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कौशाम्बी: 39 हजार नौनिहाल कुपोषित, छह माह से दो साल तक के बच्चों का नहीं हो रहा विकास
Tue, 12 Jan 2021 04:38 PM IST
कुमार संभव
रवींद्र अग्रहरि, मंझनपुर (कौशाम्बी)
रवींद्र अग्रहरि, मंझनपुर (कौशाम्बी)
Published by: कुमार संभव
Updated Tue, 12 Jan 2021 04:38 PM IST
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सैबसा गांव की कुपोषित राधिका (बाएं) और अंश और प्रिंस (दाएं)
- फोटो : अमर उजाला
इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से पृथक कर कौशाम्बी को वर्ष 1997 में जिला बनाया गया था। गंगा-यमुना के बीच बसे जिले का 23 वर्षों के दौरान न तो अपेक्षित विकास हुआ और न ही यहां के लोगों की दशा में सुधार हो पाया। हालात यह हैं कि कुपोषण के मामले में कौशाम्बी रेड जोन वाले जिलों में गिना जाता है। सरकारी दावे हैं कि विगत दो वर्ष में हालात थोड़े सुधरे हैं, लेकिन सचाई है कि अब भी करीब 39 हजार बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं। चार हजार से अधिक तो गंभीर रूप से कुपोषित हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि इनमें छह माह से दो वर्ष के बच्चे कुपोषण का अधिक शिकार हैं।
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जनपद में तीन साल पहले कुपोषण की भयावह तस्वीर सामने आई थी। इसके बाद दोआबा विकास नामक संस्था के माध्यम से 65 गांवों का सर्वे कराया गया। जिले के कौशाम्बी, मंझनपुर और सरसवां ब्लाक के 35 गांवों में सबसे अधिक कुपोषित बच्चे पाए गए। इन गांवों के कुल 3505 बच्चों की जांच कराई गई तो 1024 बच्चे कुपोषित मिले। इनमें से 246 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित पाए गए। कुपोषित मिले ज्यादातर बच्चों की उम्र छह माह से दो वर्ष के बीच है। इसकी मुख्य वजह यह है कि ज्यादातर बच्चों को छह महीने के बाद भी पूरक आहार नहीं दिया गया।
कौशाम्बी के बच्चों की यह भयावह तस्वीर सामने आने के बाद कई योजनाएं शुरू की गईं। इसके बाद हालात में सुधार के दावे किए जा रहे हैं लेकिन करीब 39 हजार बच्चे ऐसे हैं, जो अपना बोझ भी नहीं उठा सकते। वहीं कुपोषण को लेकर जागरूकता का आलम यह है कि पोषण पुनर्वास केंद्र के बारे में ही लोगों को जानकारी नहीं है।
बाल विवाह, बच्चों का अंतर कम होना वजह
कुपोषण की बडी वजह बाल विवाह एवं दो बच्चों के बीच में अंतर कम होना भी बड़ा कारण है। कुपोषण पर काम करने वाली दोआबा विकास उत्थान समिति की रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर मामले में कुपोषित बच्चों की माताएं एक साल के भीतर ही दोबारा मां बन गईं। वहीं जन्म प्रमाण पत्र से संबंधित रजिस्टर को देखें तो कई माताओं का 18 वर्ष से कम आयु में विवाह हो गया।
कुपोषण से संबंधित तीन वर्ष के आंकड़े
| वर्ष | कुपोषित | अति कुपोषित |
| 2018 | 47838 | 14667 |
| 2019 | 38896 | 8250 |
| 2020 | 34341 | 4373 |
कोरोनाकाल में बच्चों का वजन तक नहीं लिया कौशाम्बी जिले का बड़ा इलाका बहुत पिछड़ा है तथा रोजगार के सीमित अवसर हैं। बड़ी आबादी मजदूरी पर निर्भर है। उनकी यह गरीबी कुपोषण की मुख्य वजह है। कुपोषण और इसके कारणों के बारे में जानकारी लेने के लिए जब अमर उजाला टीम ने गांवों का दौरा किया तो हकीकत दावों से बिलकुल विपरीत दिखी। मंझनपुर ब्लॉक के सैंबसा, कौशाम्बी के रसूलपुर सोनी तथा महेंद्र गांव में कुपोषित बच्चों की संख्या 20 से ज्यादा है। ये सबसे अधिक कुपोषित बच्चों वाले गांव हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस हालात के बावजूद जनवरी के बाद बच्चों का वजन नहीं हुआ। कोविड की वजह से टीम पहुंची ही नहीं। महेंद्र गांव के चंदन ने बताया कि उसके बच्चे का वजन नहीं लिया गया। रसूलपुर सोनी के रामधनी का कहना था कि दो बच्चे कुपोषित होने के बाद भी उन्हें आंगनबाड़ी केंद्र से राशन नहीं मिला।
मजबूरी में पुनर्वास केंद्र में नहीं कराते भर्ती सदर तहसील के चपहुंआ गांव के संजय सरोज और उनकी पत्नी मजदूरी करते हैं। दो वर्ष का बेटा कुपोषित है। गांव की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने बच्चे को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती करने की सलाह दी लेकिन वे नहीं गए। बच्चे के साथ मां को भी केंद्र में रहना होगा। ऐसे में मजदूरी कौन करेगा। इसलिए संजय ने बच्चे को भर्ती नहीं कराया। महेंद्र गांव के मानसिंह के दोनों बेटे अश और प्रिंस कुपोषित हैं। परिवार मजदूरी करके भरण पोषण करता है। मानसिंह का कहना है कि आंगनबाड़ी केंद्र से काफी पहले घी तथा अन्य वस्तुएं मिली थीं लेकिन अब सब बंद है।
दस साल में केंद्र में पहुंचे मात्र 70 बच्चे जिला अस्पताल परिसर में 10 बेड का पोषण पुनर्वास केंद्र है। वहां भर्ती बच्चे के साथ एक महिला को भी सभी सुविधाएं देने की व्यवस्था है। मां को भोजन के अलावा रोजाना 50 रुपये दिए जाने का प्रावधान है। केंद्र की डायटीशियन सोनल बाला ज्योति के मुताबिक बच्चे को 14 दिन तक निगरानी में रखकर इलाज किया जाता है। इसके बाद हर 15 दिन पर बच्चे को चिकित्सकीय परीक्षण के लिए बुलाया जाता है। इसके लिए भी परिजन को 140 रुपये दिए जाते हैं। उन्होंने बताया कि एक वर्ष में 240 बच्चों को भर्ती करने की सुविधा है, लेकिन करीब 10 वर्ष पहले खुले केंद्र में अब तक महज 70 बच्चे ही आए। इन्हें भी स्वयं सेवी संगठनों तथा आंगनबाड़ी की मदद से भर्ती कराया गया।
किचन गार्डेनिंग के माध्यम से कुपोषण भगाने की कवायद कौशाम्बी में कुपोषण के खिलाफ किचन गार्डेनिंग का भी सहारा लिया जा रहा है। कुपोषित बच्चे वाले परिवारों को आसपास की खाली जमीन, घर के आंगन में हरी सब्जी लगाने की सलाह दी जा रही है। उन्हें सहजन के पेड़ लगाने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है। ताकि, इसके सेवन से पोषक तत्वों की भरपाई की जाए सके। ऐसे परिवारों को पौधे भी मुफ्त दिए जाते हैं। (संवाद)