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कुंडा हत्याकांड: सीबीआई के सामने ये हैं चुनौतियां
लखनऊ/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 08 Mar 2013 09:33 AM IST
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कुंडा कांड की जांच शुरू करने के साथ सीबीआई के सामने एक साथ कई चुनौतियां हैं। एक तरफ उसके सामने सच को सामने लाने की चुनौती है तो दूसरी ओर उसे फरेब को उजागर करना है जिसकी वजह से एक जांबाज सीओ को अपनी जान गंवानी पड़ी। सबसे बड़ी चुनौती हाई प्रोफाइल आरोपी का इस केस के साथ रिश्तों की पड़ताल की है।
माना जा रहा है कि मामले में किसी बड़ी ताकत का हाथ है। ऐसे में सच और झूठ को दूध का दूध और पानी का पानी करने की करने की चुनौती सबसे बड़ी है। घटना के बाद के चार दिनों में यूपी पुलिस की तफ्तीश की हकीकत को समझना उसके लिए एक कड़ा इम्तहान साबित होने वाला है।
सीओ जियाउल हक की मौत के लिए सबसे अधिक जिम्मेदारी हथगवां थाने के प्रभारी मनोज शुक्ला की ही आ रही है। इस बात से आला अफसर भी अवगत हैं, लेकिन क ार्रवाई करने से कतराते रहे हैं। कार्रवाई भी तब हुई जब मामले ने तूल पकड़ा। जहां ग्राम प्रधान नन्हें का कत्ल हुआ, गुड्डू सिंह समेत अन्य के घरों में आगजनी की गई, ग्रामीणों और पुलिसकर्मियों में संघर्ष हुआ, सीओ जियाउल हक को पीटकर अधमरा करने के बाद गोली मार कर हत्या की गई, वह सभी जगहें हथगवां थाना क्षेत्र में हैं।
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एडीजी कानून-व्यवस्था अरुण कुमार और आईजी कानून-व्यवस्था आरके विश्वकर्मा ने अलग-अलग एक ही बात बताई थी कि ग्राम प्रधान नन्हें का कत्ल होने के बाद सबसे पहले एसओ हथगवां मनोज कुमार शुक्ला ही मौके पर और फिर गांव पहुंचे थे। एसओ के सामने ही नन्हें यादव के समर्थकों का जमावड़ा शुरू हो गया था। लोगों में भरा आक्रोश भी उनकी जानकारी में था और समर्थकों द्वारा गुड्डू सिंह व अन्य के घरों में की गई आगजनी का भी एसओ गवाह रहे।
अधिकारियों ने कहा था कि आगजनी के मौके पर एसओ हथगवां ने एक बच्चे को आग से बचाया भी। यह भी बताया था कि एसओ ने अपने सीओ जियाउल हक को यह सूचना दे दी थी कि ग्राम प्रधान का कत्ल हो गया है और लाश उसके गांव में है और वह आगजनी के मौके पर फंसे हैं। एसओ ने सीओ से मौके पर पहुंचने की गुजारिश करते कहा था कि आग बुझवाने के बाद वह भी गांव पहुंच रहा है। लेकिन एसओ ने सीओ को यह नहीं बताया कि गांव में स्थिति तनाव भरी है और वहां बगैर फोर्स के पहुंचना खतरनाक हो सकता है।
अपने एसओ की बात सुनकर सीओ गांव तक पहुंचे और इस बीच एसओ भी गांव पहुंचा पर दूसरे रास्ते से। सीओ अपने साथ इंस्पेक्टर कुंडा एक दारोगा व अपने गनर को लेकर मौके तक पहुंच गए थे और भीड़ ने इन लोगों को दौड़ा लिया था। हिंसक ग्रामीणों द्वारा सीओ को अकेला दबोच कर पीट कर अधमरा कर दिया और इसी दौरान गोली मार दी थी। अभी तक की पड़ताल में यह साफ हो चुका है कि एसओ की जानकारी में यह सारा वाकया था। फिर भी एसओ ने मौके पर जाकर अपने अधिकारी को बचाने की कोई कोशिश नहीं की।
