्ल, शिवकुमार शुक्ल, रीयल पैराडाइज विद्यालय की प्रधानाचार्य डॉ. सुनीता पंाडेय, नीलेन पांडेय, दीपनारायण अग्रवाल, सुधीर शाही सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता और लोग मौजूद रहे।
बजट के कारण अटकी ग्रामीण न्यायालयों की योजना : न्यायमूर्ति
पडरौना। रविवार को कार्यक्रम के दौरान न्यायमूर्ति एपी शाही ने कहा कि ग्राम न्यायालयों की स्थापना में सरकार का बजट आड़े आ रहा है। यदि सरकार इस योजना के लिए वजट का प्रावधान करे तो इन न्यायालयों की शुरुआत हो सकती है।
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इनसे पूर्व ग्रामीण न्यायालयों की जरूरत पर बल देते हुए एसपी ललित कुमार सिंह ने कहा था कि न्यायपालिका को ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना में तेजी दिखानी चाहिए, जिससे जनता को सस्ता और सुलभ न्याय मिल सके। उन्होंने कहा कि इन न्यायालयों के गठन से जिला न्यायालयों में मुकदमों का बोझ नहीं बढ़ेगा और जनता को भी तारीख पर तारीख से निजात मिलेगी। इसके बाद अपने संबोधन में न्यायमूर्ति एपी शाही ने इस पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना करने की योजना पहले से ही है, लेकिन इन न्यायालयों की स्थापना के लिए बजट राज्य सरकार से मिलना था, जो मिल नहीं पा रहा है। इस कारण ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना को जमीनी रूप नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि इन न्यायालयों का गठन हो जाने के बाद जिला एंव सत्र न्यायालयों से मुकदमाें का बोझ कम हो जाता। इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों केेेेेे छोट-छोटे मामलों को उसी स्तर पर निपटाने से आम जनता को भी सहूलिय होती। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका का विकल्प नहीं, बल्कि समाधान है। इसको मूर्त रूप देने के लिए धन राज्य सरकार से ही आवंटित होना है।
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न्यायमूर्ति लीगल एड क्लीनिक का उद्घाटन करने से पूर्व लोगों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि न्यायालय और चिकित्सालय लोग मजबूरी में जाते हैं। लोगों के विवादों को रखने के लिए उचित प्लेटफार्म मिले, इस लिए ऐसे विधिक चिकित्सालय की व्यवस्था की गई है। उन्हाेंने कहा कि 1980 से लोक अदालतों का आगाज हुआ। अब ये अदालतें व्यवस्था का एक अंग बनती जा रही हैं। इसके बाद विधिक सेवा प्राधिकरण का गठन किया गया। इस सेवा प्राधिकरण में अधिकारों का ज्ञान कराया जाता है और समझौते के आधार पर मामलों का निस्तारण किया जाता है। अधिकारों का ज्ञान होने पर व्यक्ति विवादों के निस्तारण का अधिकारी हो जाता है। कई विचारकों, लेखकों, और समाज सुधारकों ने दिशा दी है कि हम स्वयं के साथ न्याय करें और दूसरों को भी न्याय की राह दिखाएं। न्यायपालिका में जिम्मेदारी के आधार पर दंड की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि लीगल एड क्लीनिक में समझाने की प्रक्रिया में कानूनी हस्तक्षेप नहीं किया जाए, बल्कि मामलों को हल कराने के लिए मनोवैज्ञानिक तरीके अपनाएं जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि आज की न्यायपालिका राजत्व पद्धति की नहीं, बल्कि लोक पद्धति की है। गांव के साधारण व्यक्ति की पीड़ा को एक प्लेटफार्म मिले, उनकी भी बात सक्षम अधिकारी तक पहुंचाकर उन्हें न्याय दिलाने की व्यवस्था दिलाने के लिए विधिक सेवा प्राधिकरण का गठन किया गया, जहां नि:शुल्क सहायता दी जाती है। विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव राघवेंद्र कुमार ने आंकड़ेवार ने बताया कि लोक अदालतों के माध्यम से उत्तर प्रदेश में साढ़े नौ लाख वादों का निस्तारण किया गया है। इन वादों के निस्तारण से बैंकों को 200 करोड़ की वसूली हुई है तो वहीं राजस्व के रूप में तीन करोड़ का अर्थ दंड भी वसूला गया है। इनके साथ-साथ क्षतिपूर्ति के रूप में 90 करोड़ रुपये भी वादियों को दिलाए गए हैं। उन्होंने कहा कि न्यायालय के लिए विलंब से न्याय देना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। उन्होंने बताया कि 23 नवंबर को राष्ट्रीय लोक अदालतों का आयोजन किया गया था। यह एक शतत प्रक्रिया है, जो चलती रहेगी। अब तो यह व्यवस्था का एक अंग बन चुकी है। उन्होंने न्यायमूर्ति एपी शाही को न्यायपालिका का गौरव बताते हुए कहा कि इनके निर्णय अन्य के लिए प्रेरणस्रोत बनते हैं। उन्होंने कहा कि संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को न्याय दिलाने की व्यवस्था दी गई है। इसी लिए 1987 में विधिक सेवा अधिनियम बनाकर राष्ट्र, प्रदेश और जिले स्तर पर विधिक सहायता बोर्ड का गठन किया गया। डीएम रिग्जियान सैंफिल ने कहा कि देश के पिछड़े जिलों में से एक इस