{"_id":"5cb4d224bdec2213fb2cdc0e","slug":"guava-of-allahabad-inproblem","type":"story","status":"publish","title_hn":"इलाहाबादी अमरूद की पहचान का संकट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
इलाहाबादी अमरूद की पहचान का संकट
Tue, 16 Apr 2019 12:21 AM IST
shailendra Kumar
अमर उजाला ब्यूरो, कौशाम्बी
अमर उजाला ब्यूरो, कौशाम्बी
Published by: shailendra Kumar
Updated Tue, 16 Apr 2019 12:21 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मंझनपुर। अपने स्वाद और खुशबू के दम पर देश-प्रदेश में डंका बजाने वाला इलाहाबादी अमरूद कौशाम्बी की माटी में पैदा होता है। सरकार और अफसरों की उदासीनता के कारण इस लाजवाब फल की पहचान का संकट खड़ा हो गया है। पिछले एक दशक से अमरूद के बागान उकठा रोग के शिकार हो रहे हैं। रोग ने ऐसा जकड़ा की हरे-भरे पेड़ सूखते जा रहे हैं। बची कसर तना छेदक कीड़े ने पूरी कर दी। 3600 सौ हेक्टेयर से ज्यादा में फैले अमरूद के बागान अब सिकुडकर दो हजार हेक्टेयर के आसपास हो गए हैं। इसके चलते बागवान बदहाल हैं। पर, चुनावी सीजन में इसे किसी राजनीतिक दल ने मुद्दा नहीं बनाया। अमरूद की बंपर पैदावार होने के बाद भी यहां पर उससे बनने वाले उत्पाद के लिए एक भी फूड प्रोसेसिंग यूनिट नहीं लगाई जा सकी है। इस बार लोकसभा चुनाव के पहले वन डिस्ट्रिक वन प्रोडक्ट योजना के तहत सरकार ने यहां को पहचान दिलाने वाले अमरूद की जगह केले को तरजीह दी है।
प्रयागराज से जिले की सीमा में प्रवेश करते ही अमरूद के बाग दिखाई देने लगते थे। उमरछा, असरावल कला, पैगंबरपुर, कशिया, ककोढ़ा सहित समूचे हाइवे के किनारे अमरूद के बाग थे। बाग इतनी घनी होती थी कि फल लगने के बाद अक्सर भार से डाल टूटने का खतरा हो जाता था। ऐसे में बागवानों को बांस का सहारा देना पड़ता था। कृषि अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक जीतेंद्र सिंह का कहना है कि दोआबा की माटी में न जाने कौन सी खासियत है कि यहां जैसा अमरूद देश के किसी कोने में नहीं होता है। उकठा से किसानों को काफी नुकसान हुआ है। शोध में उकठा के निदान का तो अब तक हल नहीं निकला लेकिन बचाव की दवा तैयार हो चुकी है। उद्यान विभाग ने जिले में दम तोड़ रही अमरूद की बाग को नया जीवन देने की पहल शुरू कर दी है।
इसे लेकर हर साल दस बीघे में अनुदान पर इच्छुक किसानों से अमरूद की बाग लगवाई जा रही है। चायल इलाके में काफी बाग तैयार भी हो चुके हैं। अब यहां करीब दौ हजार हेक्टेयर में अमरूद के बाग बचे हुए हैं। उद्यान विभाग का दावा है कि जिले में भले ही अमरूद के बाग कम हुए हों लेकिन यहां अभी भी बड़ी तादात में अमरूद की पैदावार होती है। प्रयागराज के कुंभ में अमरूद की खपत बढ़ गई थी। इसी वजह से जिले में अमरूद 40 से 60 रूपया प्रति किलो तक बिक गया। अब यहां 40 रुपये में सुर्खा मिल रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन
प्रयागराज से जिले की सीमा में प्रवेश करते ही अमरूद के बाग दिखाई देने लगते थे। उमरछा, असरावल कला, पैगंबरपुर, कशिया, ककोढ़ा सहित समूचे हाइवे के किनारे अमरूद के बाग थे। बाग इतनी घनी होती थी कि फल लगने के बाद अक्सर भार से डाल टूटने का खतरा हो जाता था। ऐसे में बागवानों को बांस का सहारा देना पड़ता था। कृषि अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक जीतेंद्र सिंह का कहना है कि दोआबा की माटी में न जाने कौन सी खासियत है कि यहां जैसा अमरूद देश के किसी कोने में नहीं होता है। उकठा से किसानों को काफी नुकसान हुआ है। शोध में उकठा के निदान का तो अब तक हल नहीं निकला लेकिन बचाव की दवा तैयार हो चुकी है। उद्यान विभाग ने जिले में दम तोड़ रही अमरूद की बाग को नया जीवन देने की पहल शुरू कर दी है।
विज्ञापन
इसे लेकर हर साल दस बीघे में अनुदान पर इच्छुक किसानों से अमरूद की बाग लगवाई जा रही है। चायल इलाके में काफी बाग तैयार भी हो चुके हैं। अब यहां करीब दौ हजार हेक्टेयर में अमरूद के बाग बचे हुए हैं। उद्यान विभाग का दावा है कि जिले में भले ही अमरूद के बाग कम हुए हों लेकिन यहां अभी भी बड़ी तादात में अमरूद की पैदावार होती है। प्रयागराज के कुंभ में अमरूद की खपत बढ़ गई थी। इसी वजह से जिले में अमरूद 40 से 60 रूपया प्रति किलो तक बिक गया। अब यहां 40 रुपये में सुर्खा मिल रहा है।
विज्ञापन