एडीजी व आईजी दोनों ने ही यह स्वीकार किया है कि एसओ दूसरी ओर से गांव पहुंचा था और वह सीओ को इस बात की ताकीद करना भूल गया था कि गांव में किस तरह का माहौल है। बकौल दोनों अधिकारियों के एसओ ने यह बताया था कि जब वह गांव पहुंचा तो उसने सीओ को सचेत करने की कोशिश की पर उसका सीओ से संपर्क नहीं हो सका। अगर एसओ की यह बात मान भी ली जाए कि मोबाइल फोन पर संपर्क नहीं हो पा रहा था तो वह वायरलेस से भी सिकी सूचना दे सकते थे।
सीओ के अलावा इंस्पेक्टर कुंडा वे पास भी वायरलेस हैंडसेट था। इसके बाद भी जब सीओ को हिंसक भीड़ के बीच छोड़ कर भागने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की बात आई तो पहले इंस्पेक्टर कुंडा, एसएसआई कुंडा और सीओ के गनर को निलंबित किया गया जबकि एसओ हथगवां का नाम उनमें शामिल किया गया जिनके खिलाफ जांच बैठाई गई।
इतना ही नहीं एसओ ने अपने सीओ की मौत का जो मुकदमा अपने थाने में दर्ज कराया और जिन लोगों को नामजद किया, उनमें से ही एक आरोपी को प्रधान नन्हें के भाई सुरेश की हत्या का मुकदमा दर्ज कराने की भी अनुमति दी। बजाय इसके कि हत्या का आरोपी होने के नाते उसे रोक कर पूछताछ की जाती।
पुलिस के आला अफसरों के साथ ही सरकार को भी समय रहते सचेत होना होगा। जो संकेत हैं वह बहुत खतरनाक हैं। आज सीओ के साथ हुआ है, कल किसी और अधिकारी के साथ होगा। पुलिस की भूमिका भी बहुत प्रश्नवाचक हो गई है। जो वाकया सामने है, उसके लिहाज से एसओ की जिम्मेदारी बनती है, उस पर भी फौरन कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए थी।
- केएल गुप्ता, सेवानिवृत्त डीजीपी
इस पूरे मामले के लिए स्थानीय पुलिस ही दोषी है। यह घटना एक ही दिन में नहीं हुई। यह वहां जमीन को लेकर दो पक्षों के बीच पनप रहे तनाव का नतीजा है। पुलिस को पहले ही प्रिवेंटिव एक्शन लेना चाहिए था। लेकिन ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया। अधिकारी को छोड़ कर मौके से भाग कर पुलिस कर्मियों ने न सिर्फ धोखा दिया बल्कि कायरता का भी परिचय दिया।
- आईबी सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता
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माना जा रहा है कि मामले में किसी बड़ी ताकत का हाथ है। ऐसे में सच और झूठ को दूध का दूध और पानी का पानी करने की करने की चुनौती सबसे बड़ी है। घटना के बाद के चार दिनों में यूपी पुलिस की तफ्तीश की हकीकत को समझना उसके लिए एक कड़ा इम्तहान साबित होने वाला है।
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सीओ जियाउल हक की मौत के लिए सबसे अधिक जिम्मेदारी हथगवां थाने के प्रभारी मनोज शुक्ला की ही आ रही है। इस बात से आला अफसर भी अवगत हैं, लेकिन क ार्रवाई करने से कतराते रहे हैं। कार्रवाई भी तब हुई जब मामले ने तूल पकड़ा। जहां ग्राम प्रधान नन्हें का कत्ल हुआ, गुड्डू सिंह समेत अन्य के घरों में आगजनी की गई, ग्रामीणों और पुलिसकर्मियों में संघर्ष हुआ, सीओ जियाउल हक को पीटकर अधमरा करने के बाद गोली मार कर हत्या की गई, वह सभी जगहें हथगवां थाना क्षेत्र में हैं।
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एडीजी कानून-व्यवस्था अरुण कुमार और आईजी कानून-व्यवस्था आरके विश्वकर्मा ने अलग-अलग एक ही बात बताई थी कि ग्राम प्रधान नन्हें का कत्ल होने के बाद सबसे पहले एसओ हथगवां मनोज कुमार शुक्ला ही मौके पर और फिर गांव पहुंचे थे। एसओ के सामने ही नन्हें यादव के समर्थकों का जमावड़ा शुरू हो गया था। लोगों में भरा आक्रोश भी उनकी जानकारी में था और समर्थकों द्वारा गुड्डू सिंह व अन्य के घरों में की गई आगजनी का भी एसओ गवाह रहे।