जिले में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की संख्या वर्ष 2002 के आंकड़े के अनुसार तो 2 लाख 80 हजार है, लेकिन वास्तविकता इससे कुछ हट कर है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानक के हिसाब से इस जिले में 90 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं। उन्होंने सरकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने और जनता को सुलभ तथा समय से न्याय दिलाने के लिए तहसील दिवस, थाना दिवस के साथ-साथ बारह बजे तक दफ्तरों में बैठकर उनकी समस्याओं का निराकरण करने की बात भी कही। एसपी ललित कुमार सिंह ने कहा कि सात साल से कम सजा वाले केस में आरोपी की गिरफ्तारी नहीं किए जाने से वादी संतुष्ट नहीं होता है। इसके लिए कोई प्रावधान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामाजिक एकता से राष्ट्र की एकता मजबूत होती है। इसके लिए ग्राम स्तर पर न्यायालयों की व्यवस्था की प्रक्रिया को गति दिलाए जाने की आवश्यकता है। इसके पूर्व जिला जज एके उपाध्याय ने कहा कि जिला एवं सत्र न्यायालय में जजों की कमी के बारे में मांग करने के पूर्व ही न्यायालयों में खाली पदों को भर दिया गया। इसके बाद भी उन्होंने कहा कि जिला एवं सत्र न्यायालय में और न्यायधीशोें की तैनाती की आवश्यकता है। उन्होंने न्यायालय में एक माली का पद सृजित करने की बात भी कही। विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव और सीजेएम सुरेंद्रनाथ ने कहा कि लोक अदालताें के माध्यम से ही अदालतों से मुकदमों का बोझ कम किया जा सकता है। इसके पूर्व बार एसासिएशन के अध्यक्ष महंत गोपाल जी दास ने कहा कि जिला एंव सत्र न्यायालय में मात्र एक तहसील के वादों की सुनवाई होती है, जबकि बाह्य न्यायालय में तीन तहसीलों के वाद सुने जाते हैं। उन्होंने मांग की कि सत्र न्यायालय में कम से कम तीन तहसीलों के वादों की सुनवाई की व्यवस्था सुनिश्चित कराई जाए। इस मौके पर अधिवक्ता आरके शाही ने लोक अदालतों में फौजदारी के विवादों के निपटारा कराए जाने पर जोर देते कहा कि इस तरह से 35 फीसदी फौजदारी के वाद समाप्त किए जा सकते हैं। अधिवक्ता हरिशंकर दीक्षित, मिथिलेश दीक्षित आदि अधिवक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। इसके बाद विद्यालय के प्रधानाचार्य शैलेंद्र दत्त शुक्ल ने सभी आगंतुकों का स्वागत करते हुए स्मृतिचिह्न और अंग वस्त्र प्रदान किया। जबकि मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति एपी शाही को जनपद न्यायाधीश ने स्मृतिचिह्न और अंगवस्त्र प्रदान किया। इसके बाद विद्यालय परिसर के एक कमरे में विधिक सहायता क्लीनिक का पूजन भी न्यायमूर्ति एपी शाही ने किया। इस अवसर पर अशोक कुमार श्रीवास्तव, मुकेश श्रीवास्तव, अनिरुद्ध शुक्ल, शिवकुमार शुक्ल, रीयल पैराडाइज विद्यालय की प्रधानाचार्य डॉ. सुनीता पंाडेय, नीलेन पांडेय, दीपनारायण अग्रवाल, सुधीर शाही सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता और लोग मौजूद रहे।
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बजट के कारण अटकी ग्रामीण न्यायालयों की योजना : न्यायमूर्ति
पडरौना। रविवार को कार्यक्रम के दौरान न्यायमूर्ति एपी शाही ने कहा कि ग्राम न्यायालयों की स्थापना में सरकार का बजट आड़े आ रहा है। यदि सरकार इस योजना के लिए वजट का प्रावधान करे तो इन न्यायालयों की शुरुआत हो सकती है।
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इनसे पूर्व ग्रामीण न्यायालयों की जरूरत पर बल देते हुए एसपी ललित कुमार सिंह ने कहा था कि न्यायपालिका को ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना में तेजी दिखानी चाहिए, जिससे जनता को सस्ता और सुलभ न्याय मिल सके। उन्होंने कहा कि इन न्यायालयों के गठन से जिला न्यायालयों में मुकदमों का बोझ नहीं बढ़ेगा और जनता को भी तारीख पर तारीख से निजात मिलेगी। इसके बाद अपने संबोधन में न्यायमूर्ति एपी शाही ने इस पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना करने की योजना पहले से ही है, लेकिन इन न्यायालयों की स्थापना के लिए बजट राज्य सरकार से मिलना था, जो मिल नहीं पा रहा है। इस कारण ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना को जमीनी रूप नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि इन न्यायालयों का गठन हो जाने के बाद जिला एंव सत्र न्यायालयों से मुकदमाें का बोझ कम हो जाता। इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों केेेेेे छोट-छोटे मामलों को उसी स्तर पर निपटाने से आम जनता को भी सहूलिय होती। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका का विकल्प नहीं, बल्कि समाधान है। इसको मूर्त रूप देने के लिए धन राज्य सरकार से ही आवंटित होना है।