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तो फिर दोआबा में कहां से आएंगी बहुएं
अमर उजाला ब्यूराे काैश्ााम्बी
Updated Mon, 25 Jan 2016 12:05 AM IST
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सामाजिक सोच...दहेज की मार आदि...कारण कुछ भी हो। कौशाम्बी में लड़कियों की संख्या कम होती जा रही है। 10 साल में ही देखें तो जनपद में प्रति हजार लड़कियों की संख्या 946 से गिरकर 926 हो गई है। रविवार को मंझनपुर में गर्ल्स चाइल्ड डे के मौके पर स्वास्थ्य महकमे के अफसरों ने भी चिंता जताई। आशा कार्यकत्रियों, एएनएम को ग्रामीणों को जागरूक करने का आह्वान किया गया।
कौशाम्बी में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या घट रही है। 2011 जनगणना के मुताबिक जनपद की आबादी 15.96 लाख में महिलाओं की संख्या तकरीबन 7.58 लाख है। यानी पुरुषों की अपेक्षा करीब 80 हजार महिलाएं कम हैं। वहीं स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड बताते हैं कि जनपद में लिंगानुपात भी बिगड़ा हुआ है। यहां प्रति एक हजार लड़कों में लड़कियां की संख्या 926 ही है। जबकि 10 बरस पहले यह संख्या 946 थी। जनगणना के आंकड़े और स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड से साफ है कि जनपद में लड़कियों की संख्या में कमी आ रही है।
यही आलम रहा तो तमाम परिवारों को कन्याभोज और शादी के लिए भी लड़कियां ढूंढने से भी नहीं मिलेंगी। जनपद में लड़कियों की घटती आबादी पर यही चिंता रविवार को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की ओर से गर्ल्स चाइल्ड डे की संगोष्ठी में भी जताई गई।
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सीएमओ डॉ यूबी सिंह, एसीएमओ डॉ बीएन कुशवाहा, डॉ अरुण पटेल, राहुल पांडेय, महेंद्र द्विवेदी आदि ने कहाकि परिवारों को जागरूक करना होगा। ग्रामीणों को यह समझाना जरूरी है कि आज लड़कियां हर क्षेत्र में कामयाबी का झंडा लहरा रही हैं। वह पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रही हैं। वह किसी से भी कम नहीं हैं। आशा और एएनएम को लोगों को लड़के-लड़कियों में अंतर के सोच को दूर करने की सलाह दी गई।
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कौशाम्बी में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या घट रही है। 2011 जनगणना के मुताबिक जनपद की आबादी 15.96 लाख में महिलाओं की संख्या तकरीबन 7.58 लाख है। यानी पुरुषों की अपेक्षा करीब 80 हजार महिलाएं कम हैं। वहीं स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड बताते हैं कि जनपद में लिंगानुपात भी बिगड़ा हुआ है। यहां प्रति एक हजार लड़कों में लड़कियां की संख्या 926 ही है। जबकि 10 बरस पहले यह संख्या 946 थी। जनगणना के आंकड़े और स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड से साफ है कि जनपद में लड़कियों की संख्या में कमी आ रही है।
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यही आलम रहा तो तमाम परिवारों को कन्याभोज और शादी के लिए भी लड़कियां ढूंढने से भी नहीं मिलेंगी। जनपद में लड़कियों की घटती आबादी पर यही चिंता रविवार को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की ओर से गर्ल्स चाइल्ड डे की संगोष्ठी में भी जताई गई।
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सीएमओ डॉ यूबी सिंह, एसीएमओ डॉ बीएन कुशवाहा, डॉ अरुण पटेल, राहुल पांडेय, महेंद्र द्विवेदी आदि ने कहाकि परिवारों को जागरूक करना होगा। ग्रामीणों को यह समझाना जरूरी है कि आज लड़कियां हर क्षेत्र में कामयाबी का झंडा लहरा रही हैं। वह पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रही हैं। वह किसी से भी कम नहीं हैं। आशा और एएनएम को लोगों को लड़के-लड़कियों में अंतर के सोच को दूर करने की सलाह दी गई।