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बालू से भर रहा खजाना, फिर भी कौशांबी बेगाना
Mon, 22 Apr 2019 12:21 AM IST
shailendra Kumar
अमर उजाला ब्यूरो, कौशाम्बी
अमर उजाला ब्यूरो, कौशाम्बी
Published by: shailendra Kumar
Updated Mon, 22 Apr 2019 12:21 AM IST
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मंझनपुर।अशिक्षा, बेरोजगारी और गरीबी से जूझ रहा दोआबा अपने दामन में समेटे खनिज संपदा से हर साल सरकार की झोली में करोड़ों रुपया डालता है। फिर भी यहां रोजी रोटी के लाले हैं। मजदूरों को स्थानीय स्तर पर काम नहीं मिल रहा है। तराई क्षेत्र के मजदूर रोजगार के लिए महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जबकि, जिले में भरी पड़ी खनिज संपदा से सरकार और बाहरी लोग मालामाल हो रहे हैं। इसके बावजूद राजनीतिक दल के प्रत्याशियों ने चुनाव में इसे मुद्दा नहीं बनाया है।
दोबाबा से होकर गुजरने वाली यमुना नदी बालू यानी लाल सोना उगलती है। जिले में करीब दर्जन भर खंडों से बालू खनन किया जा रहा है। सरकार इनकी रॉयल्टी और ठेकों से करोड़ों रुपये वसूल करती है। पिछले वित्तीय वर्ष में खनन विभाग ने लगभग 80 करोड़ रुपये का राजस्व वसूल किया है। हर साल इसमें बढ़ोतरी का सिलसिला जारी है। नियमानुसार बालू खनन और लोडिंग का काम मजदूरों के जरिए होना चाहिए। पर, एनजीटी के नियमों को दरकिनार कर माफिया खनन व लोडिंग में मशीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाईकोर्ट और एनजीटी कई बार इस पर कड़ा रुख अपनाया जा चुका है। कार्रवाई भी की जा चुकी है। पर, सफेदपोशों प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होने के कारण इस पर कोई लगाम नहीं लग पा रही है। करीब एक दशक से धंधा फलफूल रहा है।
इधर बीच पांच साल से तो जनपद के अलावा बहरी प्रांतों के कारोबारियों ने इस धंधे में हाथ डाल दिया है। ज्यादातर कायदे के खंड इन्हीं बाहरी ठेकेदारों ने हथिया रखे हैं। अधिकांश खदानें सत्तारुढ़ दल के लोगों की संरक्षण में चल रही हैं। दूसरी तरफ खदानों में काम नहीं मिलने से तराई में बसे हजारों मजदूर बेरोजगार है। इन मजदूर परिवारों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट है। रोजी-रोटी की तलाश में मजदूर महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। स्थानीय मजदूरों का हक मारने में अप्रत्यक्ष रूप से घाट चला रहे राजनीतिक दल के लोग ही शामिल हैं। ऐसे में खनिज संपदा, अवैध खनन, मजदूरी और पलायन चुनाव के मुद्दे से कैसे बच सकते हैं? पर, हैरानी ये है कि चुनावी समर में उतरे किसी भी उम्मीदवार ने इसे अपने चुनावी एजेंडे में नहीं शामिल किया है।
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दोबाबा से होकर गुजरने वाली यमुना नदी बालू यानी लाल सोना उगलती है। जिले में करीब दर्जन भर खंडों से बालू खनन किया जा रहा है। सरकार इनकी रॉयल्टी और ठेकों से करोड़ों रुपये वसूल करती है। पिछले वित्तीय वर्ष में खनन विभाग ने लगभग 80 करोड़ रुपये का राजस्व वसूल किया है। हर साल इसमें बढ़ोतरी का सिलसिला जारी है। नियमानुसार बालू खनन और लोडिंग का काम मजदूरों के जरिए होना चाहिए। पर, एनजीटी के नियमों को दरकिनार कर माफिया खनन व लोडिंग में मशीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाईकोर्ट और एनजीटी कई बार इस पर कड़ा रुख अपनाया जा चुका है। कार्रवाई भी की जा चुकी है। पर, सफेदपोशों प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होने के कारण इस पर कोई लगाम नहीं लग पा रही है। करीब एक दशक से धंधा फलफूल रहा है।
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इधर बीच पांच साल से तो जनपद के अलावा बहरी प्रांतों के कारोबारियों ने इस धंधे में हाथ डाल दिया है। ज्यादातर कायदे के खंड इन्हीं बाहरी ठेकेदारों ने हथिया रखे हैं। अधिकांश खदानें सत्तारुढ़ दल के लोगों की संरक्षण में चल रही हैं। दूसरी तरफ खदानों में काम नहीं मिलने से तराई में बसे हजारों मजदूर बेरोजगार है। इन मजदूर परिवारों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट है। रोजी-रोटी की तलाश में मजदूर महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। स्थानीय मजदूरों का हक मारने में अप्रत्यक्ष रूप से घाट चला रहे राजनीतिक दल के लोग ही शामिल हैं। ऐसे में खनिज संपदा, अवैध खनन, मजदूरी और पलायन चुनाव के मुद्दे से कैसे बच सकते हैं? पर, हैरानी ये है कि चुनावी समर में उतरे किसी भी उम्मीदवार ने इसे अपने चुनावी एजेंडे में नहीं शामिल किया है।
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