अधिकारियों ने कहा था कि आगजनी के मौके पर एसओ हथगवां ने एक बच्चे को आग से बचाया भी। यह भी बताया था कि एसओ ने अपने सीओ जियाउल हक को यह सूचना दे दी थी कि ग्राम प्रधान का कत्ल हो गया है और लाश उसके गांव में है और वह आगजनी के मौके पर फंसे हैं। एसओ ने सीओ से मौके पर पहुंचने की गुजारिश करते कहा था कि आग बुझवाने के बाद वह भी गांव पहुंच रहा है। लेकिन एसओ ने सीओ को यह नहीं बताया कि गांव में स्थिति तनाव भरी है और वहां बगैर फोर्स के पहुंचना खतरनाक हो सकता है।
अपने एसओ की बात सुनकर सीओ गांव तक पहुंचे और इस बीच एसओ भी गांव पहुंचा पर दूसरे रास्ते से। सीओ अपने साथ इंस्पेक्टर कुंडा एक दारोगा व अपने गनर को लेकर मौके तक पहुंच गए थे और भीड़ ने इन लोगों को दौड़ा लिया था। हिंसक ग्रामीणों द्वारा सीओ को अकेला दबोच कर पीट कर अधमरा कर दिया और इसी दौरान गोली मार दी थी। अभी तक की पड़ताल में यह साफ हो चुका है कि एसओ की जानकारी में यह सारा वाकया था। फिर भी एसओ ने मौके पर जाकर अपने अधिकारी को बचाने की कोई कोशिश नहीं की।
एडीजी व आईजी दोनों ने ही यह स्वीकार किया है कि एसओ दूसरी ओर से गांव पहुंचा था और वह सीओ को इस बात की ताकीद करना भूल गया था कि गांव में किस तरह का माहौल है। बकौल दोनों अधिकारियों के एसओ ने यह बताया था कि जब वह गांव पहुंचा तो उसने सीओ को सचेत करने की कोशिश की पर उसका सीओ से संपर्क नहीं हो सका। अगर एसओ की यह बात मान भी ली जाए कि मोबाइल फोन पर संपर्क नहीं हो पा रहा था तो वह वायरलेस से भी सिकी सूचना दे सकते थे।
सीओ के अलावा इंस्पेक्टर कुंडा वे पास भी वायरलेस हैंडसेट था। इसके बाद भी जब सीओ को हिंसक भीड़ के बीच छोड़ कर भागने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की बात आई तो पहले इंस्पेक्टर कुंडा, एसएसआई कुंडा और सीओ के गनर को निलंबित किया गया जबकि एसओ हथगवां का नाम उनमें शामिल किया गया जिनके खिलाफ जांच बैठाई गई।
इतना ही नहीं एसओ ने अपने सीओ की मौत का जो मुकदमा अपने थाने में दर्ज कराया और जिन लोगों को नामजद किया, उनमें से ही एक आरोपी को प्रधान नन्हें के भाई सुरेश की हत्या का मुकदमा दर्ज कराने की भी अनुमति दी। बजाय इसके कि हत्या का आरोपी होने के नाते उसे रोक कर पूछताछ की जाती।
पुलिस के आला अफसरों के साथ ही सरकार को भी समय रहते सचेत होना होगा। जो संकेत हैं वह बहुत खतरनाक हैं। आज सीओ के साथ हुआ है, कल किसी और अधिकारी के साथ होगा। पुलिस की भूमिका भी बहुत प्रश्नवाचक हो गई है। जो वाकया सामने है, उसके लिहाज से एसओ की जिम्मेदारी बनती है, उस पर भी फौरन कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए थी।
- केएल गुप्ता, सेवानिवृत्त डीजीपी
इस पूरे मामले के लिए स्थानीय पुलिस ही दोषी है। यह घटना एक ही दिन में नहीं हुई। यह वहां जमीन को लेकर दो पक्षों के बीच पनप रहे तनाव का नतीजा है। पुलिस को पहले ही प्रिवेंटिव एक्शन लेना चाहिए था। लेकिन ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया। अधिकारी को छोड़ कर मौके से भाग कर पुलिस कर्मियों ने न सिर्फ धोखा दिया बल्कि कायरता का भी परिचय दिया।
- आईबी सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता